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सिमटता सिनेमा

पिछले कुछ वर्षों में ‘मॉल-संस्कृति’ ने शहरों-महानगरों में जबर्दस्त धावा बोला है। मॉल के भीतर पांच-छह स्क्रीन वाले महंगे सिनेमा हॉल खोल दिए गए। उन्हें सिल्वर, गोल्ड, डायमंड आदि कई खानों में बांट दिया गया..

पीवीआर अनुपम

लगभग बारह वर्ष पहले दिल्ली आई थी। हर आम युवा की तरह मुझे भी शुरू से फिल्मों का शौक था। जाहिर है, मैंने खूब फिल्में देखीं। दूसरे कई राज्यों से दिल्ली का रुख करने वाले अन्य प्रवासियों की तरह मेरी कोशिश यही रहती थी कि जेब-खर्च से पैसे भी कम खर्च हों और शौक भी पूरा होता रहे। तब यह संभव था। लेकिन आज यही बात दावे के साथ नहीं कही जा सकती। दिल्ली में तब और आज के सिनेमा-घरों के बीच बहुत अंतर आ चुका है। अब दिल्ली कई मायनों में काफी बदली भी है। तब दिल्ली में छोटे और एक ही स्क्रीन या परदे वाले सिनेमा घर हुआ करते थे। खासकर पूर्वी और उत्तर दिल्ली में ऐसे सिनेमा-घरों की संख्या अधिक थी। उन दिनों सिनेमा-घरों के टिकट के दाम भी इतने हुआ करते थे कि विद्यार्थियों के लिए तो मनोरंजन आसान था ही, साथ ही वह निम्न आयवर्ग की भी पहुंच में था। तब हम अधिक से अधिक चालीस से पचास रुपए में ठीक-ठाक हालत वाले हॉल में फिल्में देख लेते थे। खाने का समान भी घर से ले जाते थे, ताकि उसके भी पैसे बचा लिए जाएं।

लेकिन पिछले दस-पंद्रह वर्षों में दिल्ली सहित दूसरे शहरों-महानगरों में जब से बाजार ने बहुत तेजी से अपने पांव पसारने शुरू किए, तो अन्य राज्यों से आए विद्यार्थियों की तो दूर, साधारण आमदनी वाले स्थानीय परिवारों के लिए भी सिनेमा-घरों में जाकर फिल्म देखना दूर की कौड़ी साबित होने लगा। ‘मल्टीप्लेक्स कल्चर’ का बोलबाला बढ़ा। छोटे और सिंगल स्क्रीन वाले सिनेमा-घर एक-एक करके बंद होते चले गए या बंद हो रहे हैं। उन्हें बड़े उद्योग घरानों और व्यापार समूहों ने खरीद लिया। पीवीआर समूह, डीएलएफ आदि इस मामले में सबसे आगे रहे। साधारण और बड़े स्वाभाविक से दिखने वाले उन सिनेमा-घरों को तोड़ कर उनकी जगह शीशे की चमचमाती, कृत्रिम और स्वप्न-सी लगने वाली दुनिया खड़ी कर दी गई। इन्हें एक गरीब आदमी भौंचक्का होकर सिर्फ दूर से तो देख सकता है, लेकिन उसमें प्रवेश नहीं कर सकता।

दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में ‘मॉल-संस्कृति’ ने शहरों-महानगरों में जबर्दस्त धावा बोला है। मॉल के भीतर पांच-छह स्क्रीन वाले महंगे सिनेमा हॉल खोल दिए गए। उन्हें सिल्वर, गोल्ड, डायमंड आदि कई खानों में बांट दिया गया। जबकि न तो इनमें दर्शकों के बैठने की व्यवस्था में कोई खास अंतर रहता है, न परदे के कोण या देखने की स्थिति में कोई खास बदलाव आता है। असल में यह अभिजात-उच्चवर्गीय मानसिकता को भुनाने की तरकीब मात्र के सिवाय और कुछ नहीं। लेकिन इससे हुआ यह कि इस तरकीब के नतीजे में टिकटों के दाम पहले से चार-पांच गुना या इससे भी ज्यादा बढ़ा देने की ‘सुविधा’ मिल गई। यही नहीं, सप्ताह के अलग-अलग दिन टिकटों की कीमतों में भी अंतर रहता है। सप्ताहांत के दो या तीन दिनों के दौरान उसी टिकट के दाम काफी बढ़ा दिए जाते हैं।

पहले छोटे और एक परदे वाले सिनेमा-घर हर वर्ग की पहुंच में थे। जो सिनेमा कभी सिर्फ मनोरंजन का साधन था, अब वह ऐश्वर्य के विषय में तब्दील हो गया। पुराने सिनेमा-घरों के आसपास चाय-समोसे की छोटी दुकानें या ठेले भी होते थे जो इंटरवल के दौरान दर्शकों को उचित पैसे पर खाने-पीने की चीजें आसानी से मुहैया कराते थे। अब मल्टीप्लेक्स के आने से वे रेहड़ी या ठेले अब ‘मैक्डॉनल्ड्स’ और ‘केएफसी’ या सिनेमाघरों के अपने ऐसे ही महंगी दुकानों द्वारा हड़प ली गई है। छोटे व्यापारियों को अपनी जगह छोड़ने को मजबूर कर उनसे उनके रोजगार के साधन छीन लिए गए। हर जगह बड़े व्यापारियों को फायदे मिले। अब फिल्मों के लिए हॉल भी इनके और खाने-पीने की दुकानें भी इन्हीं के। नागरिक सुरक्षा के नाम पर हॉल के अंदर खाने-पीने के निजी सामान ले जाने की मनाही सुरक्षा की गारंटी ले न ले, मुनाफे के केंद्रीकरण या कुछ लोगों के हाथों में सिमटने का एक तंत्र जरूर मजबूत करती है।

इसके अलावा, आजकल ज्यादातर फिल्में कहीं न कहीं एक खास दर्शक वर्ग को ही ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं। आखिर छह या आठ सौ रुपए का टिकट लेकर ‘गोल्ड क्लास’ वाला दर्शक ही तो फिल्म उद्योग के धंधे को ही समृद्ध कर सकता है! कुल मिला कर सिनेमा घरों के माध्यम से बाजार का यह संदेश है कि जिसके पास अथाह पैसे होंगे, मनोरंजन पर भी अब उन्हीं का अधिकार होगा। मॉल और मल्टीप्लेक्स ने मिल कर दिल्ली के छोटे बाजारों और सिनेमा-घरों का लगभग सफाया कर दिया है।

यह महज संयोग नहीं है कि दुनिया के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सूची में भारत अव्वल आता है। बाजार ने बड़ी चालाकी से पहले जरूरतें पैदा की हैं, फिर बहुत ही भोलेपन के साथ खुद को सहज स्वीकार्य बनाया है। धीरे-धीरे स्वास्थ्य और शिक्षा से लेकर सिनेमा और मनोरंजन- हर क्षेत्र को अपने पंजों में जकड़ा है। अब दिल्ली में न वे छोटे और सादे सिनेमा घर हैं और न ही उनके आसपास के चाय समोसे वाले। बस है तो एक अजीब-सा चकाचौंध और उसमें डूबते-उतराते-चौंकते और कम पैसे होने के चलते मनोरंजन से महरूम लोगों की दुनिया!

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