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कुदरत में बसा जीवन

ग्रामीण अंचल में जामुन के बहुतेरे पेड़ दिख जाते हैं।

सुरेश चंद्र रोहरा

काले-काले, बैंगनी जामुन! इनका खयाल आते ही हमारे मुंह में पानी आ जाता है। जैसे ही जामुन बाजार में आते हैं, मैं कभी एक पाव तो कभी आधा किलो जामुन खरीद लाता हूं और बड़े मजे से उनका स्वाद लेता हूं। यह सोच कर कि इसमें कितने औषधीय गुण हैं। इनका सेवन करने से डाइबिटीज यानी मधुमेह और उच्च रक्तचाप पास भी नहीं फटकता। जाने कितने गुणों की खान यह जामुन प्रकृति की अनमोल नियामत है।

मगर इस बार मैंने एक बात गौर की। हमारे छत्तीसगढ़ अंचल में जामुन लगभग दुगनी कीमत में बिक रहा है। पिछले वर्ष बीस रुपए किलो वाला जामुन इस बार चालीस रुपए से ऊपर कीमत पर बिक रहा है। पहली फसल है, मगर चालीस से अस्सी रुपए किलो तक। मैं लेखने संबंधी कार्य से ग्रामीण अंचल में भ्रमण करता रहता हूं। मैंने देखा कि शहर से चालीस-पचास किलोमीटर दूर के क्षेत्र में भी जामुन साठ रुपए किलो बिक रहा है। मैंने सोचा कि यह तो प्रकृति की नेमत है… फिर भी इसकी कीमत इतनी बेलगाम क्यों हुई जा रही है। मैं मन ही मन कोफ्त में दोहराता रहा, मगर सब बेमानी।

ग्रामीण अंचल में जामुन के बहुतेरे पेड़ दिख जाते हैं। जामुन पकते हैं और गिरते हैं। सड़क पूरी जामुनी काली-काली हो जाती है। कई जगहों पर तो जामुन गिरते हैं, ऊपर से गाड़ियां निकल जाती हैं। एग दिन रास्ते से गुजरते हुए देखा कि एक ट्रक सड़क किनारे खड़ा था और ड्राइवर के साथ उसके बंदे ट्रक की छत पर चढ़ कर जामुन तोड़ रहे थे। मैं ने सोचा ये लोग कितने आनंद में हैं. इन्हें बाजार जाकर जामुन खरीदने की जरूरत नहीं। ताजा जामुन सीधे पेड़ से तोड़ रहे हैं।

इस वर्ष आम की फसल भी खासी अच्छी हुई है। पेड़ों पर लटकते दिखते वर्षों बाद आम के छोटे फलों को देख कर मन में उम्मीद जगी है कि इन्हें पकने पर मैं सीधे इन्हें पेड़ पर से तोड़ कर खा सकूंगा। पेड़ के पके आम खूब मीठे और स्वादिष्ट होते हैं। इसी के समांतर मैंने सोचा कि काश मैं जामुन भी सीधे पेड़ से तोड़ कर खा सकूं। मगर ऊंचे और भरे जामुन के पेड़ पर चढ़ना संभव नहीं हो सका। हम शहर के वासी क्या खाकर जामुन के पेड़ पर चढ़ेंगे! मन मसोस कर मुझे साठ और अस्सी रुपए किलो पर जामुन खरीदना पड़ा।

एक दिन बड़ा प्यारा-सा वाकया हुआ। मैं बिलासपुर से लौट रहा था। ग्राम पंतोरा के पास कुछ लड़कियां एक पेड़ के नीचे खड़ी थीं और ऊपर की तरफ देख रही थीं। उनके हाथों में जामुन था। वे खा रही थीं और आपस में बातें भी कर रही थीं। मैंने वहां गाड़ी रोक ली और कैमरे से तस्वीर लेने की कोशिश की। मैं समझ रहा था कि ये लड़कियां सड़क के किनारे लगे इस जामुन के पेड़ से जामुन तोड़ रही हैं। मैं जिज्ञासा के साथ जब उनके निकट पहुंचा, तो देखा कि एक लड़की पेड़ पर चढ़ी हुई थी और जामुन तोड़-तोड़ कर नीचे गिरा रही थी। मैं आनंद विभोर हो उठा। ऐसा दृश्य जिसकी कवि, कथाकार सिर्फ कल्पना ही करता है, मेरी सामने जीवंत था।

मैं मुदित मन से उनकी तरफ बढ़ा। सोचा आज बहुत दिनों बाद मेरी इच्छा पूरी हो सकेगी… पेड़ पर पके और ताजा तोड़े जा रहे जामुन के दो-चार फल खाने को मिल जाएंगे। मैंने हंसकर लड़कियों से कहा- ‘देखो बच्चों! यह पेड़ हमारा है, सब अपने हाथों में रखे दो-दो जामुन मुझे दे दो। यह सुनकर लड़कियां पहले कुछ डरीं। लेकिन कुछ मेरे हास्य बोध को समझ गर्इं और जामुन जीमते हुए दो-दो, चार-चार जामुन मुझे देने लगीं। इधर पेड़ पर चढ़ी लड़की जामुन तोड़ कर नीचे गिराती रही। थोड़ी देर बाद धीरे-धीरे वह पेड़ से नीचे आ गई।

मैंने गौर किया कि उसने स्कूल की नीली ड्रेस पहनी हुई थी। मैंने जामुन खाते हुए उससे पूछ दिया- मुझे यह बताओ कि हमारे राज्य के मुख्यमंत्री कौन हैं! लड़की ने तत्काल सही उत्तर दिया। मुझे अच्छा लगा। पेड़ से उतरी लड़की थोड़ा हांफ रही थी। शायद देर तक पेड़ पर जामुन तोड़ते हुए थक गई होगी। इसके बाद जामुन खाती लड़कियां दौड़ कर सड़क के उस पार अपने स्कूल की ओर जा रही थी। मगर पेड़ से उतरी लड़की मेरे कुछ सामान्य से प्रश्नों का सही-सही जवाब दे रही थी। इसके बाद वह लड़की भी स्कूल की ओर दौड़ती-उछलती निकल गई। मैं देखता रह गया। खुशी को खोजने की हालत पैदा हो गए दिनों में इस तरह बच्चों की खुशियों से भरी छवियां मेरी आंखों में ठहर गई।

मैंने पेड़ से पके आम खाने की कल्पना के बाद पेड़ से तोड़े गए जामुन खाए। हृदय गदगद था। लेकिन ध्यान में घूम रहा था कि गांव की छोटी बच्चियां कैसे पेड़ पर चढ़ जाती हैं, उतर जाती हैं। क्या हमारे शहर में लड़कियों को ऐसा होने दिया जाता है? खैर, पेड़ कट रहे हैं, गर्मी के बाद वर्षा ऋतु आ जाएगी। अब तो बस यही सोच रहा कि ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाऊंगा। खासतौर पर फलों वाले पेड़!

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