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दुनिया मेरे आगेः आत्मपीड़न का साहित्य

अगर साहित्य वास्तव में समाज का दर्पण है तो उसे दर्पण का धर्म निभाना चाहिए। यथार्थ का ईमानदारी से बयान करके, समाज के चेहरे पर लगे हुए मुखौटों का पर्दाफाश करके।

(File Photo)

अगर साहित्य वास्तव में समाज का दर्पण है तो उसे दर्पण का धर्म निभाना चाहिए। यथार्थ का ईमानदारी से बयान करके, समाज के चेहरे पर लगे हुए मुखौटों का पर्दाफाश करके। दर्पण अगर विकृतियां उजागर करने को ही अपने अस्तित्व का मूल प्रयोजन समझ कर सौंदर्य की तरफ से पूरी तरह विमुख हो जाए तो उसे दिग्भ्रांत कहा जाएगा। जिस दर्पण में केवल उत्तरोत्तर विकृत होते चेहरे, उभरती झुर्रियां, आक्रोश, असहायता और अवसाद ही दिखें और सौंदर्य, मुस्कान और उत्फुल्लता कभी दिखे ही नहीं, उसमें और सादे कांच के टुकड़े में अंतर ही क्या!
आज अवसाद, कुंठा, निराशा, बेचैनी, यंत्रणा, वेदना और व्यथा जैसे शब्द तमाम विधाओं के लिए वह कुंजी बन गए हैं, जिसके प्रयोग से साहित्य के मठों के बंद दरवाजे खुल जाते हैं। कभी फिल्मी गीतों में सैंया, बैंया, छैयां, गलबैयां जैसे शब्दों से खत्म होने वाली पंक्तियों में लोकप्रियता छिपी रहती थी। मंचीय महारथियों की कवितायें हाला, प्याला, माला, शाला जैसे शब्दों को पिरो कर सफलता के शिखर चूमती थीं। युग बदला। साहित्य बदला। पलायनवादी रूमानियत से उकताया हुआ पाठक साहित्य में यथार्थ-चित्रण की एक नई दुनिया में आ गया, जिसमें सिक्कों की झंकार के आगे रूमानियत ने घुटने टेक दिए। बचा तो केवल चैन की तलाश में भटकते इंसान का मानवीय संवेदनाओं से विमुख होकर अपनी आत्मा के हनन का निरूपण। लेकिन अब आत्मपीड़न की ऐसी आदत पड़ गई है साहित्य की जीभ को कि वह समाज के दुखते हुए दांत को ठेल-ठेल कर दर्द बढ़ाने में ही आनंदित हो पाती है।
जीवन के कालजयी मूल्यों को अंधी गलियों में भटकते हुए दिखाते-दिखाते समाज का दर्पण कहे जाने वाले साहित्य की चमक इतनी धुंधला गई है कि वह खुद अवसाद में घिर गया है। नित्य बदलती हुई दुनिया के साथ जो खुद को बदल न पाए, वे आज को गरियाने और बीते हुए कल की याद में रोने में इतने निपुण हो गए कि उन्हें सुनने वाले उसी को संगीत समझ बैठे हैं। प्रतिस्पर्धा के वैश्विक बाजार में पिछड़ते लोगों का हौसला बढ़ाने के बजाय उनके टूटे मनोबल को मातमी साहित्य में प्रतिबिंबित किए जाने का चलन वेग पकड़ गया। समाज के हर विकृत प्रतिबिंब में अपनी ही छवि देख कर पाठक तृप्त होने लगे। साहित्य के इस नए अवतार में आज बिल्कुल अंधेरा है, भविष्य से कोई उम्मीद नहीं और बीता हुआ कल एक स्वर्णिम मृगमरीचिका है। वह कल वास्तव में इतना स्वर्णिम रहा होता तो समाज उसे नकारता ही क्यों? लेकिन पीछे मुड़ कर देखना साहित्य पर ऐसे हावी है कि साहित्य के चश्मे से बीता हुआ कल केवल स्वर्णिम दिखता है!
लेकिन अपना भोगा हुआ यथार्थ कुछ और ही कहता है। इन बूढ़ी होती आंखों ने बीते हुए कल को इतना नृशंस देख रखा है, उसके सामने इंसान को इतना असहाय देखा है कि आज का चीत्कार वैसे व्यक्ति का रुदन लगता है जो हाथ में आई स्वर्णमुद्रा को पहचानता नहीं। सामाजिक विसंगतियों से हताश आज के युवाओं ने वह युग देखा ही नहीं है, जब मौत के साये एक बड़ी जनसंख्या के सिर पर पैदा होने के साथ ही मंडराने लगते थे। दलित विमर्श पर आज लिखने वालों को कदाचित अनुमान ही नहीं है उस पीड़ा, अपमान और तिरस्कार का जब डॉक्टर तुलसीराम सरीखों को ‘मुर्दहिया’ के गिद्धों के साथ बांट कर खाने को मिलता था मृत ढोर-डंगरों का मांस।
जिन्होंने वे भयंकर दिन देखे हैं, उन्हें लगता है कि आज का दलित-विमर्श समाज में हो रहे क्रांतिकारी परिवर्तनों को देखना ही नहीं चाहता। विघटित हो रहे सामाजिक सरोकारों से जन्मे उत्पीड़न को महसूस करने वाली आज की पीढ़ियां ‘बूढ़ी काकी’ को भूल जाती हैं। नारी विमर्श के ध्वजवाहक सती प्रथा की आंच से बच निकली विधवाओं के उस उत्पीड़न की कल्पना ही नहीं कर पाते जो सहस्रों अभागिनों को मथुरा के मंदिरों के बाहर भिखारियों की पंक्ति में बैठा देती थीं। बेकारी से बेचैन युवा उन्हें नहीं देख पाते जो बेगारी की राह से गुजर कर, बंधुआ मजदूरों की बस्ती को पीछे छोड़ कर, स्वाभिमानपूर्वक अपने पसीने की कमाई को हक से मांग कर जीना सीख गए हैं। सम्मिलित परिवारों में लगातार चलते वैमनस्य और कलह की कहानी सब भूल गए हैं। दिखता है तो केवल एकाकी जीवन बिता रहे वृद्धों के जीवन का सूनापन।
लेकिन बदलती सामाजिक व्यवस्थाओं ने वृद्धों को अपनों के तिरस्कार से मुक्ति दिला कर स्वतंत्र जीवन जीने का हौसला भी दिया है। आज की कई कल्याणकारी योजनाओं से नितांत अपरिचत हैं वे कलमकार जिन्हें समाज और देश में लगातार होती बेहतरी नहीं दिखती। जान कर भी कि स्वर्णलंका एक दिन में नहीं गढ़ी गई थी, वे देखते हैं तो केवल अवसाद, त्रासदी, कुंठा और निराशा!

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