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वक्त रुकता नहीं

दुनिया में जो खुशियां हैं, वे बहुत ऊपरी हैं। खुशी तो तब मिलती है जब आप आत्मसंतुष्ट हों। यह आत्मसंतुष्टि नकारात्मक ऊर्जा की नहीं, बल्कि आत्मनिष्ठा और आत्मसम्मान से जुड़ी है।

सांकेतिक फोटो।

स्वरांगी साने

दुनिया में जो खुशियां हैं, वे बहुत ऊपरी हैं। खुशी तो तब मिलती है जब आप आत्मसंतुष्ट हों। यह आत्मसंतुष्टि नकारात्मक ऊर्जा की नहीं, बल्कि आत्मनिष्ठा और आत्मसम्मान से जुड़ी है। कोई इंसान उस समय आत्मप्रतिष्ठा से दूर हो जाता है, जब वह जिंदगी में बाहरी स्वीकृति पर बहुत अधिक निर्भर करने लगता है। दूसरा प्रशंसा करेगा, तभी हम प्रशंसनीय होंगे, ऐसा नहीं है। इस मुद्दे को अहंकार से परे रखकर सोचें। अगर हमको लगातार नकारात्मक विचार घेर रहे हैं तो सोचिए ऐसा क्यों होता है कि हम दूसरे क्या कह रहे हैं, उस पर अधिक ध्यान देने लग गए हैं! ऐसा तब होता है जब हम अपने विचारों को महत्त्व देना भूल जाते हैं। उस स्थिति में आ जाएं जब हम संतुलित हो जाएं। हमारा जोर ‘लेने’ की बजाए ‘देने’ पर हो जाए। हम किसी को कितना दे पाते हैं, उतनी हमारी कीमत खुद की नजरों में बढ़ती है।

हम आत्मस्वीकृति और आत्ममुग्धता की ओर बढ़ें। यहां आत्ममुग्धता और आत्मप्रशंसा मतलब अहंकार नहीं, बल्कि खुद पर ध्यान देना है। हमारे भीतर जो अच्छा है, उस पर लक्ष्य केंद्रित कर सकते हैं। पंचतत्त्वों से बनी हमारी काया में वे पंचतत्त्व अपने सारे गुणों के साथ हैं। रूह की इस ताकत को पहचानने की जरूरत है। खुद को प्रतिष्ठित करने के लिए हमें क्या करना होगा? सबसे पहले तो आत्मविश्वास जगाना होगा। आत्मविश्वास बढ़ाने के सारे सूत्रों में सबसे बड़ा सूत्र है खुद के साथ सुरक्षित महसूस होना। जब तक सुरक्षा का भाव मन में नहीं होता, तब तक आत्मविश्वास नहीं आता। अपने आपको पहचानें कि हम कर सकते हैं। दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं है, जो हम नहीं कर सकते।

हम जो भी करें उसकी जिम्मेदारी भी उठाएं। स्वीकार करें कि न केवल हमारे साथ, बल्कि हमारे आसपास और देश-दुनिया में जो भी हो रहा है उसके लिए हम जिम्मेदार हैं। आत्मविश्वास से आगे बढ़ते हुए तय करने की जरूरत है कि हम अपने हालात को बदलेंगे। हम क्या विशेष कर सकते हैं, अपनी विशिष्टता को पहचानें। अपनी कीमत जानें, अपना सम्मान करें।

जो लोग अपनी कीमत जानते हैं, उन्हें अपनी कुशलताओं के बारे में पूरी तरह पता होता है। वे दूसरों के साथ स्वस्थ रिश्ता बना पाते हैं, क्योंकि उनका अपने आप से स्वस्थ रिश्ता होता है। वे यथार्थवादी होते हैं। अपनी काबिलियत और दूसरों की काबिलियत को वे सही तरीके से पहचानते हैं और उस पर अमल करते हैं। वे अपनी आवश्यकताओं को पहचानते हैं और उनके बारे में बात करते हैं। मदद करना और मदद मांगना, दोनों ही वे जानते हैं। लेकिन सबसे जरूरी बात यह है कि हम अपने सत्य को पहचानें। जैसे ही हम अपने सत्य को पहचान लेंगे, हमको दिखेगा कि बहुत हद तक कैसे हम सामाजिक बंधनों में जकड़े हुए हैं।

देश, काल, समाज, व्यक्ति या वास्तविक राजनीतिक परिदृश्य की ही बात कर लें हम उस राजनीति को क्यों नहीं समझ पाते! कैसे हम बड़ी आसानी से दूसरों की बातों में आ जाते हैं और अपने विचारों को दूसरों के हिसाब से कैसे लगातार बदलते रहते हैं। या कि हम अपना खुद का विश्वास ही खो चुके हैं! एक सत्य हमको ऐसे कितने सत्य दिखला देगा। हम उस विश्वास को जगाएं।

अपने जीवन के हर क्षेत्र में उस विश्वास को फिर नई हवा दें। आपसी रिश्तों में विश्वास लाएं। हम जिनसे स्नेह रखते हैं, उन पर विश्वास करें। अपने कॅरियर, नौकरी, कारोबार-व्यवसाय में विश्वास जताएं। कितने भी व्यस्त क्यों न हों, थोड़ा समय निकाल कर खुद से बात करें। अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं को परखें उन सारी चीजों को, जिन्हें हमने पीछे छोड़ दिया था। उन पर लक्ष्य केंद्रित करें, क्योंकि यही बिल्कुल सही समय है। अभी नहीं, तो कभी नहीं। अपनी भीतरी आवाज को हम वक्त पर लें और अपनी ऊर्जा को पहचान कर उससे एकाकार हो जाएं तो हमें अपने कई सवालों के जवाब आसानी से मिल जाएंगे।

हम यह सोचने में वक्त जाया नहीं करें कि पांच साल बाद खुद को कहां देखना चाहते हैं। बल्कि यह सोचें कि हम खुद को वहां अभी क्यों नहीं पाते हैं! हम किस बात की प्रतीक्षा कर रहे हैं? जो कल पा सकते हैं, उसे आज क्यों पाना नहीं चाहते? कबीर कह कर गए हैं ‘पल में परलय’। क्या हम उस प्रलय की प्रतीक्षा कर रहे हैं? वे सारे पौधे जिन्हें पानी देना रह गया था, वे तो दिन भर में कुम्हला जाएंगे, अगर हमने थोड़ा आलस कर दिया तो। एक मिनट की देरी से भी ट्रेन छूट जाती है।

हम खुद को उन लोगों में नहीं आंकें जो आधा जीवन इस उम्मीद में बिता देते हैं कि ‘जब नौ मन तेल होगा तब राधा नाचेगी’ और उसके बाद का आधा जीवन खेद व्यक्त करने में बिताते हैं कि ‘ऐसा होता तो, वैसा हो जाता’। पूरी तरह सही वक्त कभी नहीं होता। उस समय को खुद रचना होता है। हमको अपना जीवन और अपना सही समय खुद बनाना है। हम उठें और उड़ान भरें, पूरा आसमान हमारा है।

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