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किसी पत्र-पत्रिका में मेरी कोई रचना छपती और वह मेजर साहब की नजर से गुजरती है, तो उनका फोन आता ही है।

Author Updated: February 25, 2021 3:34 AM
sahityaसांकेतिक फोटो।

बुलाकी शर्मा

किसी पत्र-पत्रिका में मेरी कोई रचना छपती और वह मेजर साहब की नजर से गुजरती है, तो उनका फोन आता ही है। वे उसकी खूबियों के साथ खामियों पर भी चर्चा करते हैं। सवाल करते हैं कि इसका अंत आपने ऐसे क्यों किया या कि बेवजह विस्तार क्यों दिया या कि विस्तार की जरूरत होते हुए भी समेटा क्यों! सवाल करना उनकी आदत में शुमार है। मेरी रचना पर बात करके फिर पूछेंगे- आपका मूड है तो हम चुटकुले सुनाएं। तय है कि मैं हामी भरूंगा। चुटकुला सुनाने के बाद वे प्रतिक्रिया जानना चाहेंगे कि इनमें से कौन-सा ज्यादा अच्छा लगा। फिर उनका अगला सवाल होगा- आपको यही ज्यादा अच्छा क्यों लगा, दूसरा क्यों नहीं?

सोशल मीडिया के ‘अनसोशल’ होते जाते समय में लखनऊ निवासी रिटायर्ड मेजर साहब का फोन राजस्थान के छोटे शहर में बैठे मेरे जैसे लेखक के पास आना किसी महत्त्वपूर्ण घटना से कम नहीं। सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट लगा कर हम लाइक और कमेंट की प्रतीक्षा में लग जाते हैं। टिप्पणियों में अच्छा, वाह, बहुत खूब, बेहतरीन, सही पकड़े, लाजवाब, मार्मिक, संवेदनशील, डूब कर लिखा है, खरी-खरी जैसे शब्दों को पढ़ कर हम अपने लिखे को सार्थक मानने के भ्रम में जीते रहते हैं। हमारी पोस्ट पर बेलाग टिप्पणियां प्राय: आती ही नहीं और भूल से कोई ऐसी गुस्ताखी कर बैठता है, तो हम भी उसका पीछा नहीं छोड़ते। उसकी जम कर आलोचना-भर्त्सना करके ही चैन पाते हैं।

मेजर साहब सोशल मीडिया से जुड़े हैं, पर वहां लाइक और कोई टिप्पणी करने से परहेज करते हैं। मैंने कारण जानना चाहा, तो उन्होंने एक चुटकुला सुना दिया- एक लेखक महोदय अपने संपादक मित्र के पास रचना लेकर गए और उसे पत्रिका में प्रकाशित करने का मित्रवत साधिकार आग्रह किया। संपादक को रचना पसंद नहीं आई।

उन्होंने प्रकाशित करने में असमर्थता जता दी। लेखक महोदय भयंकर रुष्ट हो गए। स्कूल जीवन की पुरानी घटना का स्मरण कराते हुए बोले- हम जब आठवीं कक्षा में पढ़ते थे तब मैंने तुम्हें तालाब में डूबने से बचाया था, याद है कि नहीं? संपादक ने जवाब दिया- अगर पता होता कि मुझे ऐसी रचनाएं पढ़नी पड़ेंगी तो मेरा डूबना बेहतर होता।

चुटकुला सुना कर वे कहने लगे- सोशल मीडिया पर जिसने जो लिख दिया वह सर्वश्रेष्ठ। वहां न कोई संपादक है, न कोई आलोचक। हर कोई आत्ममुग्ध है। सबको प्रशंसा अच्छी लगती है। आलोचना सहन नहीं होती। ऐसा हमसे नहीं होता। इसलिए हम सोशल मीडिया से बचते हैं।
इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि सोशल मीडिया ने हमें बहुत व्यावहारिक बना दिया है।

दूसरों की प्रशंसा करो और बदले में स्वयं की प्रशंसा पाओ। मेरे एक मित्र का स्पष्ट सिद्धांत है- लाइक के बदले लाइक और कमेंट के बदले कमेंट। हमारे पश्चिमी राजस्थान के गांवों में शादी-ब्याह के अवसर पर शगुन स्वरूप दी गई राशि का बहियों में हिसाब रखने की परंपरा है। वैसे ही सोशल मीडिया से जुड़े सजग महानुभाव लाइक और कमेंट का हिसाब रखते पाए जाते हैं। शगुन स्वरूप दी जाने वाली राशि को हमारे यहां ‘बान’ कहते हैं।

अगर कोई शहरी मानसिकता वाला बान की राशि लिफाफे में बंद लाता है, तो लिफाफा खोल कर उसे सार्वजनिक किया जाता और फिर बही में दर्ज किया जाता है। गांव में सब बराबर माने जाते हैं। जिस घर से जितनी बान पहले आ रखी है, उसके घर मांगलिक कार्य होने पर उतनी ही बान दी जाती है। अगर किसी ने कम दी है तो उसकी बाकी लिखी जाती है और ज्यादा दी गई है तो वह जमा मानी जाती है।

महानगरों में शुभ अवसरों पर लिफाफे का वजन हम चेहरा देख कर बढ़ाते-घटाते हैं। वैसे ही जैसे सोशल मीडिया पर हम भारी चेहरों की पोस्ट पर उनकी नजर में बने रहने के लिए लाइक और टिप्पणी करने को लालायित रहते हैं। यह अलग बात है कि भारी चेहरे सामान्य चेहरों की पोस्ट पर लाइक करना तो दूर, उधर झांकते भी नहीं।

हम सब आभासी मित्र जरूर हैं, पर पूरे हिसाबी हैं। लाइक का बटन दबाने से पहले मन ही मन हिसाब लगाते हैं कि इसमें नफा है कि नुकसान। जिस किसी आभासी मित्र ने बेबाक लिखा है, उसे लाइक और उस कोई टिप्पणी करने से बचते हैं कि बेकार में किसी पंगे में हम क्यों पड़ें। सोशल मीडिया ने इतना आभासी बना दिया है कि किसी पोस्ट को बिना पढ़े ही हमें आभास हो जाता है कि इसमें लिखा क्या है और तत्काल लाइक का बटन दबा कर बधाई की टिप्पणी जारी कर देते हैं।

मेरे एक मित्र को पढ़ने की बिल्कुल फुर्सत नहीं होती। वे इस उम्मीद में हर पोस्ट को लाइक करते रहते हैं कि लाइक के बदले उन्हें भी लाइक मिलता रहेगा, चाहे वह किसी के देहावसान की हो, दुर्घटना या किसी इनाम-इकराम की। मुझे लगता है कि सोशल मीडिया का हम सही सदुपयोग तभी कर पाएंगे, जब आत्ममुग्धता से मुक्त होकर स्वयं में आलोचक बनने का साहस पैदा करेंगे। स्वयं के आलोचक बन कर ही हम किसी अन्य की निष्पक्ष आलोचना करने के हकदार हो सकते हैं।

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