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तटस्थता बनाम सरोकार

तटस्थता जीवन का एक ऐसा भाव है, जिसको जन सामान्य में आमतौर पर अच्छा माना जाता है।

तटस्थता बनाम सरोकार
सांकेतिक फोटो।

अच्छे और शांत स्वभाव के व्यक्ति की पहचान भी आमतौर पर इन्हीं गुणों के आधार पर की जाती है कि अमुक व्यक्ति बहुत सज्जन हैं और वे अपने काम से काम रखते हैं। वे न तीन में होते हैं और न तेरह में… बहुत सीधे-सादे होते हैं बेचारे। किसी वाद-विवाद में नहीं पड़ते। लेकिन सामाजिक रूप से परिवार और संस्थाओं में निर्णय लेते समय उपेक्षा भी ऐसे ही लोगों की सबसे ज्यादा की जाती है। जब बातचीत या किसी काम के संदर्भ में इस तरह के व्यक्ति का जिक्र आता है तो अक्सर लोग कहते हुए सुने जाते हैं कि ‘अरे भाई साहब से क्या पूछना… वे तो निहायत शरीफ आदमी हैं, उनके तो जुबान ही नहीं है… या वे बहुत बोलते हैं… बेकार की बातों में नहीं उलझते।’

यह सब ठीक, लेकिन प्रश्न यह है कि जुबान न होना क्या सभी मौकों पर या सभी संदर्भों में हर स्थिति में उचित और सही है? अगर किन्हीं स्थितियों में किसी व्यक्ति की यह आदत अन्याय का विरोध न करने और अपनी आंखों के सामने अत्याचार को होते देखते रहने के रूप में भी सामने आए तो क्या इसे भी सही माना जाएगा? क्या एक सतर्क, सचेत और सुशिक्षित व्यक्ति को ऐसे कुछ नाजुक अवसरों पर मौन धारण कर लेना चाहिए? इस तरह के मौन किसी व्यक्ति के भला होने का परिचायक हो सकता है, लेकिन यही मौन कई बार क्या गलत चीजों के लिए रास्ता नहीं बना देता है? हमारे आसपास बिखरी शिक्षा, महापुरुषों की कहानियां और प्रेरणादायक संस्मरण हमें क्या सिखाते हैं? हम विभीषण, महात्मा विदुर, वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, कबीर, कुम्भनदास आदि के जीवन से क्या प्रेरणा लेते हैं?

ये वैसे व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने निर्णायक समय में अपनी भूमिका को ईमानदारी से निभाया। अपनी पहुंच और सोचने की सीमा में जहां भी इन्हें जरूरी लगा, तत्कालीन परिस्थितियों में गलत लगने वाली बातों और चलन पर सवाल उठाया, उसके प्रति लोगों को अपनी भाषा में जागरूक किया। उनके विचारों से उनके आसपास के समाज में बड़ा बदलाव आया और भारी पैमाने पर लोग उनके विचारों के अनुयायी बने। इसीलिए संपूर्ण जगत उनके योगदान को आज भी याद रखता है। कठिन समय में जो साहस करके अपने कर्तव्यों का पालन करता है और हृदय की आवाज को सुनता है, वही याद किया जाता है। न कि तात्कालिक सुविधा या स्वार्थ को चिरकाल तक स्मरण किया जाता है।

तटस्थता कभी सुविचारित या सुविधा का मामला हो सकती है, लेकिन कई बार यह एक स्वार्थगत भाव भी है जो किसी व्यक्ति को नाकारा और आत्मकेंद्रित बना दे सकता है। उससे किसी को भले ही कोई क्षणिक उपलब्धि हासिल हो जाए, पर हम लोगों के दिल में जगह कभी नहीं बना पाएंगे। ‘न लोक से मथुरा न्यारी’, ‘न ऊधो का लेना न माधो का देना’, ‘काम से काम रखना’ आदि मुहावरे नकारात्मक भाव ज्यादा देते हैं। हालांकि लोक के बीच कई बार इनके प्रति मुग्ध भाव देखा जाता है। मगर इनसे कोई सकारात्मक और ऊर्जापरक संदेश नहीं मिलता।

मनुष्य का समाज अपने अर्थ में बहुत व्यापक है और एक दूसरे के संयोग और सहयोग से ही यहां तक पहुंच सका है। अलग-थलग रहना या अपने आप में गुम रहना जीवन को सीमित करता है। आज की स्वार्थी और ‘मैं और मेरा परिवार’ वाली दुनिया के दर्शन में यह चिंतन हो सकता है बहुत सही बैठता हो और कई लोग इसके हिमायती हो सकते हैं, लेकिन यह समष्टि दर्शन नहीं है। इससे समाज का भला कभी नहीं हो सकता।

सवाल है कि फिर गरीबों, वंचितों और महिलाओं के खिलाफ अन्याय होने पर कौन प्रतिरोध की आवाज उठा पाएगा? क्या शिक्षा और जागरूकता हमें कायर और स्वकेंद्रित होना सिखा रही है? क्या हम दिन पर दिन चालाक और संवेदनहीन होते जा रहे हैं? यह किसी से छिपा नहीं है कि खुद को पढ़ा-लिखा मानने वाले लोग या तबके गरीब या दलित-वंचित तबकों के अधिकारों के प्रति कई बार संवेदनहीन तरीके से पेश आते हैं और यहां तक कि विरोध भी करते हैं।

सड़क पर दुर्घटना देख कर न रुकना और चुपचाप आगे बढ़ जाना, किसी महिला से दुर्व्यवहार पर या गांवों में दलित और गरीब के खिलाफ अपराध होने पर नजरें फेर लेना ऐसे ही उदाहरण हैं, जिस पर समवेत प्रयासों की जरूरत है। बेशक इस पर कानून और प्रशासन का पक्ष भी जुड़ा है, जिसका सहयोग अनिवार्य है। फिर भी एक दिन ऐसा आता ही है कि लोग जान की परवाह न करते हुए सड़कों पर निकल आते हैं, फिर चाहे वह कोई भी समाज हो या देश हो। वसीम बरेलवी का शेर है- ‘उसूलों पर जहां आंच आए, टकराना जरूरी है/ जो जिंदा हो तो फिर जिंदा नजर आना जरूरी है।’ जीवित होने का प्रमाण, बदलाव और साहस की आंधी हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठती। एक जीवंत समाज अपने सरोकारों से ज्यादा दिनों तक विमुख या तटस्थ होकर कभी नहीं बैठ सकता।

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