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सातार का अदृश्य जल

मध्यप्रदेश में ओरछा के निकट बहती सातार नदी की धार अब सूख गई है। एक नदी का विलुप्त होना इतिहास और संस्कृति की मृत्यु की तरह है। मैं सातार के किनारे शहीद चंद्रशेखर आजाद (बलिदान 27 फरवरी, 1931) की उस कुटिया के पास खड़ा था जहां ‘काकोरी कांड’ (1925) के बाद क्रांतिकारी दल को जोड़ने […]

Author February 27, 2015 7:00 PM

मध्यप्रदेश में ओरछा के निकट बहती सातार नदी की धार अब सूख गई है। एक नदी का विलुप्त होना इतिहास और संस्कृति की मृत्यु की तरह है। मैं सातार के किनारे शहीद चंद्रशेखर आजाद (बलिदान 27 फरवरी, 1931) की उस कुटिया के पास खड़ा था जहां ‘काकोरी कांड’ (1925) के बाद क्रांतिकारी दल को जोड़ने और उसे विस्तार देने का काम साधु वेष में आजाद ने कर्मठता और सजगता से गुुप्त रह कर संपन्न किया था। सातार तट पर अब आजाद की एक ऊंची प्रतिमा स्थापित कर दी गई है। कुटिया के बाहर दीवार पर ‘चंद्रशेखर आजाद कुटी’ लिखा है। यहां से बीस कदम की दूरी पर एक गुफा भी है, जिसमें आजाद को उन दिनों मौके-बेमौके छिपने की जगह मिल जाती रही होगी। यह इलाका मध्यप्रदेश में है, पर झांसी से यहां की दूरी सिर्फ दस-बारह किलोमीटर है।

फरारी की हालत में आजाद का केंद्र झांसी था। इस शहर को इस बात श्रेय है कि उसने आजाद को सघन क्रांतिकारी अभियान के दिनों में सुरक्षित जीवन जीने का अवसर प्रदान किया। यहां उनके क्रांतिकारी साथी और संरक्षक मास्टर रुद्रनारायण सिंह, भगवानदास माहौर और सदाशिवराव मलकापुरकर थे। मास्टर साहब तो आजाद के बड़े भाई जैसे थे। वे उनकी पत्नी के झगड़ालू देवर और बच्चों के प्रिय चाचा थे। मास्टर साहब के लिए आजाद के राजनीतिक मूल्य से अधिक उनका पारिवारिक मूूल्य था। कई बार खतरों के समय मास्टर साहब के घर में वे सुरक्षित बने रहे।

आजाद सातार तट पर रहे तो वहीं से उन्होंने क्रांतिकारी दल के बिखरे सूत्रों को जोड़ लिया था। काकोरी के मुकदमे की सूचनाएं और अखबारों की कतरनें आदि उनके साथी उन्हें दे जाते थे। यहां रहते हुए आजाद का संपर्क झांसी के जिन लोगों से बना हुआ था, उनमें सदाशिवजी के अलावा विश्वनाथ वैशम्पायन, बालकृष्ण गिधौशेवाले, सोमनाथ और कालिकाप्रसाद अग्रवाल थे। आजाद के गुप्त निवास के बारे में इन्हीं को मालूम था। सातार नदी के किनारे आजाद आधा कंबल कमर से बांधे और आधा कंधों पर डाले सातार तटवासी बाबा बने रहे। लेकिन जल्दी ही वे धोती-कुर्ता से लैस होकर दल की एक साइकिल पर ढिमरपुरा आने-जाने लगे। काकोरी मामले से जुड़े क्रांतिकारियों में आजाद ही अकेले थे, जो फरारी की हालत में सक्रिय रह कर भी ब्रिटिश पुलिस के हाथ नहीं आए। नेतृत्व की स्वाभाविक जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गई थी। क्रांतिकारी साथियों ने आजाद से मांग की कि वे झांसी छोड़ कर लाहौर, दिल्ली, आगरा, कानपुर, बनारस आदि शहरों में बारी-बारी से रहें। लेकिन आजाद ने अपना मुख्यालय झांसी ही बनाए रखा।

एक बार आजाद सातार तट से झांसी लौट रहे थे कि उनका सामना दो पुलिस वालों से हो गया। वे पूछने लगे- ‘क्या तू आजाद है?’ बिना चौंके आजाद ने कहा- ‘हां, आजाद तो हैं! सो तो हम लोग होते ही हैं। हमें क्या बंधन है बाबा!’ सिपाहियों ने थाने चलने कहा तो वे दृढ़ता से बोले- ‘तुम्हारे थाने के दारोगा से हनुमानजी बड़े हैं। मैं तो हनुमानजी का हुक्म मानूंगा।’ पुलिस वाले भी उनकी सूरत देख कर समझ गए कि हनुमान भक्त उनसे तगड़ा है, सो उससे उलझना ठीक नहीं। आजाद ने कुछ खतरों को भांप कर सातार और ढिमरपुरा छोड़ दिया। इसके बाद मास्टर रुद्रनारायण ने उन्हें झांसी के नई बस्ती मुुहल्ले में एक मोटर चालक रामानंद के यहां रख दिया, जहां वे एक मोटर कंपनी में काम करने लगे। देश स्वतंत्र होने के बाद एक दिन पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी आजाद की मां जगरानी देवी को क्रांतिकारी भगवानदास माहौर और सदाशिव राव मलकापुरकर के साथ लेकर सातार तट पर आजाद की वह कुटिया दिखाने लाए। यहां पहुंच कर आजाद की मां बिलख कर बेटे की याद में रोर्इं। मैं मां जगरानी देवी की चीखों की प्रतिध्वनि सुन कर बेचैन हो रहा हूं! कुटिया के भीतर आजाद का एक चित्र है।

आजाद की स्मृति की साक्षी सातार ने अब बहना बंद कर दिया है। उसमें एक बूंद पानी नहीं। धूल उड़ने लगी है उसकी तलहटी में। चार मजदूर औरतें फावड़े से सातार के बहाव की दिशा में ऊंची मिट्टी को खोद कर किनारों की तरफ ले जा रही हैं। इससे शायद बरसात में कुछ पानी जमा हो जाए और वह बेतवा की ओर फिर से बहने लग जाए। आजाद इस सातार की धार में नहाते रहे होंगे। सातार के साथ अब इस जगह का इतिहास भी लुप्त हो रहा है। आजाद के क्रांतिकारी जीवन की स्मृतियों को जानने के लिए अब यहां कोई नहीं आता, यहां रहने वाले साधु मंगल सिंह तोमर बताते हैं। सूखी सातार को देखना हमारे लिए बेहद पीड़ादायक है। डॉ रामविलास शर्मा ने अपने संस्मरणों में आजाद के साथियों- भगवानदास माहौर, सदाशिवजी और मास्टर रुद्रनारायण की त्रयी को बहुत अपनेपन के साथ याद किया है, जहां सातार जिंदा है और बहती भी है।

सुधीर विद्यार्थी

 

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