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बेरहम है यह सड़क

पिछले दिनों सड़क पर खूब राजनीति हुई, खूब बहसें हुर्इं। मगर मैं उस सड़क पर आपको नहीं ले जा रही।

पिछले दिनों सड़क पर खूब राजनीति हुई, खूब बहसें हुर्इं। मगर मैं उस सड़क पर आपको नहीं ले जा रही। मैं तो बस बताना चाहती हूं कि हर सड़क की भी अपनी राजनीति होती है। खुद पर से गुजरने वाले यात्रियों के साथ इसका अपना ही नाता होता है। सुबह, दोपहर, शाम इसकी सूरत बदलती जाती है। जिस सड़क पर मैं आपको ले जाना चाहती हूं, वह दिल्ली से उत्तर प्रदेश को जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग-24 है। गाजियाबाद शहर के सीने पर भागती हुई यह सड़क बहुत बेरहम है।

मोबाइल पर खेले जाने वाले गेम की तर्ज पर। आपको पता नहीं कि आने वाले मोड़ पर क्या बाधा आएगी और उससे कैसे निपटना होगा! फैसला तत्काल लेना होगा। एक चूक आपको यहीं पर ढेर कर सकती है। मोबाइल गेम की तरह इसे दोबारा ‘रि-प्ले’ नहीं किया जा सकेगा। यहां दर्ज किया गया हर सफर हर रोज एक गेम जीतने जैसा होता है, जिसके इनाम में आपको मिलती है आपकी जान की सलामती!

एनएच-24 का नामकरण किया जाना हो तो किसी कुख्यात व्यक्ति की तलाश करनी होगी। इसके लिए सुझाव मंगाए जा सकते हैं। ट्रैफिक के सारे नियम यहां धराशायी होते हैं। हो सकता है कि किसी ने ट्रैफिक नियम का पालन करते हुए लाल बत्ती पर गाड़ी रोक दी तो उसकी जिंदगी की गाड़ी यहीं थम जाए, क्योंकि पीछे से आ रही गाड़ी आपको नहीं बख्शेगी। सड़क के डिवाइडर पर हरी झाड़ियों में से कभी भी कोई उछल कर सामने आ सकता है या कोई बाइक वाला ही अवतरित हो जाएगा। एक ट्रक के पीछे-पीछे गाड़ियों का लश्कर गुजरता है कि कैसे ट्रकनुमा बाधा को पीछे किया जा सके। वहीं गाड़ियों के लश्कर को ट्रक पीं-पीं-पीं के शोर से दाएं-बाएं कर सकता है। अस्सी की गति कब आठ की गति में तब्दील करनी पड़ जाए, इसलिए पांव ब्रेक पर जमे होने चाहिए।

हर सड़क की अपनी गति और अपना ठहराव भी होता है। एनएच 24 पर भी गाड़ियां कहीं तीव्र वेग वाली लहरों-सी बहती हैं तो कहीं ऐसे थम जाती हैं जैसे अब इससे पार निकलना मुश्किल होगा। ट्रैफिक जाम में फंसे रहने पर अच्छा है कि आप अपने प्रिय गानों की एक लंबी सूची बना लें और मुक्त कंठ से गाएं। गाड़ियों के शोर में आपकी आवाज किसी को नहीं सुनाई देगी।

एनएच-24 पर यातायात का कोई एक नियम नहीं। आप पैदल चल रहे हैं, या बाइक पर, कार में, ऑटो में, बस में, इससे सड़क के नियम आपके लिए तय होते हैं। कई बार सुबह के समय यहां आने और जाने वाली दोनों राह पर एक ही दिशा के मुसाफिर उड़ रहे होते हैं। इतनी अराजकता कि लगता है जैसे किसी राजनीतिक दल की रैली हो रही हो। डिवाइडर के इस और उस तरफ सिर्फ मोटरसाइकिल वालों की कतारें होती हैं। ट्रैफिक पुलिस भी होती है, लेकिन बहुत लाचार-सी। उत्तर प्रदेश की सीमा को पार कर यही ट्रैफिक जब दिल्ली में प्रवेश करता है तो सारे नियम पटरी पर लौट आते हैं। लोग तो वही हैं, फिर एक छोर पर इतने अराजक कैसे! हर सफर आपके अनुभव में इजाफा करता है। किसी एक सड़क पर रोज चलते-चलते आप उसके गड्ढों से परिचित हो जाते हैं। कौन-सा मोड़ तेज होगा, कहां ठहराव मिलेगा! सड़क से उतरती हुई बस्तियों की तरफ गाड़ियां आहिस्ता हो जाएंगी, यहां लोग अपने घरों का रुख करते हैं।

अगर इन सारी बातों को उलटा कर दें और कभी सड़क के दिल की बात सुनें। किसी नाटक की तर्ज पर। हो सकता है सड़क अपने ही किसी मोड़ पर गाड़ियों के टूटे हुए शीशे के पास सुबकती हुई मिल जाए। तेज हॉर्न बजा रही गाड़ियों से चीख कर कहती हुई कि इतना शोर क्यों मचाते हो बाबूजी, मैं तो बहरी हुई जाती हूं… मैं तो सबको उसके तय समय पर मंजिल तक पहुंचाना चाहती हूं! लेकिन सब आगे निकलने की होड़ में सारे नियम तोड़ देते हैं। सड़क कहती है कि पहले बच्चे स्कूल पहुंच जाएं, मरीज अस्पताल, फिर तुम्हें दफ्तर पहुंचा दूंगी। किसी अनहोनी पर सड़क चीख-चीख कर शोर मचा देती है कि कोई पकड़ो उसे! अपनी रौ में चलते बच्चे की उंगली पकड़ कर सड़क उसे किनारे कर देती है।

एनएच-24 से मेरा हर रोज साक्षात्कार होता है। शह और मात का खेल सरीखा। करीब दो घंटे का समय हर रोज इस सड़क पर गुजरता है। सुबह सूरज गाड़ी के शीशे के सामने से चमकता हुआ मेरी आंखों को चौंधियाता है। शाम को मेरे साथ ही जैसे अपना सफर पूरा करता हुए ढल जाता है। मैं हर रोज सोचती हूं कि सूरज को कभी मात देकर घर पहले पहुंच जाऊं। तो जरा सोचिए और बताइए कि इस सड़क का नाम किस ‘महापुरुष’ के नाम पर रखा जाए!

वर्षा

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