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दुनिया मेरे आगेः क्रूरता की कड़ियां

एक दिन अचानक सबका प्यारा ‘नीलू’ लंगड़ाता हुआ दिखा। वह ठीक से कुछ कदम भी नहीं चल पा रहा था।

मोर।

एक दिन अचानक सबका प्यारा ‘नीलू’ लंगड़ाता हुआ दिखा। वह ठीक से कुछ कदम भी नहीं चल पा रहा था। इतना चौकन्ना और खूबसूरत मोर जब हमारे हाथ से रोटी के टुकड़े खाता था तो मन आनंद से भर उठता था। उसकी यह दशा देख सभी परेशान हो उठे। गौर से देखा तो पाया कि उसकी दाहिनी टांग में एक चीनी मांझे वाला धागा बुरी तरह फंस कर उलझ गया है। मोर चाहे कितना भी करीब रहता हो, रोज आपके इर्द-गिर्द घूमता हो, वह अपनी सजगता कभी नहीं छोड़ता। इंसान के प्रति अविश्वास और भय उसके डीएनए में है। कइयों ने कोशिश की कि किसी तरह उसे पकड़ा जा सके और उसका मांझा पैर से छुड़ाया जा सके। डॉक्टरों ने कहा कि आप बस पकड़ लें, बाकी हम उसका इलाज कर लेंगे। मगर समस्या उसे पकड़ने की ही थी। डॉक्टरों का यह भी कहना था कि मोर राष्ट्रीय पक्षी है और उसके इलाज के प्रयास के दौरान उसे कुछ हो गया तो उनकी नौकरी चली जाएगी, सजा होगी अलग से। उसकी तकलीफ बढ़ती जा रही थी और वह अब लोगों से दूर रहने लगा था। उसके वीडियो को फेसबुक पर भी पोस्ट किया। पर कोई मदद नहीं मिल पाई। आखिरकार एक दिन उसकी टांग का जो हिस्सा मांझे से नीचे था, वह कट कर अलग हो गया! संक्रमण फैल चुका था। धीरे-धीरे नीलू का दिखना कम हो गया। शायद किसी सुनसान, अकेली जगह जाकर उसने चुपचाप अपनी देह त्याग दी होगी।

यह घटना वाराणसी के राजघाट स्थित कृष्णमूर्ति फाउंडेशन इंडिया के परिसर की है। प्रकृति के प्रति जे कृष्णमूर्ति की संवेदनशीलता का अंदाजा उनकी ‘कमेंटरीज आॅन लिविंग’, ‘कृष्णमूर्तिज नोटबुक’ जैसी किताबों और कई वार्ताओं से लगाया जा सकता है। ‘जो हिरन को मारता है, वह वास्तव में अपने पड़ोसी की हत्या करता है,’ ऐसा कहने वाले दार्शनिक ने साठ वर्षों तक दुनिया के लगभग सभी देशों में जाकर अपनी बात कही।
बहरहाल, नीलू चीनी मांझे वाले धागे के जाल में उलझ कर मारा गया, लेकिन गोवा में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने मोरों को मारने का आदेश दिया है। महाराष्ट्र के चंद्रपुर में सरकारी आदेश के तहत जंगली सुअरों को मारा जा रहा है। बंगाल में हाथियों को मारने का आदेश है और हिमाचल में एक बंदर मारने पर तीन सौ रुपए देने का प्रस्ताव सरकार ने रखा है। इन आदेशों की वजह यही बताई जा रही है कि इनसे इंसानों, किसानों के जान-माल या फसल को खतरा है। सरकारी नीतियों की वजह से जब किसानों की जान जाती है तो उसकी सीधी जिम्मेदारी कौन लेता है? केरल में कुत्तों के झुंड ने एक बुजुर्ग महिला की जान ले ली और इसलिए वहां की सरकार ने ‘खूंखार’ कुत्तों को मारने का आदेश दे दिया है। कुत्ते ‘खूंखार’ हैं या नहीं, इसका फैसला कैसे होगा? क्या उनका बंध्याकरण नहीं किया जा सकता? क्या रेबीज से पीड़ित कुत्तों को अलग करने की व्यवस्था करना सरकार की जिम्मेदारी नहीं? सड़क पर जगह-जगह घूमने वाले आवारा पशुओं की दुर्दशा की जिम्मेदारी किसकी है?

क्या उन्हें मार डालना ही एक रास्ता है? केरल को पर्यटकों के स्वर्ग की तरह विज्ञापित किया जाता है। विशेष कर पश्चिमी देशों में लोगों का कुत्तों के प्रति बहुत ही भावनात्मक रवैया है। कल्पना कीजिए कि इन पश्चिमी पर्यटकों को सड़क पर कोई कुत्तों को पीट-पीट कर मारता हुआ दिखाई दे जाए तो वे क्या सोचेंगे पर्यटकों के इस ‘स्वर्ग’ के बारे में! उत्तरी कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने हाल ही में आदेश दिया है कि लोग कुत्तों को पीट-पीट कर मारें और फिर उनका मांस खा जाएं। क्या इसकी अपेक्षा की जा सकती है कि गांधी और बुद्ध का देश होने की बात बार-बार दोहराने वाले हम लोग पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता बरतेंगें?

जमीन पर क्रूर सरकारी आदेश और आसमान में उड़ते हथियार-सा मांझा छोटे-बड़े कई परिंदों, जानवरों की जानें ले चुका है। उत्तर प्रदेश सहित तीन राज्यों में मांझे पर प्रतिबंध लगा है, पर कौन-सा प्रतिबंध आज तक पूरी तरह कारगर रहा है! प्रतिबंध तोड़ना तो हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। हम रूढ़ियों-मान्यताओं को पूजने और नियम-कानून को तोड़ने में पारंगत हैं। अगस्त में दिल्ली में दो बच्चों की मौत मांझे की वजह से हुई। पिछले माह इलाहाबाद में स्कूल जाते वक्त एक बच्चे की मौत गले में इसी मांझे के फंसने से हो गई। मुरादाबाद में एक पुलिसकर्मी का कान मोटरसाइकिल से जाते वक्त मांझा में फंस कर कट गया। न जाने अभी कितने पशु-पक्षी और इंसान इस मांझे की वजह से कटी पतंग की तरह गिरते रहेंगे।
देश की सरकार गाय के प्रति अतिरिक्त संवेदनशीलता बरतती दिखाई देती है। लेकिन इसका कोई वैज्ञानिक आधार है क्या कि क्रूरता और हिंसा का असर दूसरे जीव-जंतुओं पर कम होता है, उन्हें होने वाली पीड़ा की मात्रा कम होती है? उम्मीद है कि जीव जंतुओं के विरुद्ध क्रूर आदेश पारित करने वाले शासक जल्दी ही जीवधारियों की पीड़ा समझेंगे।

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