समानता की उलझी गुत्थियां

हालांकि हर व्यक्ति दूसरे से भिन्न होता है, लेकिन अलग-अलग रंग-रूप, कद-काठी, आचार-विचार, खानपान, रहन-सहन के बावजूद कुछ आपसी समानताओं के कारण अलग-अलग समूहों में अनेक लोग एक खास पहचान के साथ दिखाई देते हैं।

सांकेतिक फोटो।

एकता कानूनगो बक्षी

हालांकि हर व्यक्ति दूसरे से भिन्न होता है, लेकिन अलग-अलग रंग-रूप, कद-काठी, आचार-विचार, खानपान, रहन-सहन के बावजूद कुछ आपसी समानताओं के कारण अलग-अलग समूहों में अनेक लोग एक खास पहचान के साथ दिखाई देते हैं। इनकी समझ, जीवन शैली और जरूरतों में एक तरह की समानता दिखाई देती है। मसलन, किसी से दोस्ती करने से पहले हम एक-दूसरे की समान रुचियों, जरूरतों, पसंद-नापसंद और विचारों की समानता के कारण ही जुड़ पाते हैं। समानता की वजह से हम अधिक सहज महसूस कर पाते हैं, आपसी रिश्ते भी अधिक गहरे और लंबे समय तक निभा पाते हैं।

आमतौर पर समान व्यवसाय, आर्थिक स्थिति, जाति, धर्म, लिंग, विचारधारा, लक्ष्यों, अभियानों, रुचियों को समानता का आधार बना कर समूहों की पहचान चिह्नित या रेखांकित होती है। हमने भिन्नता से भरे समाज में समानता के आधार पर एक ऐसा ताना-बाना रच लिया है, जिसमें हम ही खुशी-खुशी कैद हो गए हैं। जरा-सा भी अपने बनाए दायरे से बाहर निकले कि हम असहज और असुरक्षित महसूस करने लगते हैं। दूसरों के समूह और उनके दायरे हमें बेहतर या कमतर नजर आने लगते हैं। समानता के आधार पर बंटे समूहों के बाहर असमानता की ऐसी दीवारें खड़ी कर दी गई हैं, जहां संवेदनाओं का क्षरण होता नजर आता है। जितना हम समानता की अगुआई करते हैं, उतनी ही उसे लेकर हमारी समझ सीमित और जटिल बनती जाती है।

जिन समानताओं को हम ढूंढ़ते नजर आते हैं, वे बुनियादी तौर पर कृत्रिम या मनुष्य की ही बनाई दुनिया का हिस्सा हैं, जिसे कुछ लोगों ने मात्र अपनी स्वार्थपूर्ति या सुविधा के लिए खड़ा कर दिया है। हम कई समूहों में बंट कर एक-दूसरे से भले जुड़े नजर आते हों, पर हमारे आपसी रिश्ते तब तक आत्मीय, प्रगाढ़ और हितकारी नहीं हो सकते, जब तक कि हम अपनी वास्तविक समानताओं का सही आकलन नहीं करते। ऐसा नहीं करके हम एक बड़े वर्ग को तिरस्कृत भी कर देते हैं।

असली समानताएं इतनी पेचीदा कभी नहीं हो सकतीं। असली समानता को समझने के लिए पूर्वाग्रह मुक्त बच्चों-सा निष्कपट मन होना बेहद जरूरी है, जो दूसरों को उनके रंग, मजहब, विचारधारा से न आंकते हुए बहुत जल्दी अपना लेता है। हम सबमें जो समानताएं हैं, वे काफी सीधी सरल-सी हैं। पहले कभी जिसे रोटी, कपड़ा और मकान तक सीमित कहा जाता था, उसमें आगे स्वास्थ्य, शिक्षा और समान नागरिक होने को जोड़ा जा सकता है। हम सभी को भोजन, जल, सुरक्षित स्थान, स्वास्थ्य, खुशी, अपनापन, सम्मान, अभिव्यक्ति और अपने आप को पूर्ण रूप से विकसित और प्रस्तुत करने की आजादी की जरूरत होती है।

इन सबमें से किसी के भी अभाव में हम सब एक जैसा ही छटपटाने लगते हैं। दो अलग-अलग समूह के बाशिंदों को एक साथ बिना भोजन के रख दिया जाए, दोनों का शरीर काफी हद तक एक जैसा व्याकुल होगा और भोजन के लिए संघर्ष करेगा। उसी तरह अपमानित होने पर भी हम सभी का मन एक जैसा ही दुखी होता है। जब हमें अपनापन और प्यार मिलता है तो हम सभी को खुशी मिलती है। आत्मीयता हमारे मन को भीतर से भिगो देती है। आनंद में हम एक-सा खिलखिला पड़ते हैं। हमारी बुनियादी समानता हमें बार-बार यह याद दिलाती रहती है कि हम सब भले अलग-अलग रास्तों से गुजर रहे हों, पर सुख-दुख हमारे साथी हैं।

यह नहीं भुलाया जा सकता कि सबसे पहले हम मनुष्य हैं। यही हमारी वास्तविक समानता और पहचान है। थोड़ा व्यापक दृष्टि से देखें तो हम पाएंगे कि प्रकृति के हर जीव से हमारा समानता का रिश्ता है। नन्ही चिड़िया के सुख-दुख, दाना-पानी की चिंता, मेहनत से अपना घरौंदा बनाने का संघर्ष क्या हमसे मेल नहीं खाता? पौधे से कुछ पल बतियाइए। हो सकता है बिना खाद-पानी के भी कुछ दिन और जीवित रह जाएगा वह!जब हम समानताओं को अपनी संकीर्ण मानसिकता से परिभाषित करने लगते हैं तो प्रकृति का पूरा संतुलन बिगाड़ देते हैं।

हम सबके भीतर मौजूद वास्तविक समानता का अर्थ और ध्येय यह होना चाहिए कि हम एक-दूसरे को बेहतर रूप से समझ सकें और एक-दूसरे का जीवन आसान बना सकें। जब हम असली समानताओं को समझ जाएंगे, तो एक बड़ी सामाजिक क्रांति के कारक और साक्षी बन पाएंगे। दूसरों के हर संघर्ष को, हर काम को उचित सम्मान देने लगेंगे।

हर रंग-रूप मुस्कुराएगा, जातियों के आधार पर होने वाला भेदभाव समाप्त होने लगेगा। आदमी, औरत, थर्ड जेंडर जैसे वर्ग विभाजन की जटिलताओं की जगह मानवीयता मुस्कराने लगेगी। जरूरी विषयों, मुद्दों पर बातचीत होगी। गैरजरूरी निरर्थक बहसों से मुक्ति संभव होगी। उससे उबर कर जब हम अपने मूल प्राकृतिक स्वरूप में दुनिया और समाज को देखने लगेंगे, तभी वास्तविक समानता लाने की असली क्रांति शुरू हो पाएगी। यह सब होने के लिए उस धूल को साफ करना जरूरी होगा, जो बाजारीकरण, राजनीति, धर्म, संप्रदाय और लाभार्जन वाली संस्थाओं ने हमारी समाज व्यवस्था पर चढ़ा कर हमें कठपुतली बना दिया है।

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