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बाजार में पानी

अभी सूरज की तपिश बढ़ी नहीं है, लेकिन हौले-हौले उसकी गरमी का अहसास होने लगा है और इसी के साथ पानी का संकट बढ़ने लगा है,
Author नई दिल्ली | April 18, 2016 02:21 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

एक समय था जब आप सफर में होते थे तो हर कुछ दूरी पर लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा आपकी खातिरदारी के लिए तैयार मिलता था। पानी के घड़े के पास जाते हुए मन को वैसी ही शीतलता मिलती थी, जैसे उस घड़े का पानी। तकनीक और संसाधनों का अभाव था, गरीबी थी, लेकिन चिलचिलाती धूप में राह चलते प्यास बुझाने के लिए सोचना नहीं पड़ता था। आज इस पाउच और बोतलबंद पानी की दुनिया में प्यास जरूर लगती है, लेकिन मन पहले ही कसैला हो जाता है। आज समय बदल चुका है। या तो पानी की बोतल के लिए दस-बीच रुपए निकालिए या फिर जेब में दो-दो रुपए के सिक्के रखिए और किसी दुकानदार से पानी का पाउच या ग्लास मांगिए। लेकिन पानी का यह पाउच या ग्लास एक व्यक्ति की प्यास तो थोड़ी देर के लिए शांत कर सकता है, लेकिन न शरीर की जरूरत भर पानी की कमी पूरी कर सकता है, न मन को शीतलता दे सकता है।

अब सवाल यह है कि एक पिछड़े दौर में सम्मान और संवेदना के साथ लोगों की प्यास बुझाने वाले घड़े कहां गए! आखिर ऐसा क्या और क्यों हुआ कि हमने अपने आप से उस घड़े को परे कर दिया है? पानी का वह घड़ा न तो पर्यावरण को प्रदूषित करता था और न ही शरीर को किसी तरह का नुकसान पहुंचाता था। मन को भीतर ही भीतर जो खुशी मिलती थी, वह कहीं गुम हो गई है, उसी तरह जिस तरह लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा लगभग गुम हो गया है। अब कहीं है भी तो वह उन घरों में, जिनके पास फ्रिज या रेफ्रीजरेटर खरीद सकने की क्षमता नहीं है। लेकिन घर में घड़ा होने और सड़कों के किनारे होने में फर्क है। रास्ते किनारे रखा खड़ा किसी एक के लिए नहीं होता था, बल्कि राह चलते हर मुसाफिर के लिए होता था। यह इस बात का भी संकेत था कि पानी चूंकि एक प्राकृतिक संसाधन है, जीव-जगत और जीवन के लिए जरूरी है, इसलिए इसका सबके लिए मुफ्त मुहैया होना जरूरी है। इस संदेश में समाज बस अपनी मानवीय जिम्मेदारी निभाता था कि घड़ों में पानी भर कर रख देता था।

यह सिर्फ घड़े का गुम होते जाना नहीं है, बल्कि इंसानियत की एक परंपरा का खत्म होना है। जो लोग इस बात को तो हवा दे रहे हैं कि अबकी विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा, क्या वे लोग इस घड़े को बचाने में अपना कोई योगदान दे रहे हैं? ऐसे लोग एक माहौल रचते हैं और लोगों के मन में डर पैदा करते हैं। यह डर अकारण नहीं है, बल्कि बाजार का दबाव उन्हें इस सुनियोजित साजिश का हिस्सा बनाता है। सवाल है कि अनुपम मिश्र की तरह आप ‘आज भी खरे हैं तालाब’ की तर्ज पर पानी की चिंता क्यों नहीं करते हैं! क्यों जलस्रोतों को बचाने की मुहिम में हिस्सेदार नहीं बनते हैं? मॉल और ऊंची इमारतों के नीचे कराहते हमारे जलस्रोत खुद को बचा लेने की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन हम उन्हें अनसुनी कर आगे बढ़ लेते हैं।

अभी सूरज की तपिश बढ़ी नहीं है, लेकिन हौले-हौले उसकी गरमी का अहसास होने लगा है और इसी के साथ पानी का संकट बढ़ने लगा है, जो लोगों के चेहरे से ‘पानी’ उतार रहा है। पानी के लिए पानी-पानी होते लोगों का व्यवहार अब नया नहीं रहा। साहबों की गाड़ियों की धुलाई में बेहिसाब पानी का खर्च और निचली बस्तियों में रहने वाले एक गरीब के बर्तन से गायब होता पानी आज का सच है। पानी का कम होते जाना एक बड़ा संकट है, लेकिन संकट इससे भी बड़ा यह है कि हम आज तक पानी के जतन के लिए जाग नहीं पाए हैं। मगर शहरों में जगह-जगह लगने वाले प्याऊ की संस्कृति छीजते जाने के पीछे पानी का गहराता संकट कारण नहीं है। यह छीजती संवेदना का प्रतीक है। लाल कपड़े में लिपटा पानी का घड़ा भारतीय समाज की जरूरत ही नहीं, बल्कि संस्कार है।

यहीं से यह संस्कार पानी के जतन की शिक्षा देता है। जरूरी है कि छोटे-छोटे प्रयासों से पानी को जीवन दें, लाल कपड़े में लिपटे पानी के घड़े को दिखने दें। ऐसा नहीं किया तो पानी के फेर में अब किसी के चेहरे पर ‘पानी’ नहीं रह जाएगा। तब कैसे कहेंगे पानीदार समाज, जब सड़क पर निकलें और गला सूखने पर पहले जेब को तैयार करना पड़े, फिर पानी की बिक्री के ठिकाने ढूंढ़ने पड़ें! जहां बेहिसाब पानी बहाने पर लगाम का कोई इंतजाम करना किसी भी सरकार और समाज की प्राथमिकता सूची में होना चाहिए था, वहां पीने के पानी को बोतल में बंद कर बाजार के हवाले करने में इसका हल ढूंढ़ा जा रहा है।

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