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दुनिया मेरे आगे: स्मृतियों का झरोखा

आज के उजाले और आने वाले कल की रोशनी में भी बीते हुए कल के अंधकार की स्मृति को महसूस कर हम अपनी जीवन-फिल्म को खुद ही निराशाजनक और दुखद बना डालते हैं। कभी-कभी तो गुजरे हुए पलों की पीड़ा हम पर इतनी हावी हो जाती है कि अवसाद सहित अन्य व्याधियां घेर लेती हैं।

हर दिन यादें बनाने और अपने मस्तिष्क को नए अनुभव देने की कोशिश करें। (स्रोत: गेटी / थिंकस्टॉक)

एकता कानूनगो बक्षी

हमारे जीवन और किसी फीचर फिल्म में काफी समानता देखने को मिलती है। फिल्मों की तरह ही हमारे जीवन मे भी कई चरित्र और पात्र होते हैं। एक ही व्यक्ति कई तरह की भूमिकाएं भी निभाता है। कह सकते हैं कि हर दिन ही एक नई पटकथा हमारे सामने होती है, जिसके लिए संवाद, भावनाएं, नाटक, अभिनय और यहां तक कि प्रसंग का चरम या ‘क्लाइमेक्स’ तक कभी-कभी खुद को ही गढ़ना होता है। जीवन की फिल्म के निर्देशक भी हम होते हैं और अभिनेता भी। हां, कभी-कभी यह जरूर लगता है कि कहानी लेखक यकीनन कोई और है, क्योंकि आगे आने वाले दृश्यों के बारे में पहले से अंदाजा लगाना कठिन होता है।

हम यकीन से नहीं कह पाते कि ऐसा क्या कुछ घटित होने वाला है। हमारे अंदाजे से बिल्कुल उलट भी कहानी मोड़ ले लेती है। इसके साथ ही जीवन रूपी इस फिल्म की अवधि का भी हमें ज्ञान नहीं होता। कब ‘दी एंड’ हो जाए, कहा नहीं जा सकता। यही कारण है कि अपनी इस फिल्म में अपने कारनामे और कौशल दिखाने और उसे ‘सुपर हिट’ करने की जद्दोजहद लगातार चलती रहती है।

सेल्युलाइड पर बनी फीचर फिल्म के दृश्यों को बहुत ही तरकीब से रील में सुरक्षित रखा जा सकता है। समय-समय पर फिर से चलाने या आगे बढ़ाने की सुविधा भी उसमें उपलब्ध रहती है। जबकि हमारे जीवन के दृश्यों को रिकॉर्ड करने के लिए कैमरा या रिकॉर्डर तो हमेशा उपलब्ध नहीं रहता, लेकिन हमारे मस्तिष्क में हमेशा के लिए सारी स्मृतियां दृश्य-दर-दृश्य उम्र भर के लिए अंकित होती जाती हैं।

स्मृतियों में झांकने का अपना अद्भुत सुख होता है। अक्सर देखा गया है कि कुछ लोगों की रील पुरानी स्मृतियों या कहें ‘फ्लैशबैक’ या अतीत की स्मृतियों में ही अटक जाती हैं। खुशियों के लम्हों को याद कर अपने वर्तमान को आनंद से भर लेना तो ठीक है, पर जब व्यक्ति ‘फ्लैशबैक’ में जाकर दुखद प्रसंगों में खुद को डुबो लेता है तो जीवन की रील कुछ उलझ-सी जाती है।

समय के निरंतर गतिमान होने के बावजूद कई बार कुछ पीड़ा हमारे ही पूर्वाग्रहों के कारण हमारी पीठ पर सवार हो जाती है। भूतकाल से वर्तमान और फिर भविष्य तक वे परजीवी की तरह हमारे साथ यात्रा करने लगती है। आज के उजाले और आने वाले कल की रोशनी में भी बीते हुए कल के अंधकार की स्मृति को महसूस कर हम अपनी जीवन-फिल्म को खुद ही निराशाजनक और दुखद बना डालते हैं। कभी-कभी तो गुजरे हुए पलों की पीड़ा हम पर इतनी हावी हो जाती है कि अवसाद सहित अन्य व्याधियां घेर लेती हैं।

बीते समय में हुई गलतियां, बिछोह, संघर्ष, विफलता के दृश्य, जो कि समय-समय पर हमारी कमजोरियों को, हमारे अंधेरे, अकेलेपन को रेखांकित करते हुए हमारी स्मृतियों में बिना लगाम आते रहते हैं, उनमें ज्यादा डूब जाना भी हमारे वर्तमान पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। खुद को इस प्रवृत्ति से बचा लेने में ही भला है। चाह कर भी हम बीते समय मे नहीं जा सकते, न ही हम पिछली किसी दुर्घटना को बदल सकते हैं।

हां, हम उनसे सबक जरूर ले सकते हैं कि पहले हुई गलतियों की पुनरावृत्ति न हो। वर्तमान में हमारे कार्य हमारी कोशिशें इतनी प्रभावी हों कि उसकी सार्थक जगमगाहट के सामने हर अंधेरा कोना रोशन हो जाए। जब हम अपना लक्ष्य या उद्देश्य बड़ा रखते हैं और जिसमें हर वर्ग, हर प्राणी की बेहतरी की कामना निहित होती है, तब अपने आप ही कई तरह की आशंकाएं, डर, दुख और पीड़ा हमसे दूर छिटक जाती है।

जब भी स्मृतियों से निकल वियोग के दुखद दृश्य हमे परेशान करने लगें तब उन दृश्यों से ध्यान हटाने की जरूरत होती है और उन पलों को याद करना जरूरी होता है, जिनमें वियोग या बिछोह से पहले उस व्यक्ति के साथ बिताए खुशियों के पल मौजूद हों। उसके साथ की खूबसूरत यादें, बातचीत की वे बातें, जो उसके चले जाने के बाद भी हमारे साथ स्मृतियों में मौजूद होती हैं।

उन स्मृतियों में तब थोड़ा झांक कर देखेंगें तो जीवन आनंद में डूब जाएगा। कठिन समय के संघर्षों को याद करते हुए हमें दुखी हो कर खुद के थके हुए तन मन को याद नही करना चाहिए, बल्कि खुद को एक योद्धा की तरह देखना चाहिए जो हर अवरोध का मुंहतोड़ जवाब देकर आगे बढ़ रहा है।

भविष्य की कहानी लिखना तो हमारे हाथ में शायद उतना नहीं है, पर अपने बीते हुए समय से सीखते हुए वर्तमान की पटकथा के लेखक हम जरूर बन सकते हैं। सकारात्मक दृष्टिकोण से अगर हम अपने बीते कल में झांकेंगे तो हमारी कहानी ही हमें प्रेरणा देती हुई नजर आएगी। हमारे कठिन संघर्ष हमारे जीवन मे एडवेंचर या साहस का रूप लेकर हमारे व्यक्तित्व को बेहतर और सक्षम बनाते नजर आने लगेंगे।

पिछली गलतियां आज हमें तजुर्बेदार बना देती हैं, बीते समय में जो कुछ खोया वह भीतर के प्रेम की उपस्थिति का अहसास करा देता है, अपनों की कद्र करना और समय का महत्त्व समझा देता है तो स्मृतियों में झांकने की यह प्रवृत्ति जीवन को एक सुखद फिल्म में निश्चित ही रूपांतरित कर देती है।

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