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दुनिया मेरे आगेः सभ्यता के विरुद्ध

हाल ही में हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिराने की घटना को पचहत्तर साल बीते। द्वितीय विश्व युद्ध के इस मंजर को जिसने भी देखा होगा या जिसके दिमाग में कहीं पढ़ा गया वह दृश्य उभरता होगा, वह इसे भुला नहीं सकता।

मौजूदा दौर में भी कई राष्ट्र अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के विस्तार के लिए परमाणु बमों से लेकर अन्य वैकल्पिक हथियारों को एकत्र करने की होड़ में संलग्न है।

भावना मासीवाल

कुछ दिन पहले एक अनौपचारिक बैठकी में युवाओं के एक समूह के बीच युद्ध को लेकर एक विचित्र उन्माद-सा दिखा। वे लोग दो देशों के बीच मतभेद का हल युद्ध में ही ढूंढ़ रहे थे। मेरे लिए यह समझना मुश्किल था कि क्या आज के इस तरह युवाओं के बीच इतिहासबोध की इतनी कमी है कि युद्ध को लेकर इतना रोमांचित होते हुए वे युद्ध के परिणामों पर कभी गौर नहीं करते! क्या उनके अध्ययन के दायरे में युद्ध या युद्ध की विभीषिका या त्रासद नतीजों की छाया कभी नहीं रही? क्या वे इंसानी सभ्यता पर युद्ध के पड़ने वाले असर से वे बिल्कुल ही नावाकिफ हैं?

हाल ही में हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिराने की घटना को पचहत्तर साल बीते। द्वितीय विश्व युद्ध के इस मंजर को जिसने भी देखा होगा या जिसके दिमाग में कहीं पढ़ा गया वह दृश्य उभरता होगा, वह इसे भुला नहीं सकता। छह और नौ अगस्त 1945 को हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराया था। दोनों शहरों में लगभग दो लाख से भी अधिक लोग मारे गए थे। हर तरफ मौत का मंजर पसरा हुआ था। जापान के ये दोनों शहर पूरी तरह से तबाह हो गए थे। जो लोग बच गए थे, वे भूख-प्यास और विकिरण या रेडिएशन से मौत की कगार पर आ खड़े हुए थे।

विकिरण से आसमान आग के गोले के समान लाल, बारिश का पानी काला और जहरीला हो गया था। उस बम विस्फोट से निकलने वाले रेडिएशन ने जापान की भविष्य की नस्लों को भी बीमार बना दिया था। एक ओर लोगों में सामान्य से अधिक ल्यूकेमिया, थायराइड, स्तन, फेफड़े का कैंसर बढ़ा तो दूसरी ओर महिलाओं के गर्भपात और शिशु मृत्यु दर में बढ़ोतरी हुई। इस विभीषिका का प्रभाव वहां के लोगों के जीन में हुए बदलाव के साथ बना रहा। युद्ध और उससे उत्पन्न इस विनाश को पूरे विश्व ने करीब से देखा है, पर इसे झेला जापान के उन लोगों ने, जिनका युद्ध से कोई ताल्लुक नहीं था। युद्ध के बाद जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों की तबाही का मंजर आज भी वहां के लोगों के जेहन में है। वह युद्ध का सबसे भयानक मंजर रहा है। इसके साथ ही ऐसे बहुत से युद्ध इन वर्षों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होते रहे हैं। खाड़ी देशों में युद्ध के ऐसे बहुत-से उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं। युद्ध ने हमेशा ही विभीषिकाओं को जन्म दिया है। यह हमेशा ही मानवता के लिए संकट बन कर उभरा है।

मौजूदा दौर में भी कई राष्ट्र अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के विस्तार के लिए परमाणु बमों से लेकर अन्य वैकल्पिक हथियारों को एकत्र करने की होड़ में संलग्न है। आए दिन विभिन्न देशों के बीच साम्राज्य विस्तार और अपनी सीमा को अतिक्रमण से बचाने के लिए युद्ध हो रहे हैं। साम्राज्य विस्तार की अंध नीति राज्यों के विवेक को शून्य कर देती है और सत्तासीन व्यक्ति उसके परिणाम को देख कर भी देखना नहीं चाहता। वर्चस्व की होड़ में अपने को श्रेष्ठ बनाए रखने की मानसिकता के कारण ही वर्तमान समय में विश्व में अशांति और युद्ध का माहौल बना हुआ है। एक ओर शांतिवार्ता होती है तो दूसरी तरफ युद्ध जारी रहता है। युद्ध कभी भी विकास नहीं लाता है, वह विनाश का जनक होता है। वह अपने साथ कई पीढ़ियों को खत्म कर देता है।

विज्ञान और यंत्रों के अविष्कार का उद्देश्य मनुष्य जीवन को सुविधासपन्न और सुरक्षित बनाए रखना रहा है। मगर मनुष्य की अति महत्त्वाकांक्षी नीयत और विस्तारवादी नीतियों ने विज्ञान और यंत्रों के दुरुपयोग को बढ़ावा दिया। अस्त्रों-शस्त्रों की अंधाधुंध होड़ को जन्म दिया और विश्व को बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया है। अब भी अगर हम सचेत नहीं हुए तो यह सुषुप्त ज्वालामुखी ही संपूर्ण मानव जाति के विनाश का कारण बनेगा।

महात्मा गांधी ने कभी कहा था- ‘मैं जानता हूं कि यह शरीर भी एक बहुत नाजुक यंत्र ही है। खुद चरखा भी यंत्र ही है, छोटी दांत-कुरेदनी भी यंत्र है। मेरा विरोध यंत्रों के लिए नहीं है, बल्कि यंत्रों के पीछे जो पागलपन चल रहा है, उसके लिए है’। उनकी यह बात हमें यह भान कराती है कि हम तमाम यंत्रों के विरोधी नहीं है, लेकिन हमें उसके अंधाधुंध और अनुचित प्रयोग के पागलपन से बचना चाहिए। विडंबना यह है कि आज का समय इसी पागलपन का दिख रहा है।

शांति स्थापित करने के लिए शक्ति संपन्न होना आवश्यक है, लेकिन शक्ति का यह संचयन किसी को डराने या किसी के अधिकारों के अतिक्रमण के लिए नहीं होना चाहिए। जब हम वर्तमान समय में विश्व में चल रही हलचलों को देखते हैं, तो लगता है यह पागलपन ही है जो कभी संसाधनों पर वर्चस्व को लेकर, तो कभी अपनी श्रेष्ठता के लिए, तो कभी विस्तारवादी नीति को पूरा करने के लिए विभिन्न तरह से सीमाओं के अतिक्रमण पर जोर देता है और युद्ध के माध्यम से डर के माहौल को बनाए रखता है। युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं होता है। अगर जापान और विश्व की युद्ध की घटनाओं से आज भी मनुष्य ने सबक नहीं सीखा तो इसका दुष्प्रभाव हमारी आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ सकता है।

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