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दुनिया मेरे आगेः कहां गए वे आंसू

अब वह दिन दूर नहीं जब विलुप्त हो रहे आंसुओं पर इश्तिहार छपवाना पड़ेगा। इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया में बचाए रखने के लिए मुहिम चलानी पड़ेगी।

अब वह दिन दूर नहीं जब विलुप्त हो रहे आंसुओं पर इश्तिहार छपवाना पड़ेगा।

सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा सभ्यताओं की तरह अब आंसू भी इतिहास के पन्नों में विलुप्त होने की कगार पर खड़े हैं। ज्यों-ज्यों मानवता का सेंसेक्स लुढ़क कर अमानवीयता का ग्राफ आसमान को छू रहा है, त्यों-त्यों एक सच्चे अदद आंसू की बूंद की अपेक्षा करना भी बेईमानी लगने लगा है। यों आंसू निकलते कहां से हैं? डॉक्टरों की मानें तो आंखों से और साहित्यकारों की मानें तो दिल से! आंखें बात करती हैं, हंसती हैं, बरसती हैं, तरसती हैं, झिझकती-शरमाती और इतराती हैं। आंखें मुस्कुराती हैं और प्रसन्न होती हैं। यह मनुष्य की भावनाओं का दर्पण है। हृदय की नमी, अभिमान, क्षमा, पश्चाताप, आक्रोश, प्रसन्नता- ऐसे सभी संदर्भों में आंसू अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

यह उपस्थिति मानवता, सौहार्द, सहयोग, प्रेम, त्याग, अनुशासन का प्रतीक है। अफसोस की बात है कि ये अब लुप्त होते जा रहे हैं। महामारी और उससे होने वाली मौतों के दौर में हृदय पत्थर होता गया है। प्रवासी मजदूरों की पैदल यात्रा हो या फिर गरीबी, भुखमरी, बदहाली, लाचारी, अब किसी भी दशा में आंसू आने कम हो रहे हैं। अब आंसू भी बदल चुके हैं। दूसरी ओर, कभी-कभी किसी को देख कर लगता है कि आंसुओं के जानदार अभिनय को नोबेल पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिए। अब लोग बनावटी, घड़ियाली, दिखाऊ, बिकाऊ, तत्कालीन और अस्थायी आंसू बहाने के अभ्यस्त हो गए हैं। शायद इन्हीं आंसुओं के चलते कई बार टूटते-बिखरते रिश्ते संभल जाते थे। अब न वैसे आंसू हैं, न वैसे लोग।

आंसुओं का न कोई धर्म होता है, न कोई जाति। न ये अमीर होते हैं, न गरीब। न तो इन्हें भाषा, प्रांत के भेदों में बांधा जा सकता है और न शब्दों की कालकोठरी में। ये विशुद्ध आंसू होते हैं। लेकिन देश में महिलाओं के खिलाफ त्रासद अपराधों के समय पता नहीं कुछ लोग कैसे इतने बेरहम हो जाते हैं। इसके बरक्स कुछ लोग रोते हैं तो बहुत सारे लोग उदासीन हो जाते हैं। अगर देश की आंखों में सच्चे आंसू होते तो वे आए दिन हो रहे बलात्कार पीड़िताओं को उसके धर्म, जाति, प्रांत के लिहाज से नहीं देखते।

अब तो आंखें सूखती जा रही हैं। मानो भावनाओं का अकाल पड़ा है। सत्ता पक्ष हो या फिर विपक्ष, सब अपनी-अपनी सियासी रोटियां सेंकने पर तुली हैं। किसी के पास पश्चाताप के आंसू नहीं हैं। अगर होते तो कड़े से कड़े संवैधानिक नियम बना कर खुशी के आंसू बरसाते। अगर होते तो महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाओं के सुनने मात्र से आक्रोश के आंसू उमड़ पड़ते। अब आंसुओं पर राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक पहरेदारी है। आंसुओं को जकड़ा जा रहा है, उनमें भेद किया जा रहा है। अगर कोई सच्चे हृदय से रो पड़ता है तो उसके आंसुओं को देख कर कुछ लोग उस पर तंज कसना आरंभ कर देते हैं। रोने वाले पर आरोप-प्रत्यारोप लगा कर लगा कर उसे चुप कराने का प्रयास करते हैं। अब तो आंसुओं पर भी राजनीति होने लगी है। कोई इसे बिकाऊ तो कोई इसे दल-बदलु कहता है। कोई इसे नौटंकी तो कोई तमाशा कहता है।

हर आंसू की अपनी एक भाषा होती और एक कहानी होती है। उसकी अपनी पीड़ा होती है। जब बोल मौन होने लगे, वाक् स्वतंत्रता कुंठित होने लगे, आंखों के सामने ही अनाचार होने लगे, तब आंसू आकर सहारा देते हैं। अब इन सहारों पर भी पुलिस का पहरा है। अब हम खुद से नहीं रो सकते। मानो इसके लिए भी अनुमति की आवश्यकता पड़ती है। अतीत, वर्तमान में की गई गलतियों के लिए अब प्रायश्चित के आंसू नदारद होते जा रहे हैं। शायद ऐसे ही संदर्भों के लिए रुदाली समूह हुआ करते थे। अब ये भी कालांतर में विलुप्त हो गए हैं।

अब वह दिन दूर नहीं जब विलुप्त हो रहे आंसुओं पर इश्तिहार छपवाना पड़ेगा। इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया में बचाए रखने के लिए मुहिम चलानी पड़ेगी। ऐसा न हो कि वह दिन भी देखना पड़े जब पुस्तकों में लिखा होगा कि बहुत पहले की बात है कि कभी आंसू हुआ करता था। वह लोगों की सच्ची भावनाओं को व्यक्त करता था। लोगों के अनकहे बोलों को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम हुआ करता था। अब ज्यों-ज्यों मानवता मरती गई वैसे-वैसे आंसू भी लुप्त होते गए। जब तक वे थे, तब तक लोगों में लाज-शर्म दिख जाती थी। अब न वह आंसू हैं और न ही उनकी कहानियां।

अब लोग भावुक नहीं होशियार बनते जा रहे हैं। मानवता नहीं दानवता का गुणगान करते जा रहे हैं। जो बहुत होशियार हैं, वे दिखाऊ आंसुओं को तलवे में रखते हैं। कुछ लोग अबोध उम्र की लड़कियों से बलात्कार होने या जालसाजी और बैंक के घोटाले होने, लोगों के बेरोजगार होने, भूख के नाम पर एक-दूसरे को काट खाने के लिए उतावले होने वाले लोगों को देख कर कभी-कभार घडियाली आंसू बहा देते हैं। ऐसे लोगों की चाहे जितनी तलाशी ले लीजिए, लेकिन आपको आंसू नहीं मिलेंगे। अब सच्चाई यही है कि आंसू विलुप्त होते जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि बहुत जल्द इन्हें इतिहास के पन्नों में स्थान दिया जाएगा। वहां किया जाएगा आंसुओं का पोस्टमार्टम और बताया जाएगा कि किस तरह गिरगिटिया दुनिया में मानवता की कोख से जन्मे आंसू लुप्त हो गए!

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