Maternity benefits must not be considered as mandatory duty of women or great sacrifice- अपने का मोल - Jansatta
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अपने का मोल

भारत में इसका बाजार आज दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा हो चुका है। भारत में इन दिनों ‘अपना बच्चा’ हासिल करने के लिए इस उपाय को अपनाने की बयार तेज है।

(प्रतीकात्मक चित्र)

मेरे पड़ोस में एक परिचित महिला मुझे और मेरे जैसे कॉलोनी के हर बच्चे को खूब दुलार करती थीं। हम बच्चों को भी अच्छा लगता था। जो चाहो खाने के लिए मांग लो… जो चाहो उनके घर में करो। कभी मना नहीं करती थीं। आमतौर पर हमारे घरों में कहा जाता था कि उन्हें कोई बच्चा नहीं है न… इसलिए उन्हें बच्चों से बहुत लगाव है। हम बच्चे थे तो हमें बहुत पता नहीं था कि इस बात का मतलब क्या है। वे परिचित महिला और उनके पति बहुत प्यार से हम सब बच्चों से मिलते और बात करते थे।

वे हम सबके लिए दूसरे आम लोगों जैसे ही थे। जब बचपन खत्म हुआ तब मुझे पता चला कि वे महिला गर्भ धारण नहीं कर सकती थीं। कुछ शारीरिक बिंदु थे, जिनके चलते उन्हें गर्भधारण में दिक्कत थी। उस समय सेरोगेसी शब्द सुनने में तो आया था, लेकिन शायद सामान्य मध्यवर्गीय परिवार में इसकी इतनी गुंजाइश नहीं थी। इसलिए उस दंपती ने बच्चा हासिल करने के लिए यह रास्ता अपनाने का निर्णय नहीं लिया। आज भी वे दोनों बिना संतान के ही हैं और खुश हैं।

यों मेरा मानना है कि मातृत्व सुख पाना महिलाओं का अनिवार्य कर्तव्य या कोई महान त्याग नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि यह खुद उनका चुनाव होना चाहिए। हालांकि इन दिनों मातृत्व सुख से ज्यादा बात पितृत्व सुख की हो रही है। लेकिन खास पहलू यह है कि कुछ पुरुष सेरोगेट मां यानी किराए की कोख के जरिए पिता बन रहे हैं और यह कई पुरुषों को रास आ रहा है। किसी शारीरिक बाधा या कष्ट की वजह से अगर कोई स्त्री मां नहीं बन सकती है तो वह अपना बच्चा किराए की कोख के जरिए पा सकती है। इसकी शुरुआत वैसे माता-पिता की सुविधा के लिए हुई थी, जिन्हें अपना बच्चा पैदा करने में मुश्किल पेश आ रही हो या वैसी महिला के लिए, जिसका किसी कमी की वजह से बार-बार गर्भपात हो जाता हो।

भारत में इसका बाजार आज दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा हो चुका है। भारत में इन दिनों ‘अपना बच्चा’ हासिल करने के लिए इस उपाय को अपनाने की बयार तेज है। और शायद यही वजह है कि अब सेरोगेसी जितनी जरूरत है, उससे ज्यादा यह शौक हो गई है। सेरोगेसी के बढ़ते मामलों से देखा जा सकता है कि आर्थिक संपन्नता किस तरह सिर चढ़ कर बोलने लगी है। खासतौर पर फिल्मों के कलाकारों के नाम से यह बाजार तेजी से चमकने लगा है। बल्कि सच यह है कि हमारे-आपके कानों तक उनकी आवाज इसलिए पहुंची क्योंकि वे लोग सेलिब्रिटी कहे जाते हैं और उनके जीवन से जुड़ी तमाम गतिविधियों को प्रचार का हिस्सा बनाया जाता है।

दूसरी तरफ कुछ लोग सेलिब्रिटी तो नहीं हैं, लेकिन आर्थिक हैसियत के लिहाज से उनके बराबर जरूर हैं। उनके बीच भी अब इस रास्ते से बच्चा हासिल करना स्टेटस सिंबल के तौर पर देखा जाने लगा है। समाज के ये संभ्रांत वर्ग धन के बल पर सेरोगेसी के जरिए बच्चा हासिल करने की चिकित्सकीय सुविधा को उसकी अवधारणा में बेहद हल्का बना रहे हैं।

आजकल कुछ एकल पुरुष इस बात के लिए चर्चा में हैं कि उन्होंने सेरोगेसी के जरिए ‘अपना बच्चा’ हासिल किया। निश्चित तौर पर यह उनका व्यक्तिगत निर्णय है। लेकिन एक शिशु को किराये पर पैदा करवा कर लाना इसी समाज में है। लेकिन यह कैसे सुनिश्चित हो कि जन्म लेने वाले हर शिशु की कुछ मौलिक आवश्यकताएं होती हैं और उनसे उसे वंचित नहीं रखा जाना चाहिए। एकल पुरुष चलन या फैशन में सेरोगेसी के जरिए बच्चा हासिल कर लेंगे, लेकिन क्या उस नन्हे शिशु के लिए स्वाभाविक ममता की छांव का इंतजाम भी उसी महत्त्व के साथ संभव हो पाएगा? शौक या जरूरत के लिए समाज की किन जरूरतों को हाशिये पर रखा जाएगा!

इस विषय पर बहुत गंभीरता से सोचने की जरूरत है। एक कड़े कानूनी ढांचे की जरूरत है, ताकि सेरोगेसी के धड़ल्ले से चल रहे दुरुपयोग को रोका जा सके। आज एकल पुरुष जिस तरह अपनी मर्दानगी का प्रमाण पत्र सेरोगेट शिशुओं को बना रहे हैं, यह चिंता का मामला इसलिए है कि अगर ऐसा ही रहा तो कुछ अनिवार्य हालात में सेरोगेसी का सहारा लेने के चिकित्सकीय उपाय एक कारोबार भर बन कर रह जाएंगे, जहां संवेदनाएं कारोबार के तौर पर दर्ज होंगी।
इस लिहाज से मुझे अपने वे परिचित दंपती याद आते हैं जिनके लिए अपना बच्चा नहीं होना किसी दुख का कारण नहीं बना, बल्कि उन्होंने आसपास के सभी बच्चों को ‘अपना बच्चा’ बना लिया। संवेदनाएं अगर ईमानदार होती हैं तो ‘अपने’ की परिभाषा बहुत विस्तृत हो जाती है।

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