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गायब होते गीत

उस दिन रसोई में काम करते हुए अचानक मेरे कानों में एक गीत की आवाज आई- ‘लल्ला लल्ला लोरी, दारू की कटोरी…!’ मैं ये शब्द सुन कर चौंक गई। मां की दुलार भरी मीठी लोरी में दारू की दुर्गंध और अजीब-सी कड़वाहट का घोल! मेरा बेटा बड़े चाव से टीवी देख रहा था। जब मैंने […]

Author August 14, 2015 8:36 AM

उस दिन रसोई में काम करते हुए अचानक मेरे कानों में एक गीत की आवाज आई- ‘लल्ला लल्ला लोरी, दारू की कटोरी…!’ मैं ये शब्द सुन कर चौंक गई। मां की दुलार भरी मीठी लोरी में दारू की दुर्गंध और अजीब-सी कड़वाहट का घोल! मेरा बेटा बड़े चाव से टीवी देख रहा था। जब मैंने उससे पूछा तो उसने सहज अंदाज में बताया कि यह एक नई फिल्म का गाना है, जिसका प्रचार टीवी पर दिखाया जा रहा था।

तो क्या अब यह रह गया है फिल्मी गीत-संगीत! हाल के वर्षों में कई द्विअर्थी और कायदे से कहें तो अश्लील गीतों में अब शराब, दारू जैसे शब्द इस तरह परोसे जा रहे हैं। हालांकि इन शब्दों का इस्तेमाल पहले के गीतों में भी होता था, लेकिन उनके संदर्भ आज की तरह बेमानी या अश्लील नहीं होते थे। मेरे लिए यह चिंता की बात थी। लेकिन बेटे ने मेरी जानकारी में इजाफा करते हुए बताया कि ऐसे गीत तो धड़ल्ले से बन और बज रहे हैं। मेरी निगाह में विडंबना और उसकी नजर में मजे की बात यह थी कि ऐसे तमाम गीत ‘पॉपुलर’ हो रहे हैं। हां, शायद यह ‘पॉपुलर कल्चर’ का ही असर है कि ‘चार बोतल वोदका, काम मेरा रोज का…’ जैसे शब्दों और आशय से लैस गीत शादियों या पार्टियों में खूब बज रहे हैं। जब भी ऐसे गीत बजने लगते हैं तो उन पर युवा लड़के-लड़कियां ही नहीं, कई बड़े-बुजुर्ग भी थिरकते दिखाई देते हैं।

मन में अतीत ने करवट ली। सन 1970-80 या नब्बे के दशक के गीतों में जो काव्यात्मक शब्द, लय-धुन, संगीत की मिठास और अनकहा संदेश छिपा रहता था, वह अब केवल ‘शोर’ बन कर रह गए हैं। वे गीत आज भी सुनने पर उतने ही कर्णप्रिय, हृदय-प्रिय लगते हैं, जितने तब लगते थे। उन गीतों को गुनगुना कर ही हमने बचपन से जवानी की यात्रा तय की और अपने स्नेहिल, अपनत्व भरे क्षणों में प्रेम को अभिव्यक्ति दी। आज भी रेडियो एफएम और टीवी के फिल्मी गानों के चैनल पर उन्हीं गीतों को सुनने को मन तरस जाता है।

तो क्या यह पीढ़ियों के अंतर का मामला है? हमारी इंद्रियों और मन ने अपनी समझ खो दी है या वाकई हमारा ‘स्वाद’ बदल गया है? आज की कानफोड़ू रैप और रॉक संस्कृति ने गीतों की मधुरता को खा लिया है। हमारी आज की बड़ी होती पीढ़ी एसडी बर्मन, मन्ना डे, रफी, मुकेश, किशोर, लता, आशा जैसे गायकों को क्या जानें! उनके आज के लोकप्रिय गायकों के गीत उन्हें गुनगुनाने नहीं, पांव उठा कर कई बार बेहूदा नाच करने को प्रेरित करते हैं। दरअसल, ऐसे गीतों के बोल या संगीत दिल को कहीं नहीं छूते और न ही वे शब्द मस्तिष्क में बार-बार कौंधते हैं। ऐसे में श्रोता और दर्शक ही नहीं, हमारी पीढ़ी के गायक और संगीतकार भी हाशिये पर चले गए हैं। आज उनका ‘बाजार भाव’ न के बराबर है। या तो वे चुप बैठ जाएं या फिर फिर ऐसे गीत लिख और गाकर ‘समझौतावादी’ और ‘अवसरपरस्त’ हो जाएं। खुद को तसल्ली देने की दलील वही होगी कि यह दर्शकों की मांग है!

स्कूल-कॉलेज में पढ़ते हुए विद्यार्थियों की डायरी के पिछले पन्नों पर अक्सर प्रसिद्ध गीत-गजल की पंक्तियां लिखी दिख जाती थीं। आज तो आधुनिक यंत्रों के नए-नए ऐप्स के युग ने रिश्तों की मिठास, मूल्य, नैतिकता, सोच-विचार सभी को गहरे खोह में धकेल दिया है। कई चर्चित गीतों के भद्दे रीमिक्स भी खूब बन रहे हैं, जिनमें न भाव हैं, न अदा और प्रभाव। नए फिल्मी गीत नकारात्मक मूल्यों को भड़का कर अतृप्त वासनाओं, अश्लीलता और हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। ये समाज में आपराधिक प्रवृत्ति का कारण भी बनते हैं। हालत यह है कि पब संस्कृति और रेव पार्टी का चलन किसी संक्रामक बीमारी की तरह बढ़ता जा रहा है। इन पार्टियों में शामिल युवक-युवतियां विदेशी शराब, हुक्का और अन्य कई तरह के मादक पदार्थों का सेवन करना शान समझते हैं।

यह चकाचौंध भरी दुनिया उन्हें ललचाती है, भरमाती है और उत्तेजित करती है। ये सब उनमें होश नहीं, केवल उथला जोश भरती हैं। ऐसा इसलिए भी कि आज की भोगवादी संस्कृति प्रदर्शन, सेक्स और अश्लीलता को प्रश्रय दे रही है और आज का किशोर और युवा वर्ग इन्हें बड़ी सहजता से अपना रहा है। ऐसे में ‘जेनरेशन गैप’ यानी पीढ़ियों के फासले की बात सामने आती है और हमारी उम्र के माता-पिता ‘ओल्ड फैशन’ वाले समझे जाते हैं। वक्त के साथ विचारों में बदलाव अपेक्षित और आवश्यक हैं, पर उनका अवमूल्यन तो संस्कृति के विनाश की ओर ही ले जाएगा। समय रहते अगर हम सचेत नहीं हुए तो हमारे बच्चे और उनका भविष्य क्या होगा, इसका अंदाजा हम बखूबी लगा सकते हैं!

 

कविता भाटिया

 

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