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दुनिया मेरे आगे: हाशिये पर सरोकार

इक्कीसवीं सदी का पहला दशक भारत में टेलीविजन समाचार चैनलों के विस्तार का दशक भले रहा है, पर इसके साथ ही इसी दशक में चैनलों की वैधता और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे थे।

समाचार चैनलों के प्रति मीडिया विमर्शकारों के बीच दुविधा की स्थिति दिखती है

करीब अठारह साल पहले जब मैं पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था, तब कहा जा रहा था कि टेलीविजन मीडिया अभी शैशव अवस्था में है। यह संक्रमण काल है और कुछ वर्षों में ठीक हो जाएगा। लेकिन पिछले कई सालों की प्रवृत्ति पर गौर करें तो यही लगता है कि यह संक्रमण फैलता ही गया। पहले मुख्य रूप से हिंदी के समाचार चैनल इससे ग्रसित थे, अब अंग्रेजी के चैनलों में भी इसका प्रकोप बढ़ गया दिखता है। अंग्रेजी और हिंदी के चैनल एक ‘खंडित लोक’ का निर्माण करते रहे हैं। उनके दर्शक वर्ग भी अलग रहे हैं। पर अब यह विभाजक रेखा तेजी से मिटती हुई दिख रही है।

लेकिन अखबारों की दुनिया में अब भी कई बार ऐसा कुछ दिख जाता है, जिससे सीमित पैमाने पर ही सही, लेकिन कुछ बचे होने की उम्मीद हो जाती है। पिछले दिनों एक अखबार ने अपने मुख्य पृष्ठ पर एक तस्वीर प्रकाशित किया और शीर्षक दिया- ‘टीवायरस’। यह तस्वीर टेलीविजन समाचार चैनलों के हाल के उस रवैये पर एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी है, जिस पर काफी सवाल उठे हैं।

इसके अलावा भी सरोकार के बचे होने के उदाहरण देखे गए और पत्रकारिता की दुनिया के भीतर से टीवी मीडिया के इस चेहरे, लोगों की निजता में जबरन घुसने को कोशिश पर चिंता जाहिर की गई। दरअसल, यह ‘वायरस’ जब से टीवी चैनलों ने चौबीस घंटे का प्रसारण शुरू किया, तब से मौजूद है और अभी तक इसका कोई ‘इलाज’ उपलब्ध नहीं है।

हालांकि दर्शकों में अब तक इसका सामना करने की सलाहियत विकसित हो जानी चाहिए थी! गौरतलब है कि भारत में उदारीकरण की नीतियों के फलस्वरूप पिछले दो दशक में निजी टेलीविजन समाचार चैनलों का अभूतपूर्व प्रसार हुआ है, पर संवाद एकतरफा ही रहे। कह सकते हैं कि सोशल मीडिया या अखबार से इतर यह इस माध्यम की विशेषता है।

असल में टेलीविजन मीडिया उद्योग में दर्शकों की उपस्थिति, उनकी केंद्रीय भूमिका को लेकर हमारे यहां कोई खास शोध नहीं है। कुछ छिटपुट शोध पत्र मौजूद हैं जो दर्शकों को केंद्र में रख कर टेलीविजन को परखने की कोशिश करता है। पर ये चौबीस घंटे समाचार चैनलों को अपनी जद में नहीं लेता, दूरदर्शन, धारावाहिकों के इर्द-गिर्द ही है। मीडिया शोध में इस बात का उल्लेख बार-बार होता है कि दर्शक किसी भी संदेश को अपने नजरिए से देखता-परखता है, वह महज एक उपभोक्ता नहीं है। उनके पास संदेश और संवाद को नकारने की भी सहूलियत रहती है।

मीडिया आलोचक रेमंड विलियम्स ने टेलीविजन माध्यम को तकनीक और विशिष्ट सांस्कृतिक रूप में परखा है। चूंकि यह एक दृश्य माध्यम है, इस लिहाज से टीवी पर प्रसारित होने वाली खबरों से दर्शकों के बीच सहभागिता, घटनास्थल पर होने का बोध होता है। इन खबरों के साथ विज्ञापन भी लिपटा हुआ दर्शकों तक चला जाता है, जो इन कार्यक्रमों की लागत और चैनलों के मुनाफे का प्रमुख जरिया है। उदारीकरण के बाद खुली अर्थव्यवस्था में खासतौर पर टीवी मीडिया पूंजीवाद का प्रमुख उपक्रम है।

उसकी एक स्वायत्त संस्कृति भले हो, पर अब वह कारपोरेट जगत का हिस्सा है। जब भी हम मीडिया की कार्यशैली की विवेचना करेंगे तो हमें पूंजीवाद और मीडिया के रिश्तों की भी पड़ताल करनी होगी। निस्संदेह, हाल के वर्षों में बड़ी पूंजी के प्रवेश से मीडिया की सार्वजनिक दुनिया का विस्तार हुआ है, लेकिन पूंजीवाद के किसी अन्य उपक्रम की तरह ही टीवी मीडिया उद्योग का लक्ष्य और मूल उदेश्य टीआरपी बटोरना और मुनाफा कमाना है। ऐसे में लोक हित के विषय हाशिये पर ही रहते हैं।

भारत में चौबीसों घंटे चलने वाले इन समाचार चैनलों के प्रति मीडिया विमर्शकारों के बीच दुविधा की स्थिति दिखती है। खबरों की पहुंच गांव-कस्बों तक हुई, एक नेटवर्क विकसित हुआ। इसने भारतीय लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत किया है। वहीं समाचार की एक ऐसी समझ इसने विकसित की जहां मनोरंजन पर जोर रहा है।

इक्कीसवीं सदी का पहला दशक भारत में टेलीविजन समाचार चैनलों के विस्तार का दशक भले रहा है, पर इसके साथ ही इसी दशक में चैनलों की वैधता और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगे थे।

इसकी तीखी आलोचना भी सामने आने लगी थी कि टीवी चैनल दिन भर कचरा परोसते रहते हैं। लेकिन कुछ विश्लेषकों ने यह राय भी जाहिर की कि लोग भी शायद कचरा ही देखना चाहते हैं। जाहिर है, सवाल दर्शकों का भी है, जिस पर हम आमतौर पर चर्चा नहीं करते।

हिंदी समाचार चैनलों की एक प्रमुख प्रवृत्ति स्टूडियो में होने वाले बहस-मुबाहिसे हैं, जिसका एक तय पैमाना है। ऐसी प्रस्तुतियों के संचालकों का ध्यान ऐसे मुद्दों पर बहस कराना होता है, जिससे स्टूडियो में एक नाटकीयता का संचार हो। इनका उद्देश्य दर्शकों की सोच-विचार में इजाफा करना नहीं होता, बल्कि उनके चित-वृत्तियों के निम्नतम भावों को जागृत करना होता है।

मीडिया आलोचक प्रोफेसर निल पोस्टमैन ने अमेरिकी टेलीविजन के प्रसंग में कहा था कि ‘गंभीर टेलीविजन अपने आप में विरोधाभास पद है और टेलीविजन सिर्फ एक जबान में लगातार बोलता है- मनोरंजन की जबान।’ यह शायद हमारे के समाचार चैनलों के लिए भी सच होता गया है। पोस्टमैन के मुताबिक एक समाचार कार्यक्रम सीधे शब्दों में मनोरंजन का एक प्रारूप है, न कि शिक्षा, गहन विवेचन या विरेचन का।

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