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नदी का जीवन

कुछ समय पहले दिल्ली के यमुना पर बने एक पुल से गुजरते हुए जब पानी का रंग लगभग काला-सा दिखा तो लगा कि शायद यह दूर से देखने के चलते पैदा हुआ भ्रम है..

Author नई दिल्ली | Published on: December 26, 2015 12:02 AM
गंगा सफाई योजना को शुरू हुए करीब तीस साल हो गए। इस पर अब तक अरबों रुपए बहाए जा चुके हैं। (फाइल फोटो)

कुछ समय पहले दिल्ली के यमुना पर बने एक पुल से गुजरते हुए जब पानी का रंग लगभग काला-सा दिखा तो लगा कि शायद यह दूर से देखने के चलते पैदा हुआ भ्रम है। लेकिन फिर हाल ही में एक काम से यमुना का पानी करीब से देखने और छूने का भी मौका मिला। इसके बाद मुझे शहर के किसी बस्ती से निकल रहे नाले और यमुना में कोई खास अंतर नहीं लगा। सुना था कि नदियां सभ्यता का जीवन रही हैं और ज्यादातर सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुर्इं। लेकिन जिन सभ्यताओं को नदियों ने जीवन दिया, उस समाज ने नदियों की क्या हालत बना कर रख दिया है, यमुना इसका त्रासद उदाहरण है।

हालांकि इसके अलावा तमाम ऐसी नदियां हैं, जिनकी फिक्र समाज को नहीं है। यहां तक कि जिस गंगा को समाज एक पवित्र नदी मानता है, उसकी दशा यह है कि उसकी फिक्र में समूचा सत्ता-तंत्र लगा हुआ है, हजारों करोड़ रुपए गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए बहा दिए गए हैं, लेकिन दिनोंदिन गंगा की हालत और खराब ही होती जा रही है। लेकिन जब प्रदूषण की वजहों पर लगाम लगाने की बात आती है तो सभी एक-दूसरे की ओर उंगली उठाना अपनी जिम्मेदारी समझते हैं, लेकिन प्रदूषण बढ़ाने में अपनी भूमिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते। सरकार के लिए बस इतना जरूरी लगता है कि वह दबाव बढ़ने पर अरबों रुपए की धनराशि जारी कर देती है और मान लेती है कि प्रदूषित नदियों को स्वच्छ बना लिया गया।

जबकि प्रदूषित होती नदियां जितनी चिंता का विषय है, उससे बड़ी चिंता वे मानव निर्मित कारण हैं जो इसका मूल हैं। वास्तविक निदान ढूंढ़े बिना नदियों के प्रदूषण से शायद ही मुक्ति मिल पाए। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि हाल ही में जब केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने चालीस नदियों की जांच की तो उनमें पैंतीस बुरी तरह प्रदूषित निकलीं, जिनका पानी पीने लायक बिल्कुल नहीं है। इनमें पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण हर जगह की नदियां हैं। पवित्र, जन-आस्था, लोकगाथा और किवदंतियों से जुड़ी गंगा, यमुना, नर्मदा, सोन, कृष्णा, कोसी, चंबल, घाघरा, सतलुज, साबरमती, रामगंगा जैसी अनेक नदियां प्रदूषित हैं। यह जांच का छोटा नमूना है। तमाम नदियों की हालत के बारे में सोच कर सिहरन होने लगती है। इसे अगर नमूना मानें तो साफ कही जा सकने वाली नदियों का प्रतिशत केवल 10 है। नदियों की यह दुर्दशा हमारी चिंता में क्यों शुमार नहीं हो पा रही!

अकेले गंगा की सफाई पिछले तीस साल से जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महीने पहले ही यह तल्ख टिप्पणी की थी कि मौजूदा कार्ययोजनाओं से लगता नहीं कि गंगा अगले दो सौ वर्षों में भी साफ हो पाएगी। जाहिर है, कदम वैसे उठाने की जरूरत है, जिससे गंगा अपनी पुरानी भव्यता को हासिल कर सके। सवाल है कि अदालत की सख्त टिप्पणियों के बावजूद इस लक्ष्य को वर्तमान कार्यकाल में हासिल करना है या अगले कार्यकाल के लिए जिंदा रखना है! सरकार को यह साफ करना चाहिए। ‘नमामि गंगे’ योजना पर सन 2014-15 में करीब सवा तीन सौ लाख रुपए खर्च किए गए, जबकि 2015-16 की पहली तिमाही में कुछ नहीं। अगले पांच सालों के लिए बीस हजार करोड़ रुपए की अग्रिम स्वीकृति है।

यह दशा उस गंगा की है जिसे हमारा समाज ‘मोक्षदायिनी’ मानता है। नर्मदा को भी श्रेष्ठ नदी माना जाता है। पद्म पुराण में लिखा है- ‘पुण्या कनखले गंगा, कुरुक्षेत्रे सरस्वती। ग्रामे वा यदि वारण्ये, पुण्या सर्वत्र नर्मदा!’ यानी गंगा को कनखल तीर्थ में विशेष पुण्यदायी माना जाता है, सरस्वती को कुरुक्षेत्र में, लेकिन नर्मदा चाहे कोई ग्राम हो या फिर जंगल, सभी जगह विशेष पुण्य देने वाली है। ऐसी पवित्र नर्मदा अपने उद्गम अमरकंटक कुंड से ही प्रदूषित होने लगती है। वहीं सोन थोड़ा आगे एक कागज कारखाने का जहर लिए रास्ते के हर गांव, कस्बे, शहर की गंदगी समाए बढ़ती जाती है। जो नदी जहां से भी गुजरी, वहां की गंदगी का आसान और मुफ्त वाहक भी बनती चली गई है। हर कहीं औद्योगिक मलबा, फैक्ट्रियों का कचरा, गंदा सीवर बेहिचक नदियों में छोड़ा जा रहा है। ऐसे में हम नदी से जीवन की उम्मीद कर रहे हैं।

बल्कि भारत में अब इसके लिए तो ‘जल क्रांति’ का समय आ गया लगता है। अब लोगों को स्वत: स्फूर्त तरीके से इस विषय पर सोचना और जागरूक होना होगा। कुछ ठोस और जमीनी स्तर पर होगा तभी सकारात्मक नतीजे निकलेंगे, वरना आयोग, बोर्ड, ट्रिब्यूनल यों ही बनते रहेंगे और नदियों का दुख बना रहेगा। एक ओर बहसें, सुनवाई और फैसले होते रहेंगे, औपचारिकताओं को पूरा किया जाएगा, दूसरी ओर गांव, कस्बे, शहर, महानगर की आबादी की गंदगी का आसान और निशुल्क वाहक बनीं नदियां दिनोंदिन प्रदूषित होंती रहेंगी, सूखेंगी और मरती रहेंगी। हमारे हाथ हाय-तौबा के अलावा कुछ नहीं आएगा।

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