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सिनेमा के सहारे

फिल्मों और उनमें बताई-दिखाई बातों का गहरा असर इंसान के मन-मस्तिष्क में प्रत्यक्ष रूप से होता है। सिनेमा के पास पर्याप्त अवसर होते हैं, किसी भी बात को अभिव्यक्त करने के।

Author June 17, 2019 2:06 AM
फिल्म मंटो के एक सीन में नवाजुद्दीन सिद्दीकी। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

एकता कानूनगो बक्षी

‘साहित्य और सिनेमा हमारे समाज का दर्पण है’। यह वाक्य हमें स्कूली दौर में लिखे निबंध की याद दिला देता है। हालांकि उस दौर में हम सिनेमा की बारीकियों से अनभिज्ञ होते हैं। सिनेमा का इतिहास, फिल्म बनने की प्रक्रिया, यहां तक कि नायक-नायिका की अभिनय कला और उनके संघर्षों को भी हम नहीं समझ पाते थे। फिर भी निर्धारित शब्दों की सीमा में हमारा निबंध तैयार हो जाता था जो परीक्षा में हमारे अंक सुनिश्चित कर देता है। जिस विषय को शिक्षा प्रणाली में इतना महत्त्व दिया जाता है और उस पर निबंध लिखवाया जाता है, उसका जीवन में कितना व्यावहारिक उपयोग रहता है!

मुझे लगता है कि उसके लिए उस वक्त विद्यार्थियों द्वारा अपेक्षित शोध और मेहनत नहीं की जाती। एकमात्र उद्देश्य परीक्षा में अंक अर्जित करना ही रहता है। वाकई सिनेमा और उसका इतिहास क्या है, वह कैसे बनता है, कैसे कोई इंसान अपने मूल रूप से हट कर एकदम अलग किरदार निभाता है और उसके भीतर तक समाहित हो जाता है, कैसे कहानियां रची जाती हैं, कैसे किसी फिल्म के डायलॉग अमर हो जाते हैं! बिना यह सब जाने और कई तरह की फिल्में देखे बिना हम कैसे उस पर सटीक निबंध लिख सकते हैं। मेरा मानना है कि फिल्में भी अब पाठ्यक्रम का एक जरूरी हिस्सा बनें। इसमें अलग-अलग समय और देश में बनी अच्छी फिल्में दिखाई जाएं। उस पर सामाजिक, आर्थिक के साथ राष्ट्रीय मुद्दों का विश्लेषण किया जाए। कई विद्यालयों में पहले और आज भी फिल्में दिखाई जाने की परंपरा रही है, पर अधिकतर उसका मकसद महज मनोरंजन ही रहा है। सामान्य विद्यालय आज भी स्तरीय सिनेमा की पहुंच से काफी दूर दिखाई देते हैं। हालांकि प्रबंधन की पढ़ाई में ‘लगान’ जैसी कुछ फिल्मों के संदर्भों का प्रयोग होता रहा है, लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता।

फिल्मों और उनमें बताई-दिखाई बातों का गहरा असर इंसान के मन-मस्तिष्क में प्रत्यक्ष रूप से होता है। सिनेमा के पास पर्याप्त अवसर होते हैं, किसी भी बात को अभिव्यक्त करने के। सिनेमा के जरिए हम अपने जैसे ही किरदारों को बोलते-सुनते अलग-अलग परिस्थितियों से उलझते-संभलते देख सकते हैं। हम समाज में उपस्थित अलग-अलग चरित्र के लोगों का अध्ययन कर सकते हैं। हम भिन्न-भिन्न क्षेत्र की संस्कृति, विचारधारा और वहां के लोगों के रोजमर्रा के जीवन और संघर्षों को देख सकते हैं। समाज में प्रचलित विभिन्न भाषाओं और भोजन के बारे में अपनी जानकारी बढ़ा सकते हैं। अलग-अलग देशकाल की खूबसूरती और तत्कालीन कुरीतियों को समझकर संवेदशील और बेहतर इंसान बन सकते हैं। इसके अलावा, स्वस्थ मनोरंजन जीवन को प्रफुल्लता से तो भर ही देता है। हमारे जीवन के कुछ दौर काफी संघर्षपूर्ण होते हैं। जरूरी नहीं कि हमारे साथ हमेशा कोई ऐसा साथी मौजूद हो जो हमारा उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन करता रहे। ऐसे में किताबें हमारी सबसे अच्छी दोस्त होती हैं, लेकिन फिल्में भी हमारे अकेलेपन को काफी हद तक कम कर देती हैं। खासकर नई टेक्नोलॉजी के इस दौर में हम अपने कंप्यूटर और टीवी पर भी घर बैठे मनचाही फिल्में देख सकते हैं। अपने बहुमूल्य समय को लंबे समय तक सिर्फ बेकार के कामों में व्यर्थ गंवाने से आगे चल कर अवसाद की स्थिति पैदा हो सकती है।

ऐसे कई उदाहरण हमारे समाज में मौजूद हैं, जहां फिल्में देख कर और अपने मनपसंद कलाकारों से प्रेरित होकर लोगों का जीवन बदला है। मैं अपनी एक दादी को जानती हूं जो दादा के देहांत के बाद काफी निष्क्रिय हो गई थीं। उनके परिवार के जागरूक सदस्यों ने थोड़ा अध्ययन करके कुछ फिल्मों की सूची बनाई और रोज उन्हें दोपहर में एक फिल्म दिखाई गई। ऐसे में दादी की बोरियत तो दूर हुई ही, उनके अंदर उन फिल्मों से प्रेरित होकर एक बार फिर स्फूर्ति आ गई और उन्होंने आगे के जीवन को पूरी तरह से स्वीकार कर फिर से जीवन की दौड़ लगाते ही अपनी नई सफल पारी की शुरुआत की। विद्यार्थियों और युवाओं के लिए भी अच्छा सिनेमा बहुत जरूरी है, ताकि वे असल जीवन के संघर्ष और हकीकत से समय रहते रूबरू हो सकें और कम उम्र में आत्महत्या की प्रवृत्ति या अन्य मनोरोगों से दूर रह स्वस्थ और प्रयत्नशील बने रह सकें। ऐसी कई फिल्में हैं जो गिर कर उठना और संघर्ष करते रहना सिखाती हैं और साहसी भी बनाती हैं। कुछ फिल्में सबके साथ बैठ कर देखना चाहिए, जिसमें पूरा परिवार साथ-साथ हंस पाए और परिवार में प्रफुल्लता का झरना प्रवाहित होता रहे।
यह भी जरूरी है कि थोड़ा शोध करके अच्छी और सार्थक फिल्में देखी जाएं। एक अच्छी फिल्म हमको बस कुछ घंटे का मनोरंजन ही नहीं देती, वह कई शक्लों में हमारे साथ जीवन भर रहती हैं। हमारी सोच, हमारे हौसले, शब्दों को नई उड़ान देती हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि कुछ नायाब फिल्में देख सकें, जो हमें नया नजरिया और सही दिशा दे… एक सच्चे हितचिंतक की तरह जीवन को इंद्रधनुषी रंगों से भर दे।

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