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दुनिया मेरे आगेः मौसम की तरह बदलना

थोड़ी देर भी धूप में बैठने पर शीतल छांव की चाहत जाग उठती है, लेकिन छाया का स्निग्ध शीतल स्पर्श मिलने लगे तो धूप की गरमाहट याद आती है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

थोड़ी देर भी धूप में बैठने पर शीतल छांव की चाहत जाग उठती है, लेकिन छाया का स्निग्ध शीतल स्पर्श मिलने लगे तो धूप की गरमाहट याद आती है। मंद बयार चलती है तो सिहरन पैदा करती है, थम जाए तो ऊबाने वाली खामोशी छा जाती है। कितने अजीब से दिन हैं आजकल। बड़े-बूढ़े सावधान करते हैं- सर्दी बीत जाने के धोखे में मत रहना। लापरवाही की तो ठंड लग जाएगी। और बच्चे हैं कि शरीर पर स्वेटर-कोट का बोझ उन्हें काटने दौड़ता है। उन्हें देख कर अपना बचपन याद आता है।

फगुनाहट वाले ये दिन आते थे तो स्कूल का ड्रेस पहना कर घर से विदा करते समय मां सावधान करती थी कि हर साल इन्हीं दिनों स्कूल में कोट या स्वेटर उतार कर छोड़ आते हो। ध्यान रखना, इस बार फिर खेल-कूद के चक्कर में कोट वहीं मत छोड़ आना। लेकिन स्कूल में ऊधम और धमाचौकड़ी के बीच मां से पूरी निष्ठा से किया हुआ वादा भूल जाता था। स्कूल की छुट्टी होते-होते याद आती थी गुमे हुए कोट या स्वेटर की। फिर कक्षा का कोना-कोना, खेल के मैदान का पूरा विस्तार छान मारा जाता था। भाग्य ने साथ दिया तो कहीं धूल में सना बिसूरता हुआ कोट मिल जाता, निष्ठुर हुआ तो मां से ढेर सारी उलाहना मिलती और पिताजी कान खींचने का उपक्रम करते। बदलते मौसम के शेष दिन उसके बिना कट जाएंगे या स्कूल ड्रेस का अपरिहार्य हिस्सा माना जाने वाला कोट या स्वेटर खरीदना आवश्यक होगा। मां-पिताजी की चिंताकुल बहस सुन कर बेचारा मन अपराध-बोध से उदास भी होता और नया कोट मिलने की संभावना से पुलकित भी।

फिर कुछ ही दिनों के बाद किसी रविवार को मां और बड़ी बहन एक सालाना अनुष्ठान करतीं पर दोनों की कोशिश रहती कि मुझे इस अनुष्ठान से अलग रखें, क्योंकि अक्सर मेरी मदद उनका काम घटाती कम, बढ़ाती ज्यादा थी। फिर भी मैं उनकी इच्छा के विरुद्ध अपनी मदद लेकर पिल पड़ता था। ये सालाना अनुष्ठान होता था गरम कपड़ों, कंबल, रजाइयों को दिन भर धूप दिखाने का और सांझ उतरने से पहले उन्हें अलग-अलग दो बड़े संदूकों में भर कर रख देने का। इसमें नीम की पत्तियों की जरूरत भी पड़ती थी। घर के निकट एक बड़ा-सा नीम का पेड़ था, जिस पर चढ़ कर पत्तियां और टहनियां तोड़ने से बढ़ कर मजेदार काम और कुछ हो नहीं सकता था। लेकिन अफसोस, मेरे मध्यवर्गीय अभिभावक यह काम घर में चौका-बासन करने वाली सहायिका के बेटे को सौंपना पसंद करते थे।

फिर भी उसकी तोड़ी नीम की पत्तियां और टहनियां घर में आते ही मेरे अधिकार क्षेत्र में आ जाती थीं। मान न मान मैं तेरा मेहमान का नमूना बन कर मैं मां और बहन की सहायता करने में जुट जाता था। उनकी कोशिश रहती कि मेरी सहायता के बावजूद वे किसी तरह नीम की पत्तियों को आंगन में सुखा कर उन बड़े संदूकों में नीचे तह लगा कर रख लें। फिर उन पर गरम कपड़े रखे जाते और बीच-बीच में नेप्थलीन की गोलियां डाल दी जातीं। गरम कपड़ों वाले ये संदूक सर्दियों में खाली तो रहते थे, पर बेकार नहीं। हम बच्चों के छुपम-छुपाई के खेल में वे बहुत काम आते थे।

हमारे लिए बेहद आश्चर्य और खुशी का अवसर होता जब इतने जतन से संभाल कर रखे हुए गरम कपड़ों को अगली सर्दियों में निकाला जाता। इसलिए कि अक्सर कभी कोट की जेब से तो कभी पतलून की पॉकेट में अठन्नी या रुपए का सिक्का निकल आता था। मैं और बहन दोनों इस अद्भुत खोज को अपनी लापरवाही का सबूत मान कर ईश्वरीय उपहार की तरह ग्रहण करते थे। मां हमारे गर्म कपड़ों की जेबों से निकलते उन सिक्कों के लिए कभी किसी परी का जिक्र या कोई और खुलासा नहीं करती थीं।

हमें उन सिक्कों को पाकर चीख कर किलकारी मारते देखतीं तो बस मुस्करा देती थीं। बड़ा होकर अब कहीं रहस्यमयी मुस्कान शब्द सुनता हूं तो उनकी वही मुस्कान स्मृति की घटाओं में कौंध जाती है।
आज के दड़बेनुमा घरों में गरम कपड़ों को रखने वाले उन विशालकाय संदूकों को रखने की न जगह है, न वजह। गरम कपड़े हों या ठंडे, हर साल बदलते फैशन के चलते पुराने कपड़े कोई क्या संजो कर रखे। पर कपड़ों की क्या बिसात, अब तो इंसानी रिश्ते भी मौसम की तरह बदलते रहते हैं, कभी गर्म कभी सर्द। जहां घनिष्ठता की उष्णता मिलती थी, वहीं अचानक बेरुखी की बर्फीली हवाओं के तीर चलने लगते हैं। शायद ऐसे ही बदलते मौसमों की ठोकर से घायल होकर बेगम अख्तर ने अपनी दर्द भरी आवाज में गजल के इन शब्दों को अमर कर दिया होगा- ‘हमने देखा है जमाने का बदलना लेकिन, उनके बदले हुए तेवर नहीं देखे जाते।’

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