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मानसिक खुराक की चिंता

बच्चे अपने आप को आधुनिक बताने के चक्कर में सांस्कृतिक मूल्यों को भी ताक पर रख कर अश्लील होते जा रहे हैं।

गिरीश पंकज

पिछले दिनों एक बेहद समृद्ध धनिक सज्जन का फोन आया। कहने लगे, ‘मुझे एक ऐसे व्यक्ति की तलाश है जो सप्ताह में दो-तीन दिन आकर मेरी बहू को वेद-पुराण, उपनिषद आदि से संबंधित ज्ञानवर्धक बातों की जानकारी दे सके।’गत चार दशकों से हम एक-दूसरे को भलीभांति जानते हैं। बेहद आत्मीय सबंध हैं। मैंने कारण पूछा, तो वे बोले, ‘हमारी बहू गर्भवती है। मेरी इच्छा है कि इस दौरान उसे अपनी सनातन संस्कृति, धर्म-अध्यात्म आदि के बारे में ज्ञान प्राप्त होता रहे, ताकि गर्भ में पल रहे शिशु को भी उसका लाभ मिल सके।’

फिर उन्होंने महाभारत के अभिमन्यु का उदाहरण दिया, जो गर्भ में ही चक्रव्यूह भेदने की कला सुन कर सीख गया था। उनकी बात सुन कर मन अभिभूत हो गया। मैंने उन्हें साधुवाद दिया कि आज के दौर में भी आप जैसे कुछ लोग बचे हैं, जो चाहते हैं कि भावी पीढ़ी गौरवशाली परंपराओं को समझे और आदर्श नागरिक बने।

उनसे मैंने पूछा कि आपको ऐसा खयाल क्यों आया, तो कहने लगे, ‘आज जब नई पीढ़ी को तथाकथित आधुनिकता की राह पर चल कर पतनशील देखता हूं तो बड़ी पीड़ा होती है। ये बच्चे अपने आप को आधुनिक बताने के चक्कर में सांस्कृतिक मूल्यों को भी ताक पर रख कर अश्लील होते जा रहे हैं। माता-पिता भी बच्चों को आधुनिक बनाना चाहते हैं। दुर्भाग्य कि अब नैतिकता का सवाल कोई सवाल ही नहीं रहा।

ऐसे कठिन समय में मुझे लगता है कि हमारे घर आने वाली भावी संतान, चाहे लड़का हो या लडकी, कुछ ऐसे संस्कार लेकर बड़ी हो, जिसके कारण वह तेजी से फैल रही अपसंस्कृति के बीच भी बची रह सके। कंप्यूटर में एंटीवायरस डाला जाता है तो कंप्यूटर सुरक्षित रहता है, उसी तरह मुझे लगता है हमारा सनातन ज्ञान अगर गर्भस्थ शिशु आत्मसात कर ले तो यह एंटीवायरस साबित होगा। इसे ग्रहण करके वह किसी भी हालत में दिशाहीन नहीं हो सकेगा।’

उनकी बात सुन कर मैं चकित था, ‘आप जब इतनी सारी चीजें समझते हैं। क्यों नहीं आप ही अपनी बहू को नियमित संस्कार देने की कोशिश करते?’ वे हंस कर बोले, ‘काश! ऐसा संभव हो सकता। दरअसल, व्यवसाय की दुनिया में रमे रहने के कारण मैं धर्म-अध्यात्म की गूढ़ सनातन बातों को गहराई से न तो समझ सकता हूं और न समझा सकता हूं। इन बातों को कोई अनुभवी ज्ञानी बता सकता है।’ मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि यह काम मेरे एक मित्र ही कर सकेंगे। वे धर्म, संस्कृति, अध्यात्म के बड़े मर्मज्ञ हैं।

मैं उनसे आग्रह करूंगा कि वे आपकी बहू के लिए कुछ समय निकालें। फिर मैंने अपने मित्र से आग्रह किया तो वे सहर्ष तैयार हो गए और बोले, ‘यह तो बड़ा पुनीत कार्य है। आजकल कोई इतनी गहराई से सोचता ही नहीं। फिर अगर सेठ जी अपनी पुरानी परंपरा, संस्कृति को इतना महत्त्व दे रहे हैं, तो यह अपने आप में अद्भुत घटना है। आज हमारा समाज, ज्यादातर लोग भौतिकता में रमे हुए हैं। पूरी तरह से बाजार की गिरफ्त में हैं। लेकिन एक ऐसा परिवार है, जो आज भी अपने सनातन मूल्यों की शिक्षा को लेकर चिंतित है, यह बड़ी बात है।’

हमारे मित्र सेठ जी के यहां समय-समय पर जाते हैं और जितना संभव हो सकता है, उनकी बहू को वेद-पुराण, रामचरित मानस और गीता आदि से जुड़ी श्रेष्ठ बातों से परिचित कराते हैं। बहू भी आनंदित होकर ज्ञानार्जन कर रही है। उसे पुरातनता में अवगुंठित नैतिक मूल्यों का, प्रेरक बोध-कथाओं का पता चल रहा है। यह ऐसा अद्भुत कार्य है, जिसे करते हुए मेरे मित्र भी प्रसन्न हैं।

सेठ जी भी संतुष्ट हैं कि उनकी बहू को अच्छे खानपान के साथ अच्छा बौद्धिक-आध्यात्मिक भोजन भी मिल रहा है, जो उनके परिवार की भावी संतान के लिए निस्संदेह उपयोगी साबित होगा। मैं इस बात को लेकर बहुत निचिंत नहीं हूं कि गर्भ में पल रहे शिशु को इस आध्यात्मिक खुराक का कितना फायदा मिलेगा, लेकिन मैं इस बात को लेकर प्रफुल्लित हंू, कि इस तकनीकी संपन्न तथाकथित अपसंस्कृति-मिश्रित अतिआधुनिक युग में भी कोई तो है, जो तीव्रगति से विनष्ट होते दौर में भी अपनी उस सनातन-परंपरा को बचाए रखना चाहता है, जो मनुष्य को गर्भावस्था से ही ज्ञानवान बनाने का उपक्रम किया करती थी। इसके अमर प्रतीक के रूप में हम बालक अभिमन्यु को जानते हैं।

हमारी परंपरा में तो गर्भ-संस्कार देने के लिए कुछ मंत्र भी बताए गए हैं। संस्कृत में होने के कारण भले ये मंत्र याद न रखे जा सकें, लेकिन उसके अर्थ को, श्रेष्ठ पुरातन नैतिक बोध-कथाओं को तो याद रखा जा सकता है। एक गर्भवती स्त्री भरपूर पौष्टिक भोजन के साथ सात्विक विचारों को भी नियमित रूप से ग्रहण करे, तो इसमें कोई हर्ज भी नहीं।

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