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दुनिया मेरे आगे: वर्चस्व की भाषा

एक ओर हिंदी विश्व बाजार की भाषा बन रही है, वैश्विक फलक पर भी इसे पढ़ाया जाने लगा है, वहीं देश के भीतर ही उत्तर प्रदेश में माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक में लगभग आठ लाख बच्चों का हिंदी में फेल होना हिंदी भाषी प्रदेश में हिंदी के प्रति उपेक्षित धारणा को तो दर्शाता ही है, अन्य हिंदीतर राज्यों में हिंदी की दशा पर भी हमारा ध्यान ले जाता है। आज हिंदी ग्लोबल तो हुई है लेकिन स्थानीय स्तर पर अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ा है।

देश में हिंदी भाषा के प्रति दुराग्रह चिंता का विषय है।

भावना मासीवाल

अपनी भाषा के ज्ञान के बिना व्यक्ति का विकास संभव नहीं, फिर वह मातृभाषा हो या राष्ट्रभाषा। भाषा का ज्ञान मनुष्य के व्यक्तित्व विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम होता है। यही माध्यम उसे जमीन से जोड़ता है और विकास की ओर बढ़ाता है। लेकिन वर्तमान समय में ‘ज्ञान’ अंग्रेजी भाषा के एकाधिकार में चला गया और बच्चों के ज्ञानार्जन का प्रवाह कठिन से सहज की ओर बहना आरंभ हो गया है। जबकि ज्ञान की परंपरा सहज से कठिन की ओर बढ़ती है जो बच्चे के बौद्धिक विकास में सहायक होती है। अपनी मातृभाषा में शिक्षा का अभाव बच्चों की सीखने की क्षमता को न केवल प्रभावित करता है, बल्कि उन्हें हीनता बोध से ग्रसित बनाता है। आज भी अंग्रेजी विज्ञान और तकनीक की भाषा है और इस कारण समाज का एक बड़ा वर्ग इससे दूर है।

इसका एक अन्य कारण भाषाओं का संघर्ष भी है। इस संघर्ष में कुछ भाषाएं लुप्त हो चुकी हैं, कुछ अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं, कुछ जीवित रहने का संघर्ष कर रही है तो कुछ बोली से भाषा बनने का। कुछ का संघर्ष पहचान का है तो कुछ का संघर्ष वर्चस्व का। झगड़ा बोलियों में भी है और भाषाओं में भी। इन दोनों की टकराहट ने ही आजादी के इतने वर्षों बाद भी हिंदी को न राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया न पूरी तरह राजभाषा का। हमारा बहुभाषिक होना एक ओर हमें शब्द संपदा में समृद्ध करता है तो दूसरी ओर हिंदी और हिंदीतर भाषी के मध्य मतभेद उत्पन्न करता है। यही कारण है कि आज भी दक्षिण भारत में मातृभाषा के बाद दूसरी सर्वाधिक प्रयोग की भाषा अंग्रेजी है।

ऐसे में इतिहास की ओर देखते हैं तो आजादी के आंदोलन में हिंदी के प्रति सर्वाधिक प्रेम देखा गया। हिंदी के प्रति इस प्रेम ने ही महात्मा गांधी को गुजराती से हिंदी-हिंदुस्तानी से प्रेम कराया। दूसरी ओर, मुंशी प्रेमचंद को उर्दू से हिंदी में लिखने पर विवश किया, क्योंकि उस समय का बड़ा पाठक वर्ग हिंदी प्रेमी था और यह संपूर्ण राष्ट्र के विचार, व्यवहार और हृदय की भाषा थी। लेकिन वर्तमान, इतिहास से एकदम विपरीत है।

एक ओर हिंदी विश्व बाजार की भाषा बन रही है, वैश्विक फलक पर भी इसे पढ़ाया जाने लगा है, वहीं देश के भीतर ही उत्तर प्रदेश में माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक में लगभग आठ लाख बच्चों का हिंदी में फेल होना हिंदी भाषी प्रदेश में हिंदी के प्रति उपेक्षित धारणा को तो दर्शाता ही है, अन्य हिंदीतर राज्यों में हिंदी की दशा पर भी हमारा ध्यान ले जाता है। आज हिंदी ग्लोबल तो हुई है लेकिन स्थानीय स्तर पर अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ा है।

सच यह है कि अंग्रेजी न जानने के कारण बहुत सारी युवा प्रतिभाएं अवसरों से वंचित रह जाती हैं। भारतीय भाषाओं की इस स्थिति का बड़ा कारण हमारी व्यवस्था है जो पूरी तरह अंग्रेजी भाषा पर निर्भर है। भारत की बाईस भाषाओं में कुछ को भाषा और कुछ को कार्यभाषा का दर्जा प्राप्त है। इसके बावजूद देश में अधिकांश प्रशासनिक कार्य अंग्रेजी में होते हैं। देश के भीतर भाषा के स्तर पर हीनता बोध का ही प्रभाव है कि आज शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और रोजगार की भाषा अंग्रेजी बन गई है।

देश की प्रतिष्ठित सेवाओं में शुमार संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा भी अंग्रेजी के वर्चस्व को तोड़ने में नाकाम रही है, क्योंकि यहां हर साल परीक्षा में चयनित विद्यार्थियों में अधिकतर का परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी होता है। कुछ गिने-चुने ही विद्यार्थी होते हैं जो अपनी मातृभाषा और हिंदी भाषा के जरिए इस पद तक पहुंच पाते हैं। आज स्थिति यह कि विद्यार्थी हिंदी पर गर्व तो करते हैं, लेकिन उसे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा का माध्यम बनाने से डर रहे हैं। उनके भीतर का यह डर अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व से उत्पन्न हुआ है, जिसने हिंदी के साथ ही उसकी अन्य भाषाओं को कमजोर और हीन बना दिया है।

नई शिक्षा नीति 2020 में बच्चों की सीखने की क्षमता को हीनता बोध से बाहर लाने के लिए मातृभाषा में शिक्षा की बात की गई है। इस पर आजादी के समय से ही बहस चल रही थी जो मातृभाषा में शिक्षा की हिमायती थी। लेकिन जमीनी स्तर पर यह कितनी कारगर थी? इसे नई शिक्षा नीति की रिपोर्ट से जाना जा सकता है, जहां कहा गया कि ‘दुर्भाग्य से, भारतीय भाषाओं को समुचित ध्यान और देखभाल नहीं मिल पाई, जिसके तहत देश ने विगत पचास वर्षों में दो सौ बीस भाषाओं को खो दिया है।’

यूनेस्को ने एक सौ सत्तानबे भारतीय भाषाओं को लुप्तप्राय घोषित किया है। विभिन्न भाषाएं विलुप्त होने के कगार पर हैं। खासकर वे भाषाएं जिनकी लिपि नहीं हैं। नई शिक्षा नीति बेशक आज मातृभाषा में शिक्षा की पहल कर रही है, लेकिन वह उसकी अनिवार्यता पर अभी खामोश है। इसमें तकनीकी क्रांति और नवाचार को तो शिक्षा का अहम हिस्सा बनाया गया, लेकिन उसके माध्यम की भाषा तय नहीं की गई। हर वर्ष एक खास समय पर हिंदी को बचाने की बहस होती है, लेकिन यह बहस कितनी कारगर होती है, इसे जमीनी स्तर पर देश की अंग्रेजी माध्यम से संचालित कार्य प्रणाली में देखा जा सकता है।

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