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व्यावहारिक ज्ञान की कुंजी

बचपन में कहा जाता था, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब। इसकी वजह थी बच्चों को किताबों के करीब लाना। कहीं-कहीं स्कूल के पटल पर लिखा होता था- ‘किताबें सबसे अच्छी दोस्त हैं’! इसी के चलते जब कभी हम सैर पर जाते थे या खाली बैठे होते थे, किताब हमारे हाथ में होती थी।

Author Published on: April 15, 2019 2:19 AM
कबीरदास की एक प्रसिद्ध चौपाई है- ‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोई/ ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होई’। (प्रतीकात्मक तस्वीर- Indian express, Illustration: C R Sasikumar)

हेमंत कुमार पारीक

बचपन में कहा जाता था, पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब। इसकी वजह थी बच्चों को किताबों के करीब लाना। कहीं-कहीं स्कूल के पटल पर लिखा होता था- ‘किताबें सबसे अच्छी दोस्त हैं’! इसी के चलते जब कभी हम सैर पर जाते थे या खाली बैठे होते थे, किताब हमारे हाथ में होती थी। इसी वजह से दिन-रात खेलों में मस्त रहने वाले विद्यार्थी हमें किताबी कीड़ा कह पुकारते थे। दरअसल, यह उनकी खीझ थी। वजह थी स्कूल में भी मास्टर साहब पढ़ने वाले बच्चों को अहमियत देते थे और खेल-कूद में ही लगे रहने वाले विद्यार्थियों को डांटते-फटकारते थे और प्रताड़ित करते थे। उन्हीं में से एक लड़का था सेऊआ। वह खेलकूद में मस्त रहता था। तरह-तरह के करतब दिखाता, लेकिन पढ़ने-लिखने में फिसड्डी था। इसके बावजूद वह व्यावहारिक ज्ञान में हमारी तरह कई पढ़ने-लिखने में तेज विद्यार्थियों से आगे। यही कारण था कि वह लोगों बच्चों को प्रभावित भी करता था।

उस समय की एक घटना मुझे अभी भी याद है। गरमी के दिनों में इमली तोड़ने के लिए छोटी उम्र का एक लड़का पेड़ पर चढ़ गया। वह पेड़ से सटे बिजली के तारों से अनभिज्ञ था। उसे तारों में बहती धारा या करंट का ज्ञान नहीं था। अचानक उसका एक हाथ बिजली के तार के संपर्क में आया और हाथ चिपक गया। भीड़ लग गई। दम साधे लोग तमाशा देख रहे थे। बच्चा रो रहा था। किसी को कुछ नहीं सूझ नहीं रहा था। तमाम लोग वहां जमा हो गए। थोड़ी देर में बच्चे की जान चली जाती। चीख-पुकार मची। तभी वहां से गुजर रहे सेऊआ की नजर उस पर पड़ी। वह बिना कुछ ज्यादा सोचे आनन-फानन में पेड़ पर चढ़ गया। उसके शरीर से अपनी चप्पल स्पर्श की और उस बच्चे हाथ तार से हट गया। यानी मौत के कगार पर पहुंच चुके बच्चे की सेऊआ ने जान बचा ली। वहां खड़े लोग देखते रह गए। यह उसका व्यावहारिक ज्ञान था, जिसका उसने सही समय पर उपयोग किया था, जबकि पढ़ाई-लिखाई में वह फिसड्Þडी छात्रों की श्रेणी में गिना जाता था और इसीलिए पढ़ने में तेज विद्यार्थी उसे कमतर होने का एहसास कराते रहते थे। अब सोचता हूं तो लगता है कि क्या स्कूल के सर्टिफिकेट या बड़ी-बड़ी डिग्रियां व्यावहारिक ज्ञान का प्रमाण होती हैं! बहुत-सी ऐसी फिल्मी हस्तियां हैं, जिन्होंने बाकायदा फिल्मी संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की, गोल्ड मेडल तक जीते, पर वे लोगों के सामने वैसा प्रदर्शन नहीं कर सके, जितनी उनसे उम्मीद की गई थी। दूसरी ओर, उनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो स्थानीय मंचों पर नाटकों में काम करते रहे और आगे जाकर बड़े फिल्मी सितारे के रूप में जनमानस के चहेते बन गए। कई व्यवसायी भी ऐसे हैं, जिन्होंने मैनेजमेंट या प्रबंधन की कोई पढ़ाई नहीं पढ़ी थी, लेकिन वे बाद में सफल व्यापारी सिद्ध हुए। सवाल है कि यह ज्ञान उन्हें कहां से मिला!

मैं सुबह-सुबह घूमने निकलता हूं। रास्ते में हलवाई की छोटी-सी दुकान दिखती है। ठंड के दिनों में भी वहां भीड़ लगी रहती है, जबकि आसपास की बड़ी दुकानें खाली पड़ी होती हैं। वहां खुली जगह में जलेबियां बनती हैं, जिसकी खुशबू खाने को ललचाती है। यह व्यावहारिक ज्ञान का प्रदर्शन है। मौसम के अनुसार वह वही बनाता है, जिसकी जनता के बीच मांग होती है। उसे देख प्रबंधन की एक उक्ति याद आती है- ‘मर्केंडाइज ऐंड अफेक्टिव डिस्पले’ यानी ‘सामान लाओ और उसका प्रभावी प्रदर्शन करो’! इसी तरह आकर्षण पैदा करने वाले कुछ विशेषण लगा कर चाय बेचते हुए लोगों को देखा है। मसलन, स्पेशल चाय, गोल्डन चाय या डायमंड चाय! अब चाय तो चाय होती है। थोड़ा बहुत फर्क होता होगा। दिल्ली में कई जगह चाय अलग-अलग तरह की मिलती है। एक लंबी सूची होती है। ठीक वैसे ही ऑटोमोबाइल कंपनियां नए-नए मॉडल का विज्ञापन प्रसारित करती हैं। बाजार में नए-नए मोबाइल फोन आ रहे हैं। यह कमाल व्यावहारिक ज्ञान का है कि चीज एक ही है, पर जनता इसे हाथोंहाथ लेती है। कहां से आता है यह सब? यह कला कहां से आती है?

एक उक्ति है- ‘सोने से कम नहीं, खोने का गम नहीं’! दरअसल, बनावटी गहने बेचने वाला अपने माल को इसी तरह बेचता है। खरीदने वाले का काम भी चले और चोरी होने पर उसे नुकसान भी ज्यादा महसूस न हो। इसी तरह खिलौने वाला चिल्लाता है- ‘बच्चा भी खेले, बच्चे का बाप भी खेले’! शाम को चने बेचने वाला निकलता है और अपने चने की नुमाईश करते हुए गाता है- ‘चना जोर गरम, बाबू मैं लाया मजेदार…’! कहां से मिलता है माल बेचने का यह व्यावहारिक ज्ञान? शायद बड़ी-बड़ी पोथियों, किताबों से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर से। कबीरदास की एक प्रसिद्ध चौपाई है- ‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोई/ ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होई’। इसी में कहीं व्यावहारिक ज्ञान की कुंजी छिपी हुई है।

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