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चैत की हवा

बिहार की शराबबंदी का असर आसपास के राज्यों पर कैसा और कितना होगा! अगर हंड़िया बंद करने की बात आई तो संभव है आदिवासियों की ओर से विरोध हो।

Author नई दिल्ली | April 21, 2016 2:11 AM
शराब।

फिलहाल ऋतु परिवर्तन का वक्त है। चढ़ती गरमी, चैत का माह। मैं किसी वजह से दो दिन पहले झारखंड के खूंटी जिले के एक गांव में जा रही थी। दोपहर तपने लगी थी। कोलतार की चिकनी सड़क पर चलते हुए इधर-उधर देख रही थी। अभी पलाश खिले ही थे और अमलतास शोभायमान हो रहे थे, सड़क किनारे। अचानक मेरी नजर गई एक बड़े से आम के बागीचे में। दूर से लगा कुछ औरतें पेड़ की छांव में बैठी है। मैंने उत्सुकतावश गाड़ी रुकवाई और उनके पास जाने लगी। पास पहुंची तो देखा चार औरतें बैठी हैं और उनके सामने अल्युमीनियम के दो बड़े-बड़े देगची हैं, जिन्हें उन्होंने ढक रखा था। उसके ऊपर मध्यम आकार का कटोरा है। जब मैंने कैमरा उनकी तरफ किया तो उनमें से एक महिला उठ कर भागने लगी, बाकियों ने आंचल से मुंह छिपा लिया।

मैंने कहा कि ‘क्यों भागती हो… कुछ गलत कर रही हो क्या! कुछ नहीं करूंगी मैं।’ ड्राइवर ने भी स्थानीय बोली में समझाया कि ये सरकारी लोग नहीं हैं, डरने की बात नहीं है। इस आश्वासन पर वह निश्चिंत हुई और बातें करने लगीं। उसकी बड़ी-सी देगची में ‘हंड़िया’ (चावल से बनने वाला पेय पदार्थ, जिससे नशा होता है) भरा हुआ था जो वे आने-जाने वाले राहगीरों को पचास पैसे कटोरी के भाव से बेचती थीं। साथ ही कुछ चना-चबेना भी था, जैसे लोग शराब के साथ चखना लेते हैं। अमीर भुने काजू और मूंगफली खाते हैं, गरीब भिगोया या अंकुराया चना। पता चला कि यही उसके परिवार की आय का मुख्य और अकेला स्रोत है। ‘तुम्हारा पति क्या करता है’ पूछे जाने पर एक हाथ माथे पर मारते हुए दूसरे हाथ से देगची की तरफ इशारा किया उसने।

पल भर लंबी इस शब्दहीन भाषा ने समझा दिया हमें कि वह हंड़िया के नशे के सिवा कुछ नहीं करता। इसी बीच पोपले मुंह वाला एक वृद्ध अपनी लाठी से झुकी कमर और लड़खड़ाती चाल को सहारा देता हुआ वहां आया। वह उस महिला का ‘आजा’ यानी दादा था। महिला ने उससे खुसर-फुसर कुछ कहा। अब वृद्ध हमारी ओर देख कर मुस्कराते हुए महिला से बोला- ‘अरे ये झारखंड है, बिहार नहीं। यहां शराब बंदी नहीं हुई है। और वैसे भी यह शराब नहीं, चावल का पानी है।’ वृद्ध ने आखिरी वाक्य जोर से बोला, शायद मुझे सुनाते हुए।

समझ आ गया कि बुढ़ापे में अपने घरों से दुरदुराए इस देश के ‘सीनियर सिटीजंस’ में से एक है यह बुजुर्ग, जो अपने वक्त को काटने या फिर दो बोली बात करने के लिए और कभी जेब में रुपया-आठ आना हो तो हंड़िया का स्वाद लेने की गरज से यहां आ जाता है। मगर उसकी मौजूदगी से वह महिला अब आश्वस्त दिख रही थी। इन दोनों को देख कर बचपन में पढ़ी फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मलका टूरिया का बेटा’ बेतरह याद आने लगी। वक्त के इस लम्हे में डूब जाने का मन किया, मगर काफी देर से ऊंघ कर ऊबे हुए मेरे पिता ने गाड़ी से अपना झल्लाया हुआ चेहरा निकाल कर बुलाना शुरू किया तो उठ कर वापस आना पड़ा।

आपको ऐसे दृश्य झारखंड में थोड़ी-थोड़ी दूर पर मिलेंगे। जहां सुस्ताने की थोड़ी जगह मिल सकती है, वहां कोई न कोई आदिवासी स्त्री हंड़िया लेकर बैठी रहती है। यह उनके लिए गुजारे का जरिया है और व्यवहार भी। आदिवासी समाज इसे शराब नहीं मानता। उनकी निगाहों में हंड़िया दवा है, क्योंकि यह चावल से बनता है और इसे पीने से भोजन सुपाच्य हो जाता है। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और बिहार के बाहर के लोगों से पूछा जाए तो वे शायद बता नहीं पाएं, मगर इन राज्यों के लोग हंड़िया के नाम से खूब परिचित हैं। पर्व-त्योहार और शादी-ब्याह में हड़िया रहना जरूरी होता है।

अब किसी बाहरी को देख कर छिपना-छिपाना शुरू हो गया है। एक तो पुलिस हंड़िया बेचने वालों को भगाती है, उसका डर। दूसरा अभी बिहार में टटका लगा शराबबंदी का फरमान। अंकुश अलग बात और पूरे तौर पर बंद होना अलग बात। बिहार देश का चौथा शराब रहित राज्य बन गया है। झारखंड तो बिहार का ही हिस्सा रहा है पंद्रह वर्ष पहले तक। मैंने देखा है गांव में बहुत से घरों में हंड़िया बनते और इसके सेवन के बाद लोगों को लुढ़के हुए भी। इसमें औरत-मर्द का भेद नहीं।

सवाल यह है कि बिहार की शराबबंदी का असर आसपास के राज्यों पर कैसा और कितना होगा! अगर हंड़िया बंद करने की बात आई तो संभव है आदिवासियों की ओर से विरोध हो। मगर नशा किसी भी चीज का हो, उस पर लगाम लगाना जरूरी है। यह खासतौर पर गरीब तबकों के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदेह साबित हुआ है। गांव-गांव में नशे की लत छूटेगी तभी विकास होगा।

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