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दुनिया मेरे आगे: संकट में सरलता

सरल नहीं है सरलता से रहना, क्योंकि सरलता में जो कठिनाई है, वह कठिनाई में नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता तो सारा जहां घरों में शांति से रहता पूर्णबंदी में।

Author Published on: May 21, 2020 3:56 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 मार्च की रात 12 बजे से देश भर में लॉकडाउन का ऐलान किया था।

संगीता कुमारी
हम मनुष्यों की आदत है भाग-दौड़ करने की, हमेशा संघर्ष से भरा जीवन जीने की। लेकिन कुछ विपदाएं अचानक ही आ जाती हैं। आहट के बिना हमें खौफ में डाल जाती हैं। कोरोनाविषाणु पूरे विश्व में अपना प्रकोप फैला रहा है। मानव जाति की आजादी में खलल डाल रहा है। हम भारतीयों का यह आम स्वभाव है कि बहुत सकारात्मक होने के कारण हम हर संकट को झेल लेते हैं। पिछले दो माह से जीवन सरलता की चरम सीमा पार कर रहा है। ऐसा लगता है जो बहुत आगे जा रहा था, अब पीछे छूट रहा है।

सरल नहीं है सरलता से रहना, क्योंकि सरलता में जो कठिनाई है, वह कठिनाई में नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता तो सारा जहां घरों में शांति से रहता पूर्णबंदी में। हाल के दिनों में लंबी बंदी के कारण परिवार संग घर पर रहने का अवसर मिला। मगर उस अवसर में भी कुछ लोगों को गिला है। सही है कि कुछ लोगों की बहुत मजबूरी होती है, जिस कारण उन्हें न चाहते हुए भी घरों से बाहर डरते-डरते निकलना पड़ता है। मगर उन लोगों का क्या किया जाए जो बेवजह सिर्फ घूमने के लिए निकल पड़ते हैं और पुलिस या प्रशासन के लिए मुसीबत बनते हैं।

कभी सोचा भी न था कि ऐसा समय भी आएगा जब बुद्धिमान मनुष्य अपनी ही करनी का ऐसा फल पाएगा! हमने प्रकृति को अपनी विलासिता के लिए बहुत दोहन किया है। नए-नए प्रयोगों से मानव जीवन को कष्टों में धकेला है। वर्तमान समय में कोरोना ने पूरी दुनिया को उथल-पुथल कर दिया है। आज विकसित देशों तक के हालात बहुत दयनीय नजर आ रहे हैं। धनी जीवन की चाह में धनी लोग भी आज गरीब नजर आ रहे हैं।

वर्तमान समय में गरीब अमीर सब एक समान नजर आ रहे हैं। हालांकि रोजी-रोटी से लाचार कर दिए गए जो लोग सड़कों पर पैदल भटक रहे हैं, उनके दुख की तुलना किसी से नहीं की जा सकती। मेरे लिए तो यह कल्पना से भी परे है कि कोई बेहद मजबूरी में भी डेढ़ हजार किलोमीटर दूर पैदल ही घर की ओर निकल पड़ने की हिम्मत कर लेता है। इस त्रासदी से उपजे दुख का सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है।

इन कड़वी हकीकतों और त्रासद तस्वीरों बावजूद कई बार लगता है कि अगर इन मजबूर लोगों की समस्याओं का हल निकाल लिया जाए तो इससे एक इतर सच यह है कि एक बीमारी से बचाव के बहाने से सही, लोगों को अपने घरों में रह कर अच्छा नागरिक होने का कर्तव्य निभाना चाहिए और परिवार को समय देकर वक्त को खुशियों में बदलना चाहिए। जीवन बार-बार मौका नहीं देती। पति-पत्नी आपसी व्यवहार को समझते हुए आज अपने बच्चों को दिए गए संस्कारों के मूल्यों का आकलन कर सकते हैं। कुछ उम्रदराज लोग बेपरवाही से घूमते हुए नजर आते हैं, तब लगता है कि क्या उन्हें यह जानकारी नहीं मिल सकी है कि मौजूदा समय सबसे ज्यादा बुजुर्गों के लिए ही खतरनाक है?

इस समय दुनिया भर के लोगों को जीने के लिए सिर्फ तीन चीजों की आवश्यकता है- रोटी, कपड़ा और मकान। अभी के दौर में हड़बड़ी में आकर ज्यादातर लोग अपने घर में राशन और दूसरी जरूरत की चीजें घर में भर रहे हैं। हालांकि कभी-कभी कम में भी ज्यादा महसूस होता है, बस उसे महसूस करने का तरीका थोड़ा वैरागी होता है। आज बहुत सारे मकान घर नजर आ रहे हैं, क्योंकि दूर शहरों में पढ़ाई करने गए हुए बच्चे वापस अपने घरों में नजर आ रहे हैं।

अभिवावक अपने बच्चों की चौबीस घंटे निगरानी कर रहे हैं। अगर कुछ छूट गया है तो उसे संचित कर रहे हैं। ज्यादातर महिलाएं गृहकार्य खुद कर रही हैं, क्योंकि घरेलू सहायिकाओं की मदद उन्हें अभी नहीं मिल रही है। लेकिन वे गृहिणियां ज्यादा राहत महसूस कर रही हैं जो अपने घर का काम हमेशा से खुद ही करती आ रही हैं। अभी सड़कों पर कहीं धुआं और भीड़ नहीं दिखाई देती है। प्रदूषण से मुक्त माहौल में आसमान साफ और पेड़ हरे-भरे चमक रहे हैं। ये जीवन के स्रोत हैं।

मौजूदा दौर में कुछ सामान्य अभ्यास धीरे धीरे आदत बन जाएंगे। घरों में महिलाओं को अपनी भूमिका दर्ज करने का मौका मिल रहा है तो पुरुष को भी अपने संयम को जानने का अवसर मिल रहा है। कुछ घरों में पिता अपने पुत्र के आचरण से खुश हैं तो कहीं पिता पुत्र की हरकतें देख दिन-रात कुढ़ रहे हैं। सकारात्मक दृष्टि से देखें तो परिवार को एकजुट होकर आपस में समझने का मौका मिल रहा है, क्योंकि हमारे समाज में पीढ़ियों में आपस में विचारों के आदान-प्रदान का अभाव बढ़ने लगा था। धन की चाहत में भागते हुए बहुत कुछ छूट रहा था। समय की मांग कुछ ऐसी हो गई है कि कुटुंब का एक साथ रहना कुछ दिनों की मजबूरी हो गई है। बेहतर है कि हम इस मजबूरी को सुंदर अवसर का रूप दे दें।

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