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दुनिया मेरे आगे: मिट्टी की संवेदना

मिट्टी चाहे खेत की हो या चौखट की, हमने सदैव उसे मस्तक झुका प्रणाम किया। अपने गांव, देश की मिट्टी से प्रेम का यह आलम था कि कोई विदेश जाता तो लौट कर सबसे पहले अपनी मिट्टी को चूमता। खिलाड़ी खेलने जाता तो अपने देश की एक चुटकी मिट्टी भी साथ ले जाता। खेलने से पहले माथे पर उसी मिट्टी से तिलक करता। देश प्रेम पर कोई फिल्म बनती तो उसमें मिट्टी से लगाव पर किसी गीत की रचना होती।

दीपावली से पूर्व बाजार में खरीदारी करते लोग। फाइल फोटो।


सरस्वती रमेश

दीपावली की सुगबुगाहट शुरू होते ही घरौंदे और मिट्टी के खिलौनों की यादें कुलबुलाने लगती हैं। मिट्टी के ये खिलौने और मूर्तियां देख कर इन्हें बनाने वालों की याद आती है। दीपावली से सप्ताह भर पहले ही वे महिलाएं सिर पर टोकरी रखे आवाज लगाती हुई चली आती थीं- ‘खिलौने ले लो, मूर्ति ले लो…’। उनकी छोटी-सी टोकरी से तरह-तरह के मिट्टी के बर्तन, खिलौने, दीये, गणेश-लक्ष्मी की मूर्ति और मिट्टी की गुल्लक निकलती।

लेकिन अब तो न जाने कहां बिला गई वे महिलाएं, लोग और हमारी जिंदगी से वब अनमोल मिट्टी तो जैसे गायब ही हो गई। न मिट्टी बची, न मिट्टी को चाहने वाले। बची है बस उसकी यादें।

खिलौने और मूर्तियां बेचने वाली महिला के टोकरी उतारते ही मैं अपनी बड़की अम्मा से जिद कर मिट्टी का चूल्हा, जांता, परात, बटुवे, कलछी या और भी न जाने क्या-क्या खरीद लेती। दीपावली से आठ-दस दिन पहले ही हमारा घरौंदा तैयार हो जाता। सारे बर्तन उसी घरौंदे में सजते। फिर उन बर्तनों से महीनों तक अपनी बहनों के साथ खेलती रहती।

जब तक जांता यानी अनाज पीसने के यंत्र, जो हमारे पास खिलौने की शक्ल में होता, उसकी हैंडल न टूट जाए या चूल्हा चटख कर न फूट जाए, हमारा खेलना जारी रहता। मिट्टी के गढ़े खिलौने से इतना लगाव कि उनके टूटने पर हम घंटों अफसोस करती रहतीं। दरअसल, वे महज मिट्टी के घरौंदे और खिलौने नहीं थे। वे तो असल में जिंदगी को ढालने वाले सांचे थे।

अनगढ़ मिट्टी हमारी संवेदनाओं और सांस्कृतिक चेतना को सदियों से अभिव्यक्त करती रही है। हमारे घर, बर्तन, हांडी से लेकर देवता तक मिट्टी से बने होते थे। चूल्हा बनाने के लिए गड़ही की मिट्टी लाई जाती थी। अनाज रखने के लिए मिट्टी के कुठले (कोठी) बनते। बचपन में दादी पोतनी मिट्टी से घर की दीवारों को लीपती। कपड़े धोने के लिए रेह (एक तरह की मिट्टी) का उपयोग किया जाता था।

यहां तक कि बाल धोने के लिए भी कछार से मिट्टी लाई जाती, जो दिखने में कुछ काली होती, मगर बालों को एकदम चमका देती थी। आज के शैम्पू की धुलाई के मुकाबले ज्यादा साफ और मुलायम बाल और ज्यादा स्वस्थ। बड़की अम्मा बताती कि जब दौड़ते-भागते बच्चे गिर पड़ते और उन्हें चोट लग जाती तो खेत की मिट्टी को उंगलियों के फांक से छान कर चोट की जगह पर लगा लिया जाता।

फिर किसी टिटनस की सुई लगवाने की जरूरत न पड़ती। पेट में दर्द हो तो गीली मिट्टी का गोला पेट पर रख लिया जाता था या गीली मिट्टी का लेप लगा दिया जाता था। इस मिट्टी को खोजने वालों को कोई याद नहीं करता, लेकिन वह मिट्टी हमारी सेहत का सहारा भी हुआ करती थी।

मिट्टी चाहे खेत की हो या चौखट की, हमने सदैव उसे मस्तक झुका प्रणाम किया। अपने गांव, देश की मिट्टी से प्रेम का यह आलम था कि कोई विदेश जाता तो लौट कर सबसे पहले अपनी मिट्टी को चूमता। खिलाड़ी खेलने जाता तो अपने देश की एक चुटकी मिट्टी भी साथ ले जाता। खेलने से पहले माथे पर उसी मिट्टी से तिलक करता। देश प्रेम पर कोई फिल्म बनती तो उसमें मिट्टी से लगाव पर किसी गीत की रचना होती।

लेखकों और कवियों को भी इस मिट्टी से बड़ा जुड़ाव रहा। वे मिट्टी को जीवित प्राणी की श्रेणी में रख कविताएं लिखते। शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की एक कविता में मिट्टी की संवेदना देखिए- ‘मिट्टी में स्वर है, संयम है, होनी अनहोनी कह जाए/ हंस कर हलाहल पी जाए, छाती पर सब कुछ सह जाए।’
अब सोचती हूं तो लगता है जाने कहां गायब हो गई वह मिट्टी।

अब तो हमने मिट्टी पर नंगे पांव रखना भी छोड़ दिया है कि कहीं हमारे पांव न गंदे हो जाए। मिट्टी हमारे लिए धूल की वजह है और धूल प्रदूषण की द्योतक। बच्चों के हाथ पैर में जरा-सी मिट्टी लग जाए तो उनके माता-पिता आसमान सिर पर उठा लेते हैं। जितना मुमकिन हो मिट्टी और इसमें कथित रूप से छिपे कीटाणुओं से सबको दूर रखा जाता है।

‘स्टेटस सिंबल’ यानी हैसियत के प्रतीक में मिट्टी कहीं भी किसी रूप में जगह बनाने में नाकाम रही। पर सच यह है कि जब तक मिट्टी से हमारा जुड़ाव रहा, तब तक प्रकृति के प्रति हमारी भावनाएं कुंद न हुई थीं। हमारी सेहत दवाइयों का मुंह नहीं ताकती थी। तब तक हम यों इंसानी चेतना से विमुख हो स्वार्थ के गर्त में न गिरे थे। अपनी इच्छाओं के लिए हम प्रकृति के हत्यारे भी नहीं बने थे। हमारा जीवन सहअस्तित्व पर आधारित था। मिट्टी के घर में एक तरफ हम रहते थे तो दूसरी तरफ गाय, बकरियां, भेड़ें और बैल रहते थे।

जब से हमारे घर आंगन से मिट्टी गायब हुई, इंसानी मन से मानवीयता की मुलायमियत और नमी भी गायब हो गई। प्रकृति और इसके जीव हमारे उपभोग का जरिया मात्र रह गए। प्रकृति और जीवों के सरोकार हमारी संवेदनाओं के साथ ही खत्म हो गए। इसी का नतीजा है कि आज अनेक पशु और पक्षी लुप्तप्राय हैं और न जाने कितने लुप्त हो चुके हैं। इस दीपावली यही कामना है कि हमारी जिंदगी में मिट्टी की अनमोल संपदा फिर से वापस मिल जाए।

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