ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः एक-से दरबारी चेहरे

बंदी के दिनों में जमाखोरों, कालाबाजारियों और तस्करों ने अपना हाथ दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बाजारबंदी के दिनों में दुकानों के आधे शटर खुलने का एक रिवाज पैदा हो गया है।

बाजारबंदी के दिनों में दुकानों के आधे शटर खुलने का एक रिवाज पैदा हो गया है।

सुरेश सेठ

महामारी ने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लिया। इस मौत की आशंका का कोई चेहरा नहीं है। हुक्म है कि इसे अपना चेहरा दिखाना नहीं, चाहे गमछे से ढंका हो या नकाब से। असली चेहरा नजर न आए। लगा था, मौत के दरबार में सब चेहरे एक-से हो गए, एक-से डरे हुए और नकाबों में अपना मुंह छिपाते लोग। मौत के भय ने एक चपत लगाई, आयातित गाड़ियां, साइकिलों से बगलगीर होती नजर आने लगीं।

लेकिन काश, ऐसा हो सकता। नकाब से लिपटे इन चेहरों ने तो नए अंदाज अपना लिए। असली चेहरे सामने क्या आने थे, नकली चेहरों ने फेसबुक, ट्विटर, वाट्सऐप पर अपनी नुमाइश सजा ली। कोई दार्शनिक बन गया, कोई उपदेशक, कोई सेहत उपदेशक बन कर रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के नुस्खे दे रहा है। असली सेनेटाइजर और नकाब काली मंडी के लिए जमाखोरों ने लुप्त कर दिए, तो अब विषाणु से मुकाबले के लिए बाप-दादा के जमाने के फिसड्डी साबुन और तेल बेचे जा रहे हैं। मुत्यु की निरंकुशता का दर्शन शास्त्र बघारते हुए दार्शनिकों ने अपने पीछे चेले-चाटों की कतार लगा ली।

भय छूत कासंक्रमण का था कि कहीं हमें अपनी गिरफ्त में न ले ले। लेकिन यह क्या हुआ? सोशल मीडिया पर नए लेखकों की सुनामी आ गई। जहां देखो, वेविनार आयोजित होने लगे। अंदाज वही है बात कहने का, ‘मैं तेरा मुल्ला वगो, तू मेरा हाजी वगोयम।छ लीजिए, वेविनारों में भी तस्वीरें एक-दूसरे को हार पहनाने लगीं। एक-दूसरे की शान में कसीदे पढ़े जा रहे हैं। एक-दूसरे का मौखिक अभिनंदन करने के बाद नीचे दिए गए ‘लाइकछ की गिनती होती है। कम निकले तो उन्हें बढ़ा दिया जाता है। फेसबुक में एक-एक नाम से कई-कई खाते खुलने लगे।

इधर महामारी के कारण पूर्णबंदी हो गई। बाजार, दुकान सब बंद। अपना थोबड़ा बलमा सिपहिया को दिखाओ तो वह बेंत बरसाता है। सड़क पर उठक-बैठक करवाता है। मेढक की तरह फुदकना सिखाता है। भले लोगों ने सोचा, इससे तो अच्छा है कि घरों में बंद हो जाओ। मोबाइल, टीवी स्क्रीन पर अधोवस्त्र पहने नए योगियों को योगाभ्यास करते देखो। लगता था, हवा में एक ही संदेश गूंजता है, ‘कम खाओ, वजन घटाओछ। लाभ बताने वाले ने कहा कि यह संदेश फलीभूत हो गया तो अन्न संकट दूर हो जाएगा और वजन कम हो गया, तो नीम-हकीमों का धंधा बंद करवा दोगे तुम लोग।

लीजिए, जो चाहा वह सभी हुआ है इस देश में। पूर्णबंदी के बीते पखवाड़ों का आकलन करने बैठे तो पता चला, घरों में बंद हो गए महानुभावों ने अति उत्साह के साथ जनसंख्या बढ़ाने की नींव रखनी शुरू कर दी है। कहां तो परिवार नियोजन के साथ जनसंख्या दर घटाने के मंसूबे थे और कहां अब आकलन बता रहा है कि यह बंदी इसी तरह लगी रही, तो नौ महीनों के बाद दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश चीन नहीं, भारत कहलाएगा। वैसे भी जनगणना का वक्त आ ही गया। उम्मीद है कि तब तक इस खाली समय बिताने के उत्साह के कारण भारत को दुनिया का सर्वाधिक आबादी वाला देश घोषित होने में कोई कठिनाई नहीं होगी। चीन तो वैसे ही कोरोना विषाणु फैलाने का लांछन लेकर वुहान और अन्य इलाकों में हुई मौतों के आंकड़े छिपाने में लगा है।

बंदी के दिनों में जमाखोरों, कालाबाजारियों और तस्करों ने अपना हाथ दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बाजारबंदी के दिनों में दुकानों के आधे शटर खुलने का एक रिवाज पैदा हो गया है। दुकान में आपके कृपानिधान छिपे बैठे हैं। आप दस्तक दो, सामान की पर्ची खिसकाओ, वस्तुएं बाहर आ जाएंगी, उस बिल के साथ जिस पर काली कीमत के रूप में कृपानिधानों ने पहले ही महामारी टैक्स लगा रखा है। आप बिना चूं-चपड़ किए दाम अदा कर दीजिए। इस कठिन समय में सामान मिल गया, कम गनीमत है! दाम अधिक लगा तो क्या? इसका हिस्सा चौकसी वालों को भी तो जाएगा।

उधर घरों में बंद लोगों में अवसाद और मनोव्याधियां भी बढ़ रही हैं। इतने दिनों तक गली बाजारों की बंदी के सन्नाटों में उस पार की भयावहता के दर्शन करते रहे। अब तो जान की चिंता कम और जहान की चिंता अधिक होने दो। इनके बाहर सामाजिक दूरी का सिद्धांत टूटने का डर है, तो बाहर इंतजाम के सफेद वृत्त लगा दो। वृत्तों में खड़े होना शान से नीचे लगे तो जनाब, थोड़ी-सी जेब ढीली कीजिए। भोले हो, कब समझोगे बाबू? खाली पीली दस्तक और सोने की गिलासी में लिपटी दस्तक में अंतर होता है। यह अंतर आज का नहीं, हमेशा से रहा है। लेकिन इस अंतर को मिटाएगा कौन? मृत्युभय के उस तांडव की बज्म से जो भी निकला परेशान निकला, दवा की तलाश की गुजारिश करता निकला। दिलासाबाबुओं ने कहा, बस आ रही है दवा। पर न जाने कितने बरस हो गए, न दवा से किसी का संवरा और न ही दुआ से किसी का संवर पाया। और अब महामारी के इस झंझावात में आइए किसी सार्थक दवा की तलाश में निकलें, जो कारगर दुआ बन सके।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 दुनिया मेरे आगे: सृजन के सेतु
2 दुनिया मेरे आगे: ज्ञान के पायदान
3 दुनिया मेरे आगे: बुजुर्गों का कमरा
राशिफल
X