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उम्मीदों की परिधि

जीवन उम्मीदों की परिधि के चारों ओर चक्कर लगा रहा है। हमने जो जीया, वह जिदंगी थी, जो अब बची है, वह उम्मीद है। हर कोई उम्मीदों का दामन थामे जीये जा रहा है।

सांकेतिक फोटो।

कुंदन कुमार

जीवन उम्मीदों की परिधि के चारों ओर चक्कर लगा रहा है। हमने जो जीया, वह जिदंगी थी, जो अब बची है, वह उम्मीद है। हर कोई उम्मीदों का दामन थामे जीये जा रहा है। विद्यार्थियों को उम्मीद है कि स्कूल फिर से खुलेंगे, स्कूलों की बगिया उनके चहल-पहल से गुलजार होंगी। उनके चेहरे पर खुशी और सुकून का भाव लौट कर आएगा। स्कूल में मिला गृहकार्य न करने पर शिक्षकों के डांट का दौर भी लौटेगा। भोजनावकाश के समय एक दूसरे से नाश्ता मिल-बांट कर करने के दौर के भी वापस आएंगे। हमें भी विश्वविद्यालय खुलने की उम्मीद है।

पुस्तकालय में पड़ी किताबें और कैंटीन के चाय और समोसे भी हमलोगों को याद कर रहे होंगे। करीब डेढ़ साल से हम अपने दोस्तों से ढंग से मिल भी नहीं पाए हैं। दोबारा मिल कर घास के मैदान पर ओस की ठंडी बूंदों पर बैठ कर सुबह-सबेरे लंबी बातचीत का सिलसिला शुरू होने की उम्मीद दोस्तों को भी है। महामारी के काल में हमसे से कई ने इतना कुछ खो दिया है, जिसकी भरपाई शायद ताउम्र न हो सके। बावजूद इसके जीवन के समान्य होने की उम्मीद हम सबको है। न सुख अंतिम सच है और न ही दुख स्थायी। एक दिन बुरे दिन के भी दिन लदेंगे। इसलिए बुरे वक्त के गुजरने की उम्मीद लाजिमी है।

दुनिया की रफ्तार थम गई है। व्यापार, वाणिज्य, शिक्षा, यात्रा- सब कुछ चौपट हो चुका है। व्यापारियों की दुकानें, विद्यार्थियों की किताबें और यात्रियों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ढोने वाले वाहनों को भी उम्मीद है कि जन जीवन एक दिन सामान्य होगा। महामारी ने लोगों के जीवन पर रोक तो लगाया ही है, साथ ही सड़क के मुसाफिरों को भी घर के चारदिवारी में कैद करके रख दिया। आजकल सड़कें सुनसान रहती हैं। लोगों की आवाजाही बहुत कम हो चुकी है। मुसाफिरों के साथ सड़कें भी पहले की तरह बंदिशों के हटने की उम्मीद लगाए बैठी हैं। दरअसल, सड़कें हमेशा गुलजार रहना चाहती हैं, जीना चाहती हैं और सड़कों पर दौड़ने वाली गाड़ियां सड़कों की प्राणवायु हैं।

उम्मीद जीवन की आस और मन का विश्वास है। लगातार लक्ष्य से दूर रह जाना और उसे हासिल न कर पाने के बावजूद लक्ष्य हासिल करने की जिजीविषा, संकल्प की शक्ति और सकारात्मक नजरिया उम्मीदों को सिंचित करता है। उत्साही प्रवृति के लोग उम्मीदों का दामन कभी नहीं छोड़ते। अगर हमने अपने जीवन में उम्मीद का दीपक जला लिया तो घनघोर काली रात में भी हम विचलित नहीं होंगे। महामारी में हमने कई ऐसे लोगों को देखा जिनके बचने की उम्मीद डॉक्टरों को भी नहीं थी। उसके स्वजन एकदम विश्वास हार चुके थे। वैसे लोगों ने बस अपने आत्मविश्वास और जिजीविषा के दम पर बीमारी को परास्त किया।

कभी-कभार हम एकदम हताश हो जाते हैं। लगता है कि अब सब कुछ खत्म हो चुका है। आमतौर पर यह स्थिति तब पैदा होती है, जब हम लगातार असफलताओं से जूझ रहे होते हैं या फिर नाउम्मीदी का सम्राज्य हमारे अंदर अपना घर बना लेता है। जैसे ही हम अपने मन में उम्मीद का दीपक जलाते हैं, वैसे ही चेहरे से हताशा और निराशा का भाव एकदम गायब हो जाता है। हम तरोताजा महसूस करने लगते हैं और चेहरे पर खुशी और सुकून का दीप जगमगाने लगता है और मन में विश्वास जगता है कि एक और प्रयास हमें सफल लोगों की पंक्ति में खड़ा कर सकता है। फिर हम पूरे सामर्थ्य से अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए लक्ष्य संधान में तल्लीन हो जाते हैं।

एक उदाहरण लेते हैं। आइपीएल के एक रोचक मैच में मुकाबला चेन्नई सुपर किंग्स और रायल चैंलेजर्स बंगलुरु के बीच था। चेन्नई की टीम पहले बल्लेबाजी कर रही थी। अच्छी शुरुआत के बावजूद टीम की हालत पस्त हो चुकी थी। दुनिया के दो जाने माने विस्फोटक बल्लेबाज क्रीज पर थे। अंतिम ओवर से पहले रविंद्र जडेजा लगातार बड़े शार्ट्स खेलने की फिराक में थे, लेकिन गेंदबाज गेंद से उन्हें चकमा दे रहे थे।

चेन्नई का हाल बिल्कुल ठीक नहीं दिख रहा था। लेकिन एक छोर पर बल्लेबाजी कर रहे जडेजा को उम्मीद थी कि कोई बड़ा ओवर जरूर मिलेगा। हर्षल पटेल बंगलुरु के ही नहीं, पूरे आइपीएल के सबसे सफल गेंदबाज थे। किसी को उम्मीद नहीं थी कि उनके एक ओवर में पांच छक्के लगा दिए जाएंगे, लेकिन जडेजा को उम्मीद थी। जडेजा अगर सकारात्मक न सोचते, हौसलों और उम्मीदों के साथ बल्लेबाजी न करते तो शायद वे कीर्तिमान स्थापित न कर पाते।

फुटबॉल के मैच में हिम्मत न हारने वाले उत्साही प्रवृत्ति के खिलाड़ी मैच के अंतिम क्षण में गोल कर टीम को मैच जिता देते हैं। ऐसा वे इसलिए कर पाते हैं कि उम्मीदों की शक्ति से वे अंतिम समय तक खुद को तरोताजा रखते हैं। इस दौर में सोशल मीडिया पर लोग उम्मीद के भरोसे ही लोगों से आॅक्सीजन, बिस्तर, दवाई और अन्य चिकित्सकीय उपकरणों से मदद करने की मांग कर रहे थे। इससे जितना संभव हो पाया, उतना लोगों ने अपने सार्मथ्य के हिसाब से किया भी। अगर हमारी सोच सकारात्मक रहे और हम उम्मीद का दामन न छोड़ें तो आखिर विजय भी हमारी ही होगी।

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