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पैसा ये कैसा पैसा

बहुत पैसा इकट्ठा करके भी कुछ लोग कभी खर्च नहीं कर पाते और अंतत: उसे अपनी संततियों के उपयोग के लिए छोड़ कर इस संसार से विदा हो जाते हैं।

पैसा ये कैसा पैसा
फोटो- फ्रीपिक।

सदाशिव श्रोत्रिय

पैसे के संबंध में लोगों का व्यवहार कभी-कभी आश्चर्यजनक होता है। जिन लोगों का बचपन अभावों में बीता होता है, वे कई बार धनवान होकर भी दिल से गरीब बने रहते हैं। नए बर्तन खरीद कर भी वे पुरानों से काम चलाते रहते हैं। नए कपड़ों को किसी खास अवसर के लिए इतने समय तक बचा कर रखते हैं कि वे चलन से बाहर हो जाते हैं। घर में एसी लगवा कर भी अधिक बिजली खर्च होने के डर से उसे चलाते नहीं।

कई घरों में कारें सिर्फ खड़ी रहती हैं। घर के दैनंदिन कामों के लिए कोई दुपहिया वाहन ही इस्तेमाल होता रहता है। मध्यवर्ग के बहुत से लोग कम दाम में कुछ महंगी चीज खरीद लेने को अपनी बड़ी उपलब्धि मानते हैं। वे सोचते हैं कि दूसरे लोग जिस चीज के लिए इतने अधिक पैसे खर्च करते हैं, उसे उन्होंने कितने सस्ते में हासिल कर लिया! बहुत पैसा इकट्ठा करके भी कुछ लोग कभी खर्च नहीं कर पाते और अंतत: उसे अपनी संततियों के उपयोग के लिए छोड़ कर इस संसार से विदा हो जाते हैं।

पैसे की तीन ही गतियां संभव हैं: उसे खर्च कर दिया जाए, किसी को दे दिया जाए या फिर उसे यों ही नष्ट होने के लिए कहीं छोड़ दिया जाए। कृपण लोगों को रास्ता दिखाने के लिए ईशावास्योपनिषद में एक सुंदर श्लोक मिलता है: ‘ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत। तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्यस्विद्धनम्॥’ जिसका अर्थ है कि इस दुनिया की सारी चल-अचल संपत्ति ईश्वर का ही प्रकटीकरण है। इसका उपयोग खर्च करके, इसका त्याग करके ही किया जा सकता है। यह मानना कि यह धन मेरा है, अपने आप में एक नासमझी है, अत: इसके प्रति किसी तरह का लोभ रखना ठीक नहीं।मगर पैसे का मामला कुछ इतना विचित्र है कि जो लोग उसे भावुकतावश जीते-जी अपनी संतानों की मदद के लिए दे देते हैं, उनमें से कई को वृद्धावस्था में उन्हीं संतानों की उपेक्षा और अपमान का शिकार होना पड़ता है।

असुरक्षा का भाव भी इसीलिए कभी-कभी उम्रदराज लोगों को कृपण बना देता है। यह भी देखा जाता है कि जो लोग सब्जी की खरीद में पांच रुपया बचाने के लिए दस जगह मोल-भाव करते हैं, वे अपने बच्चे-बच्चियों की शादी के निमंत्रण-पत्रों पर ही इतना पैसा खर्च कर देते हैं कि उससे उनकी साल भर की सब्जी आ जाए। अखबार की रद्दी बेचते समय ऐसे लोगों को हर समय उसके अधिक तौल लिए जाने का भय सताता रहता है। हर कुली, मजदूर या ठेले वाला उन्हें ठग लगता है।

जब बड़े-बड़े घोटालों के बारे में सुनते हैं, तो लगता है कि जिस घोटालाबाज के मुंह एक बार बेईमानी के पैसे का खून लग जाता है उसके लिए उसकी निजी आवश्यकता और उसके धनार्जन में कोई संबंध नहीं रह जाता। वह एक कभी न भरे जा सकने वाले गड्ढे का रूप ले लेता है। पैसे के संबंध में लोगों का व्यवहार आजकल अक्सर बाजार तय करता है। हमारे देखते-देखते भव्य और भारी-भरकम स्वागत समारोह, महंगी संगीत संध्याएं हर मध्यवर्गीय शादी का आवश्यक अंग बन गई हैं।

यह बाजार की ही महिमा है कि जिस व्यक्ति ने अभी-अभी पैसा कमाना शुरू किया है, उसके घर में अगर टीवी, फ्रिज या कोई दुपहिया वाहन न हो तो वह जैसे अपनी निगाहों में ही गिर जाता है। उसे इस स्थिति से उबारने के लिए कई बैंक उसका हाथ थाम लेते और उसे आने वाले कई वर्षों के लिए कर्ज की किश्तें चुकाने की स्थिति में ला देते हैं। आर्थिक स्थिति थोड़ी और अच्छी होते ही उसे कार और मकान भी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक लगने लगते हैं।

अपने बच्चों को किसी प्रतिष्ठित संस्था में दाखिले के लिए कोचिंग हेतु माता-पिता अक्सर कुछ खास शहरों में भेजते हैं, भारी डोनेशन या विदेशी शिक्षा का प्रबंध करते हैं। बहुत-सा पैसा लोग सिर्फ अपने नाम और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए खर्च करते हैं। पैसे का सर्वाधिक असंगत और पागलपनभरा दुरुपयोग युद्ध काल में होता है। शांति काल में जो पैसा निर्माण और जीवन रक्षा के लिए उपयोग किया जाता है, वही युद्धरत राष्ट्रों द्वारा विध्वंस और हिंसा के लिए प्रयुक्त होता है और इसमें किसी को कुछ गलत नहीं लगता।

पैसे का आकर्षण हमारे समय में कुछ इस कदर बढ़ा है कि उसके लिए अधिकतर लोग अपना सब कुछ- धर्म, नैतिकता, ईमानदारी, स्वाभिमान आदि- बेचने को तैयार हो जाते हैं। पर कुछ ऐसे बिरले लोग आज भी देखे जा सकते हैं, जो इन चीजों का सौदा किसी भी कीमत पर करने को तैयार नहीं होते। वे आज भी बाइबल के इस कथन में विश्वास करते हैं कि किसी ऊंट का सूई के छेद से निकल जाना उतना मुश्किल नहीं है, जितना किसी अमीर का ईश्वर के साम्राज्य में प्रवेश कर पाना। सादगी और अपरिग्रह को महत्त्व देने वाले ऐसे लोगों के बारे में जब हम सोचते हैं, तो हमारे सामने आज भी बरबस महात्मा गांधी की तस्वीर उभरती है।

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