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भरमत भांति अनेक

हम सच को जानते हुए भी अगर अंधविश्वासी बन जाएं तो वह खतरनाक है।

शकुंतला देवी

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एक कहावत है- पीलिया के रोगी को हर चीज पीली दिखती है। यह क्या व्यावहारिक रूप से सच है या महज कहावत है? इस पर मैंने एक पीलिया के रोगी से बात की तो बोला, बहनजी! ऐसा नहीं है। हमारे मन में जब यह कहावत घूमती रहती है, तब ऐसा होता है, वरना पीलिया में शरीर के अंग पीले होते हैं, नजरिए में पीलापन थोड़े आ जाता है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि विश्वास और अंधविश्वास में ज्यादा फर्क नहीं है। हम सच को जानते हुए भी अगर अंधविश्वासी बन जाएं तो वह खतरनाक है।

समझ-बूझ कर, पूरे होशोहवाश में किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना या कार्य पर यकीन करना विश्वास कहा जाता है। इसके उलट अंधविश्वास। गुरु महराज का प्रवचन सुन कर दो महिलाएं कटरा से लौट रही थीं। मेरी आदत है, जब दो महिलाओं में कोई बहस या झगड़ा होते देखती हूं तो उनकी बातें सुनने लगती हूं। मैं उनके पीछे-पीछे चल रही थी। उन दोनों में बात ही बात में बहस होते-होते झगड़ा होने लगा। झगड़ा इतना बढ़ गया कि अगर लोग बीच-बचाव न करते तो मारपीट होनी तय थी। इसमें एक महिला गांव की लग रही थी, दूसरी कस्बे या शहर की। वेशभूषा में कोई खास अंतर नहीं था। मैं सोचने लगी, ये दोनों सहेलियां हैं या पड़ोसन!

जब दोनों बहस करते-करते थक गर्इं तो मैंने पूछा- आप दोनों ने जिस विषय पर बहस की, वह विषय तो ठीक है, लेकिन बहस करते-करते झगड़ा करना ठीक बात नहीं है। उसमें से एक क्षेत्रीय बोली बघेली बोल रही थी। मैं समझ गई, कम पढ़ी-लिखी होने के कारण यह क्षेत्रीय बोली बोल रही है। अंधविश्वास का समर्थन वही कर रही होगी। मगर जब दोनों से बातचीत करते-करते घुल-मिल गई, तो पता चला कि मेरा अनुमान गलत था। अंधविश्वास को विश्वास की तरह मानने वाली महिला डिग्रीधारी थी। वह मूर्तिपूजा के समर्थन में बोलते-बोलते आपा खो बैठी थी।

उसका कहना था कि मूर्तिपूजा हमारी आस्था और भक्ति का सवाल है, इस पर तर्क नहीं किया जा सकता। जो लोग इसका विरोध करते हैं, वे नास्तिक हैं। ऐसे लोग धर्म के विरोधी हैं। मगर बघेली बोलने वाली महिला का कहना था कि तर्क और विज्ञान के आधार पर ही किसी विषय या बात पर विश्वास करना चाहिए। आस्था और भक्ति भी पूरे होशोहवाश और समझ-बूझ के साथ करनी चाहिए। आंख मूंद कर किसी भी व्यक्ति, घटना, उपदेश या कार्य पर विश्वास नहीं करना चाहिए। पूछने पर पता चला कि वह गुरुकुल की पढ़ी-लिखी है। उसने वेद-शास्त्र की भी पढ़ाई की हुई है।

मैंने पूछा, ‘अगर वेद-शास्त्र पढ़ा है, तो गुरु महराज का प्रवचन सुनने क्यों गई थी?’ वह बोली, ‘यह हमारी बचपन की सहेली है। इसने अपने गुरु महराज की तारीफ की और प्रवचन सुनने का बार-बार आग्रह किया, तो भला कैसे टाल देती।’ मगर बहस करना तो ठीक है, झगड़ा करना किस प्रवचनकर्ता ने बताया है? ‘मैडम! यह मुझे नास्तिक और झूठी कहने लगी, तब मुझे गुस्सा आया।

आप ही बताइए, क्या प्रवचनकर्ता जो कहें वह सही, वेद शास्त्र में जो लिखा है वह गलत! मूर्तिपूजा किस वेद-शास्त्र में धर्म और अध्यात्म का हिस्सा बताया गया है? इस सवाल का यह जवाब दे दे तो मैं अपनी गलती स्वीकार कर इससे माफी भी माग लूंगी।’ उस महिला की बात में दम लगा। मैंने उसकी सहेली से पूछा, ‘तुम दोनों सहेली हो। बचपन से एक साथ पढ़ी-लिखी और पड़ोस में रहती भी हो। जिस विषय पर विचार विरोधाभाषी हैं, उन विचारों, मान्यताओं और धारणाओं में बगैर आग्रह-दुराग्रह के बात की है? नहीं की। अगर तुम्हारे आग्रह पर तुम्हारी सहेली प्रवचन सुनने चली आई, तो तुम भी उसके कहने पर वेद-शास्त्र पढ़ लेती… फिर मूर्तिपूजा पर बहस करती तो किसी सार्थक परिणाम पर पहुंचती।’

मैडम, यह बताओ… गुरु महराज क्या झूठ बोलते हैं? वे एक नहीं, हजार बार अपने प्रवचन के दौरान कह चुके हैं कि धर्म और अध्यात्म के मामले में कभी तर्क नहीं करना चाहिए।’ ‘मतलब, तुम वेद-शास्त्र, गुरुकुल में पढ़ी अपनी सहेली को बेवकूफ और अधर्मिणी समझती हो और गुरु महराज की हर बात को वेद वाक्य? यह बताओ, तुमने कैसे समझ लिया की गुरु महराज जो कह रहे हैं वे सभी बातें सही हैं और तुम्हारी सहेली, जो वेद-शास्त्र पढ़ी है, उसकी बातें झूठी और बेकार हैं?’ ‘यह अपनी आस्था की बात है।

मैं गुरु महराज पर आस्था रखती हूं, वे जो कहेंगे धर्म वाली ही बात कहेंगे… भला उनकी तुलना गुरुकुल में पढ़ी अपनी गरीब घर की सहेली से कैसे कर सकती हूं? इतने बड़े आश्रम के मालिक हैं गुरु महराज। वे तो साक्षात भगवान रूप ही हैं।’ मैं उस महिला की बात सुन कर दंग रह गई कि गरीब होने का मतलब झूठा और बेवकूफ होना भी लोग समझते हैं। फिर विश्वास और अंधविश्वास जैसे संवेदनशील विषय पर कैसे कोई निर्णय ले सकता है।

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