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आकांक्षाओं का आकाश

महामारी के चलते कइयों का जीवन दुश्वार हो गया है। न घर पर रहे बनता है और न ही बाहर। इंसान करे तो क्या करे? सोशल मीडिया में महामारी के नाम पर अजीबोगरीब सृजनशीलता परोसी जा रही है।

टीवी डिबेट में मौजूद मनोचिकित्सक ने कोरोना महामारी के दौरान लोगों को बहुत अधिक नेगेटिव न्यूज ना देखने की सलाह दी। (फोटो – पीटीआई)

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

महामारी के चलते कइयों का जीवन दुश्वार हो गया है। न घर पर रहे बनता है और न ही बाहर। इंसान करे तो क्या करे? सोशल मीडिया में महामारी के नाम पर अजीबोगरीब सृजनशीलता परोसी जा रही है। कहीं पत्नी का मजाक तो कहीं पति का मजाक, कहीं गरीब का मजाक तो कहीं अमीर का मजाक। कहीं कुछ तो कहीं कुछ। सच तो यह है कि महामारी दुख का नहीं, चुनौती का दूसरा नाम है। अगर नजर दौड़ाएं तो आपको महामारी से परे कई चीजें दिखती हैं, जैसे- प्रेम, सूर्य की किरणें, दया, सृजनशीलता, सीखना, इच्छाएं। क्या इन्हें महामारी मिटा सकता है? कतई नहीं।

प्रेम महामारी से परे है। यह उन्मुक्त है। इसे मिटाने की ताकत दुनिया में किसी के पास नहीं है। यह स्वतंत्र और भावनाओं से ओत-प्रोत है। यह किसी में कम किसी में ज्यादा होता है, लेकिन होता अवश्य है। जैसे कि माता-पिता का प्रेम, माता-पिता का बच्चे से प्रेम, भाई का भाई से प्रेम, भाई-बहन का प्रेम, पति-पत्नी का प्रेम, प्रेमी-प्रेमिका का प्रेम, मनुष्य का मनुष्य से प्रेम, मनुष्य का पशु से प्रेम। इसे मिटा पाना दुनिया में किसी के बस की बात नहीं है। इसीलिए किसी कवि ने कहा था कि मोहब्बत एक अहसासों की पावन-सी कहानी है, कभी कबीरा दीवाना था, कभी मीरा दीवानी है। प्रेम के इस दीवानेपन पर किसका पहरा ठहरा है, जो अब ठहरेगा! इसलिए महामारी के इस सुनहरे अवसर पर अपना प्रेम जताना मत भूलिए।

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कइयों को लगता है कि महामारी से जीवन बेरंग बन गया है। महामारी में कभी उगते सूर्य की किरणों का मजा लें, तब जीवन बेरंग नहीं, सतरंगी लगेगा। सूर्य की किरणों में सात रंग होते हैं। ये हमारे जीवन में स्वतंत्रता का आभास दिलाने के लिए बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी और लाल रंग बन कर पदार्पण करते हैं। ये कभी खुशी तो कभी गम तो कभी चिंता, कभी नाराजगी तो कभी खोना या कभी पाने का अहसास दिलाते हैं।

इन रंगों से मिल कर जीवन रूपी वस्त्र का ताना-बाना बुनता है। मनुष्य दया की कमी में दानवता के महामारी में जकड़ जाता है। वास्तव में दया से करुणा की उत्पत्ति होती है और जहां करुणा की सरिता बहती है, वहां परमेश्वर विराजमान होते हैं। इसी करुणा से मनुष्य में एक अद्भुत शक्ति का उद्भव होता है, जो उसे दीन-दुखियों का सहारा बना देता है। दया से ही स्नेह, प्रेम, आत्मीयता और ममता जैसे कोमल मनोभावों का जन्म होता है। अगर हर व्यक्ति न केवल महामारी के समय, बल्कि आजीवन अपने हृदय में दया का बीज बो ले तो उसे एक अच्छा मनुष्य बनने से कोई नहीं रोक सकता। जहां दया होती है, वहां अन्य सद्गुण अपने आप चले आते हैं।

विज्ञान बताता है कि भौतिक वस्तु स्पर्श करने और अनुभूत करने योग्य होती है। मनुष्य की भौतिकता को महामारी क्षति पहुंचा सकता है, लेकिन उसकी सोच यानी सृजनशीलता को कतई नहीं। सृजनशील व्यक्ति के अंदर नए-नए विचार, क्रियाएं, कल्पनाएं और आविष्कारों की योग्यता रहती है। महामारी के इस समय में हमें परंपरागत तरीकों से हट कर असाधारण विचार उत्पन्न करने के बारे में सोचना चाहिए। दृढ़ निश्चय और साहस के साथ आगे बढ़ने पर सफलता कदम चूमती है। बुद्धि और सृजनात्मक कला का मिलन सोने पर सुहागा जैसा होता है।

ऐसे में अगर कुछ सीखने की इच्छा है, तो उसे अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए। किसी ने सच ही कहा है- इससे पहले कि जीवन चूके, इससे पहले कि सब कुछ छूटे और जीवन लगने लगे बला, सीखें जीवन जीने की कला। जन्म लेना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन इस जीवन को सुंदर बनाना हमारे हाथ में है और जब सुख की यह संभावना हमारे हाथ में है तो फिर यह दुख कैसा? शिकायत कैसी? हम क्यों भाग्य को कोसें और दूसरे को दोष दें? जब सपने हमारे हैं तो कोशिशें भी हमारी होनी चाहिए। जब पहुंचना हमें है तो यात्रा भी हमारी ही होनी चाहिए। क्यों न इस महामारी के समय को कुछ नया सीखने या फिर अधूरी इच्छा को पूरा करने या फिर कुछ पढ़ने, लिखने या कुछ काम करने के नाम करते हैं! यह सब अभी संभव है। सोचने-समझने और कुछ कर गुजरने के लिए इससे अच्छा अवसर फिर कभी नहीं मिलेगा।

एडम स्मिथ ने कहा था कि मनुष्य की इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। वैसे इच्छाओं के साथ समझौता करने की आवश्यकता भी नहीं है। समय जो महामारी का है! जब समय ही महामारी का है तो क्यों न हम अपनी योग्य इच्छाओं को पाल-पोस कर उसे इतना बड़ा करें कि वह हमें चैन से बैठने ही न दे। भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था कि सपने वह नहीं जो नींद में आते हैं, सपने तो वे हैं सोने नहीं देते। इन सपनों को साकार करने के लिए इच्छाओं की आग दहकती रहनी चाहिए। जैसे भूखे को रोटी की इच्छा, गरीब को अमीर होने की इच्छा, बेरोजगार को नौकरी की इच्छा, एकतरफा प्रेम में प्रेमी को उसकी प्रेमिका मिलने की इच्छा! इच्छा! इस बेशकीमती समय में अपनी वाजिब इच्छाओं को पूरा करने के लिए सकारात्मकता की राह ली जाए।

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