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निगरानी की तकनीक

हमारे जीवन को संचार क्रांति ने जितना सरल और सहज बनाया है, उतना ही अदृश्य होकर हमारे व्यक्तिगत जीवन में प्रवेश के रास्तों को सुलभ बनाया है।

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सांकेतिक फोटो।

भावना मासीवाल

हमारे जीवन को संचार क्रांति ने जितना सरल और सहज बनाया है, उतना ही अदृश्य होकर हमारे व्यक्तिगत जीवन में प्रवेश के रास्तों को सुलभ बनाया है। यही कारण है कि संचार क्रांति के बाद एक ओर हम खुश हो रहे हैं तो दूसरी ओर भीतर से डरे भी हुए हैं, क्योंकि हमारी हर एक गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। यह नजर कभी आस-पड़ोस की हुआ करती थी, वर्तमान में हम खुद और हमारी संचार व्यवस्था में उपलब्ध होने वाले तमाम स्मार्ट गैजेट इस भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं।

हमारी अपने आस-पड़ोस से अधिक इन गैजेट पर निर्भरता ने हमें इस तकनीकी व्यवस्था का आदी और इन पर निर्भर बना दिया है। महानगरीय व्यवस्था में कहें या वर्तमान समय में, सभी परिवारों में सदस्यों से अधिक आधुनिक तकनीकी ने जगह बना ली है। आज घर के भीतर परिवार साथ होकर भी पूरी तरह इन्हीं पर आश्रित है। हर घर के भीतर इन्हीं के माध्यम से परिवार और संबंधों के बीच की दूरी को ‘पाटा जा रहा है’ तो दूसरी ओर यही तकनीक हमारे संबंधों में घुसपैठ भी कर रही है। परिवार और संबंधों में तकनीक की घुसपैठ का एक बड़ा कारण संचार क्रांति रहा है, वहीं वैश्विक स्तर पर दो वर्षों से कोरोना महामारी से जूझने के कारण काम करने की नई आनलाइन व्यवस्था भी एक बड़ी वजह रही है।

ऐसा भी नहीं है कि यह व्यवस्था पिछले दो वर्षों की देन है, बल्कि यह व्यवस्था तो सुविधा के अनुरूप चली आ रही थी, लेकिन वर्तमान में महामारी के असर ने इसे कार्य करने की एक पूर्णकालिक व्यवस्था ही बना दिया। आज इसी व्यवस्था में आनलाइन शिक्षण से लेकर दफ्तर, बैंक में लेन-देन, बाजार और वैश्विक स्तर पर वार्ताएं हो रही हैं और आपसी सहयोग के भी काम हो रहे हैं।

ऐसे में एक तरफ इस व्यवस्था ने हमारे कार्यों को जहां सरल बनाया और एक बड़े जन समुदाय को इससे जोड़ा, वहीं शोषण, चोरी, लूट और बलात्कार के नए-नए तरीकों को भी तकनीक के माध्यम से और जटिल बनाया है। बलात्कार, यौन अपराध, सेक्स और निजता को इसने अपने लाभ के लिए बाजार में बेचना आरंभ कर दिया।

फिर वह सामाजिक स्तर पर किसी आनलाइन खरीद-बिक्री के वेबसाइट के जरिए सिगरेट-केस के रूप में स्त्री के यौनांग की बिक्री हो, ‘बुली’ और ‘सुल्ली’ जैसे ऐप के माध्यम से एक धर्म विशेष की महिलाओं को लक्ष्य कर उन्हें अपमानित करने और बेचने की मानसिकता हो, पारिवारिक और आपसी संबंधों में फोन और अन्य माध्यमों के जरिए यौन अपराध की ग्रंथियों को मजबूत करना और शोषण के नए तरीकों को ईजाद करना हो या फिर यूट्यूब से लेकर अन्य ब्राउजर तक में विज्ञापन व अन्य तरीकों के माध्यम से प्रतिबंधित सामग्री को परोसा जाना हो।

सच यह है कि तकनीकी क्रांति ने हमारे जीवन को सरल अवश्य बनाया है, मगर इस सरलता के साथ ही हमारे जीवन में बाजार के हस्तक्षेप को भी बढ़ाया है। यही कारण है कि वर्तमान में हम अपने फोन पर किस व्यक्ति से कब और कहां बात कर रहे हैं, हम कहां और क्या सामान ले रहे हैं, आनलाइन माध्यम से क्या खोज रहे हैं, इस संबंध में पूरी जानकारी बाजार को होती है। हमारे बैंक से लेकर फोन नंबर तक की जानकारी बाजार रखता है। यह बेवजह नहीं है कि हमारे फोन के स्थान से लेकर, बाजार ब्रांड तक के संदेश हमें मिलते रहते हैं और हम इस सोच में डूबे होते हैं कि इन्हें कैसे पता लगा कि हमारी क्या जरूरत है या इस संबंध में हम क्या विचार कर रहे थे!

एक समय था जब परिवार में कहा जाता था कि दीवारों के भी कान होते हैं। आज की स्थितियों में दीवारों से अधिक कान हमारे ही अपने सबसे करीबी ‘फोन’ के हैं जो हर समय हमारे साथ होकर भी हमारा नहीं है, बल्कि बाजार का है। बहुमंजिला इमारतों व फ्लैट जीवन में रहने वाले लोगों के बीच जहां आपसी कोई संवाद नहीं है, वहीं इन बंद घरों के भीतर की हरेक गतिविधि पर बाजार की नजर है।

इस उपभोक्तावादी संस्कृति में जब सभी कुछ बाजार के इर्द-गिर्द घूम रहा है, ऐसे में एक सामान्य मनुष्य न चाह कर भी बाजार का हिस्सा बनता जा रहा है। हम सोचते हैं ‘चार दीवारों के कान नहीं होते’, मगर आज हर दीवार तकनीक से लैस अपने आप में ही बाजार की भूमिका का निर्वाह करती नजर आ रही है। यही वजह है कि हमारे घरों के भीतर क्या हो रहा है, हमारे पड़ोसियों से अधिक आज बाजार को पता है।

वही बाजार कभी अपने विज्ञापन तय करता है तो कभी मनुष्य की भावनाओं को ही बेच कर बाजार का हिस्सा बना देता है। ऐसे में संचार क्रांति ने जितना जीवन को सरल बनाने में भूमिका निभाई है, उससे अधिक वर्तमान में हमारे जीवन को जटिल और भय के साए में ला दिया है। एक ऐसा भय जो अदृश्य है, मगर हर वक्त हमारे आसपास मौजूद हम पर निगरानी रख रहा है।

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