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दुनिया मेरे आगे: सुबह के फूल

सुबह के फूलों की ओर निहारिये तो वे अपने रंग-रूप के सौंदर्य के साथ-साथ एक ताजगी का अहसास कराते हैं। सो, बहुतेरे लोग उनकी ओर देखते हैं। उन्हें किसी डोलची, कटोरे या हथेली में चुनते भी हैं। पूजा-अर्चना के लिए या फिर घर की किसी मेज पर सजाने के लिए।

सुबह के फूलों की यह दुनिया दरअसल भारतीय जीवन में इतनी सामान्य, पहचानी हुई है और इतनी सतत कि अब अलग से उसकी ओर ध्यान नहीं जाता।

सुबह के फूलों की ओर निहारिये तो वे अपने रंग-रूप के सौंदर्य के साथ-साथ एक ताजगी का अहसास कराते हैं। सो, बहुतेरे लोग उनकी ओर देखते हैं। उन्हें किसी डोलची, कटोरे या हथेली में चुनते भी हैं। पूजा-अर्चना के लिए या फिर घर की किसी मेज पर सजाने के लिए। या फिर वहीं छोड़ देने के लिए कि सजा रहे उनसे पथ! बच्चन जी ने ‘निशा निमंत्रण’ संग्रह में लिखा है- ‘आ रही रवि की सवारी/ नव-किरण का रथ सजा है/ कलि कुसुम से पथ सजा है!’ हां, भारतीय जीवन में सुबह के फूल अपना एक विशेष स्थान रखते हैं। शायद ही किसी अन्य देश में सुबह फूलों के साथ इस तरह होती हो। जिनके घर में ही हों पौधे, गमले में बहुतायत से, वे उन्हें लेकर मंदिर जा सकते हैं। बाकी लोग बाहर से लाते हैं या खरीदते हैं। दक्षिण के प्रदेशों में वे सुबह-सुबह ही ठीक सब्जी-बाजार में, सब्जियों के स्टॉल की बगल में अपनी जगह बना लेते हैं। दिल्ली हो या कोलकता या मुंबई, साइकिलों पर लोग घर-घर जाकर फूल दे आते हैं। ठीक उसी शैली में जिस तरह घरों में दूध के पैकेट या अखबार पहुंचाए जाते हैं। फूलों के ग्राहक भी बंधे हुए होते हैं।

सुबह के फूलों की यह दुनिया दरअसल भारतीय जीवन में इतनी सामान्य, पहचानी हुई है और इतनी सतत कि अब अलग से उसकी ओर ध्यान नहीं जाता। कुछ नया नहीं होता। पर नहीं, वह हर नई सुबह के साथ नया ही तो होता है! हमें नया करता है। जो लोग किसी ऐसे पार्क या परिसर में रोज सैर करते हैं जहां फूल भी हों, वे जानते हैं कि उनकी सैर फूलों के साथ होती है। इसलिए रोज देखता हूं मैं चंपा के फूलों को! अहा! कितने उज्ज्वल धवल! कुछ चंपई प्रजाति वाले भी। याद कर सकता हूं हरसिंगार की, जो वैसे तो पास-पास या सामने नहीं हैं, पर मानो मैं उनका ‘झरना’ इस मौसम में अपने सामने देखता हूं। कैसे वे बिछ जाते हैं, अपनी ही काया के नीचे। कितनी भारहीनता से झरते हैं, मानो वे फूल न हों, कपास के फाहे हों, नन्हीं तितलियां। कैसी सुगंध उठती है उनसे, बहुत मुलायम, भीनी सरसाती हुई! फूल ज्यादातर सुबह ही फूलते हैं। ‘रात की रानी’ जैसे भी हैं ही। अपूर्व।

न भूलें कमल-कुमुदिनीयों को भी! नोएडा में जहां मैं रहता हूं, वहां ताल-झील वाले कमल तो नहीं हैं, पर हैं एक छोटे-से जल पुंज में कुछ। उन्हें निहारता हूं। कहीं छोटी तलैयों में उन्हें देखता हूं तो केरल के बड़े कमल-ताल याद आने लगते हैं, कमलों से भरे हुए। सुना है बुंदेलखंड के कमल तालों के बारे में भी। इस विशाल देश में, अलग-अलग प्रदेशों में, फूलों की अलग-अलग बहार है। केरल में कमल, बंगाल में चंपा और ‘शिउली’ (हरसिंगार), रक्तकरबी (इस नाम का एक नाटक भी है रवींद्रनाथ का, जिसका एक अनुवाद हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी किया है।) ‘तुलिप’ गार्डन है कश्मीर में। चंपा, जुही, बेला, ‘रजनीगंधा’ (इस नाम की एक चर्चित फिल्म ही है बासु चटर्जी की) कनेर, रात की रानी आदि कई हैं। घरेलू या जंगली तो बहुत से ऐसे भी जिन्हें हम देखते हैं, लेकिन उनके नाम नहीं जानते हैं।

सुबह के फूलों की याद अलग से इसलिए भी कि वे डालों और जमीन दोनों पर दिखते हैं। फूलों पर बहुत कुछ लिखा गया है। याद करिए ‘निराला’ की कविता ‘जुही की कली’, भवानी प्रसाद मिश्र की कविता, ‘फूल लाया हूं कमल के’ और नरेश मेहता की रचना ‘पीले फूल कनेर के’। सूची बहुत लंबी है। मनभावन, मनमोहक है, फूलों की तरह ही। सुबह-सुबह फूल तोड़ने की लंबी परंपरा रही है इस देश में। अपनी बात करूं तो पैंसठ सत्तर साल पहले अपने बचपन में हम कोलकाता से गांव जाते उत्तर प्रदेश, पूजा-दिवाली की छुट्टियों में तो देखते कि हमारी बूढ़ी दादी अपने-आप में कुछ सिमटी-सी दुबली-पतली, सफेद केशों वाली सुबह-सुबह अहाते की ओर गर्इं और भर लार्इं फूलों से अपनी पीतल वाली सुंदर, छोटी-सी डोलची! यह काम वे किसी और को नहीं सौंपतीं! निश्चय ही उन्हें इसमें एक विशेष प्रकार का सुख मिलता होगा।

यह देखना संतोषप्रद है कि महानगर हों या छोटे-मंझोले शहर, अब लोग घरों में, गमलों में फूलों वाले पौधे काफी लगाने लगे हैं। फूलों की ‘नर्सरियों’ की संख्या भी बढ़ी हुई देखता हूं। शहरों के फुटपाथों पर गमले और पौधे भी बिकते हुए देखता हूं। वे हर अवसर के लिए बने हैं। शादी-विवाह, भोज-पार्टियों, जन्मदिन की शुभकामनाओं, तीज-त्योहारों, स्कूल-कॉलेज के समारोहों में। सब जगह तो हैं वे! फूल अब मोबाइल संदेशों पर भी बहुत भेजे जाते हैं- सुप्रभात, गुड मॉर्निंग के साथ। पर चित्र वाले फूलों और सुबह के असली फूलों में बड़ा फर्क है न! और भी बहुत-से लोगों की तरह मेरी सुबह भी अब दोनों तरह के फूल देखने से होती है- मोबाइल वाले फूलों से भी और सचमुच के चंपा, कनेर, गुड़हल आदि के फूलों से। वे आज के हिंसक, आक्रामक समय से हमारी कुछ तो रक्षा करते ही हैं। बने रहें, बचे रहें सुबह के फूल!

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