जीवन जीने का नाम

बीज पर चींटियों, अंकुरों पर पक्षियों और पौधों पर पशुओं की नजर रहती है।

सांकेतिक फोटो।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

बीज पर चींटियों, अंकुरों पर पक्षियों और पौधों पर पशुओं की नजर रहती है। इन सबसे बचते-बचाते बीज वृक्ष बनता है। फिर वही चींटियां, पक्षी और पशु उसकी छाया में आराम करने आते हैं। जीवन भी उस बीज की तरह होता है। उसे समय देने की आवश्यकता होती है। सहनशीलता जीवन को महाजीवन बनाती है। जीवन में जो छोड़ कर चले गए हैं, उनके लिए दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। जो हमारे साथ हैं, उनका आदर करना नहीं भूलना चाहिए। कोई आकर आपके दुख हर लेगा, इस प्रतीक्षा में मत रहिए। स्वयं के लिए धैर्यवान बनिए। अपना महत्त्व समझिए। लोग आपके मन और व्यक्तित्व को नहीं देखते। सुनी-सुनाई पर विश्वास कर लेते हैं। अपनी भड़ास निकाल लेते हैं। मगर कभी-कभी हमारी आंखें ही हमें धोखा दे देती हैं। कई बार सुनी-सुनाई बातों से हम अपना ही नुकसान कर लेते हैं।

देखने में आया है कि यह जीवन रूपी बीज जिनके पास है उन्हें इसका मोल नहीं है। जिसके पास नहीं, उनके लिए अनमोल है। जिस तरह एक बीज को पानी, खाद से सींचा जाता है, उसी प्रकार जीवन को भी प्रेम, आत्मविश्वास, विश्वास से बनाया जाता है। धीरे-धीरे वह बीज बड़ा होता है और एक वृक्ष का रूप ले लेता है। ठीक उसी तरह जीवन भी धीरे-धीरे निकलता जाता है। जैसे एक वृक्ष अपने घने तने और पत्तों से सबको छाया, फल देता और मनोरंजन करता है, उसी प्रकार सभी अपने जीवन में लोगों को प्यार, स्नेह बांटने की कोशिश करते हैं। फिर धीरे-धीरे वृक्ष बूढ़ा होता चला जाता है, उसी प्रकार हमारा जीवन भी धीरे-धीरे बूढ़ा होता जाता है। जिस प्रकार बूढ़े होने के बाद वृक्ष के मायने बदल जाते हैं उसी प्रकार जीवन के भी। कभी-कभी किसी वृक्ष को काट दिया जाता है, जिनसे वे मर जाते हैं। वैसे ही कभी-कभी इस जीवन के खेल में भी कोई बीज तक सीमित रह जाता है, कोई छोटे से पौधे तक और कोई बड़े वृक्ष तक। इसीलिए जीवन बहुत अनमोल है।

एक बीज बोकर प्रतिदिन यह देखना कि फल लगे हैं या नहीं, व्यर्थ है। इसलिए कि अभी उसे विकसित होना है। पौधे को वृक्ष बनना है। तभी तो बौर आएगी। फल लगेंगे। इसी तरह मुझे यह बनना है, वह बनना है की इच्छा रखने वाले को परिश्रम और लगन की आवश्यकता पड़ती है। तभी तो जीवन बीज से अंकुर और अंकुर से वृक्ष बनेगा। छाया देगा, फूल देगा और खाने के लिए फल देगा। जीवन में पीड़ा, आंसू और खुशियां कभी शाश्वत नहीं होतीं। जीवन सदैव एक-सा नहीं रहता। मनुष्य केवल जीवन के एक पहलू को देखता और महत्त्व देता है। वह सुख चाहता है, लेकिन दुख के लिए तैयार नही रहता। जीवन रूपी सिक्के के दुख और सुख दो पहलू हैं। अगर जीवन में एक आएगा तो निश्चित ही दूसरा भी आएगा। पीड़ा और खुशियां भी ठीक उसी तरह से होती हैं। जीवन सुख-दुख का संगम है।

जीवन में हार-जीत लगी रहती है। इसीलिए हारने पर कुंठित होने और जीतने पर घमंड करने की आवश्यकता नहीं है। जीवन में धोखा मिले तो उससे संभलना सीखिए। बुराई में भलाई करना सीखिए। कहते हैं, हथौड़ों की मार से पत्थर मूरत बनता है। पर चोट पहुंचाने वाला हथौड़ा हमेशा हथौड़ा ही रहता है। समय की चुनौतियों और पीड़ाओं को झेल कर उठने वाला ही महान बनता है। दूसरों को कष्ट पहुंचाने वाला कभी आगे नहीं बढ़ता। धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है, यह सबसे बड़ा भ्रम है।

धन केवल भौतिक सुख दे सकता है। मानसिक, नैतिक और बौद्धिक सुख उससे परे रहते हैं। हमारे मानने से जीवन अच्छा या बुरा नहीं बन सकता, बल्कि यह तो है ही अनमोल, बस कुछ लोग अपनी भूल-चूक के चलते अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं और फिर ईश्वर और भाग्य को दोष देने लगते हैं। मगर जो समझदार होते हैं वे इसकी कीमत जानते हैं। वे हर समय अपने जीवन को बेहतर बनाने में लगे रहते हैं। इसलिए जीवन किसी के दृष्टिकोण से अच्छा या बुरा नहीं बनता, बल्कि उनके कर्मों पर निर्भर करता है कि वह उनके लिए सुंदर होगा या नहीं। यथासंभव जीवन को बेहतर बनाने के साथ-साथ इसे सही ढंग से जीने पर ध्यान देना चाहिए।

पत्ते खाने से अगर ज्ञानी बन जाते तो बकरियां आज महाज्ञानी होतीं। स्नान करने से अगर पापों से मुक्ति मिल जाती तो मछलियां कब की मोक्ष को प्राप्त हो जातीं। अगर सिर के बल तपस्या करने से भगवान की प्राप्ति होती, तो चमगादड़ को कब के भगवान मिल जाते। जो आपके भीतर नहीं है वह बाहर नहीं मिलेगा। वह तो आपके भीतर ही मिलेगा। चार दिन की दुनिया में रोने के लिए समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए। जन्म और मृत्यु के बीच लहरों-सा मचलने वाला जीवन सकारात्मक रहने का नाम है। इसलिए इसके हर क्षण को उत्सव के रूप में मनाना चाहिए। समझिए तो जीवन सरल है, नहीं तो अनंत गूढ़ रहस्य।

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