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दुनिया मेरे आगे : अनुभूति की यात्रा

दूरदराज की समस्याओं का हल हमेशा हमारे पास होता है, पर खुद की और आसपास मौजूद समस्याओं का हल खोजना हमारे पसीने निकाल देता है। यही बात करीब मौजूद खुशियों पर भी लागू होती है। हमारे भीतर असीम क्षमताएं हैं, पर अगर हम उनका उपयोग नही करेंगे तो धीरे-धीरे वह कमजोर होकर लुप्त होती चली जाती है।

Author Updated: October 29, 2020 12:47 AM
प्रकृति और मनअपने मन का तादात्मय प्रकृति से जोड़ने पर मन ऊर्जावान हो जाता है।

एकता कानूनगो बक्षी

हमारा यह संसार कितनी ही जानी-अनजानी विचित्र, अद्भुत, दुर्लभ जगहों से भरा पड़ा है। कई बार हम सभी का मन रोजमर्रा की चिंताओं और स्थितियों और एक जैसे दृश्यों से ऊब कर अक्सर उन सामान्य से अलग अकल्पनीय दृश्यों को निहारने, खोजने और इस सृष्टि की दिव्यता को बेहद करीब से महसूस करने के लिए व्याकुल होने लगता है।

एक सूची मन में बनी हुई होती है जिसमें तमाम ऐसी जगहों का नाम होता है, जहां हम एक बार जाना चाहते हैं। और अब तो अपने सपनों को पूरा करने की पूर्व योजना के तहत हर व्यक्ति कुछ न कुछ बचत इसके लिए करता ही है। परिवहन के साधन और पर्यटन के विकास के साथ अब हम लोग अपनी आकांक्षा को काफी हद तक पूरा कर भी पाते हैं। अपनी तमाम जद्दोजहद के बाद हम उस जगह पहुंच भी जाते हैं, जहां जाना चाहते थे। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम सही अर्थों में वहां पहुंच पाते हैं?

असल में बहुत कम लोग ही वास्तव में उस जगह का असली लुत्फ उठा पाते हैं। बहुत से तो ऐसे भी होते हैं जो मात्र एक-दो तस्वीरें और सेल्फी लेकर मात्र अपनी भौतिक या दैहिक उपस्थिति ही दर्ज करा पाते हैं। उस खास जगह पर होते हुए भी हम कई बार बस उतना ही देख पा रहे होते हैं जितना यात्रा से पहले हमने कल्पना की होती है या फिर कहीं थोड़ा बहुत पढ़ कर अपने मस्तिष्क में उसकी कोई निश्चित छवि बना रखी होती है। जबकि जब तक उस जगह के वातावरण को हम करीब से महसूस नहीं कर पाते, वहां के जन जीवन और पर्यावरण से जुड़ नहीं पाते, हमारा वहां जाना मात्र एक यात्रा होगी।

हमारी आकांक्षा तो उस खास जगह के समग्र आनंद को भीतर तक महसूस करने और उसे सच्चे संदर्भों में देखने-समझने की होना चाहिए। जिसके लिए वहां मौजूद वनस्पति, पक्षी, जीव-जंतु की उपस्थिति से लेकर मौसम के बदलते मिजाज, सूरज के तेवर, हवा की ठंडक, मिट्टी की गंध, धूप-छांव की अठखेलियां, आसमान के बदलते रंग, स्थानीय लोगों की जीवन-शैली, सांस्कृतिक रंगों की खुशबू अगर हम तक नही पहुंच पा रही तो हमारा वहां जाना अधूरा ही कहा जाएगा।

पर्यटन के संदर्भ में चीजों को देखने-समझने में इस अधूरेपन की जड़ शायद हमारे दैनिक जीवन की गतिविधियों में हमारे उदासीन रवैये में ही निहित है। वर्तमान स्थितियों में खुद के स्थायित्व और सुख को बनाए रखने की कोशिशों में इतना संघर्ष है कि आनंद की तलाश में खास जगह पर पहुंचते ही हमारा मन उस स्थान का लुफ्त उठाने के बजाय भविष्य की योजनाएं बनाने लग जाता है।

आमतौर पर हममें से कई उतने विवेकशील भी नहीं होते। कई मानसिक रूप दूरदृष्टि से भी पीड़ित होते हैं। वे बस दूर का देख पाते हैं। जैसे ही चीजें करीब आती हैं, देखने, महसूस करने की इंद्रियां कमजोर पड़ने लगती हैं। ऐसे लोग भविष्य की योजनाएं तो बहुत बेहतर बना पाते हैं, पर उनके लिए सबसे कठिन होता है प्रत्यक्ष को जीना और उसका आनंद उठाना। परिवेश की खूबसूरती और उसकी विशेषताओं से गुजर कर अपने वर्तमान में खुशियों के फूल खिलाना उन्हें सीखना चाहिए।

दूरदराज की समस्याओं का हल हमेशा हमारे पास होता है, पर खुद की और आसपास मौजूद समस्याओं का हल खोजना हमारे पसीने निकाल देता है। यही बात करीब मौजूद खुशियों पर भी लागू होती है। हमारे भीतर असीम क्षमताएं हैं, पर अगर हम उनका उपयोग नही करेंगे तो धीरे-धीरे वह कमजोर होकर लुप्त होती चली जाती है।

जिस तरह शरीर की मजबूती के लिए हम कसरत करते हैं, उसे नई चुनौतियां देते हैं, ताकि हमारे भीतर की ताकत को हम महसूस कर सकें, उसका पूर्ण रूप से दोहन कर सकें, बस वैसे ही मन, मस्तिष्क की भी हर दिन थोड़ी बहुत कसरत जरूरी है।

मसलन, पर्यावरण से संबंधित कुछ किताबें पढ़ते हुए विशेषज्ञों से मेलजोल से हमें प्रकृति के वे पहलू भी दिखाई देने लग जाते हैं जो पहले भी हमारे आसपास मौजूद थे, पर समझ की सीमा के चलते हम कभी उन्हें महसूस नहीं कर पाए। पंछी, पेड़ों, वनस्पतियों के साथ ही सूक्ष्म कीट-पतंगे तक स्पष्ट रूप से हमें दिखाई देने लगते हैं।

यहां तक कि दुर्लभ तितलियां, चिड़िया भी हमारे आसपास हर दिन मंडराती दिखाई देती हैं। हवा के स्पर्श से ही मौसम के बदलाव को महसूस करने लगते हैं। यह एक चकित करने वाला एहसास होता है, पर असल में यह गुण पहले ही हमारे अंदर उपस्थित रहता है।
अगर हम अपने आपको एक तरह की मानसिकता और विचारों में ही जकड़ लेते हैं तो काफी अनुभवों से खुद को वंचित कर लेते हैं।

खुद के बनाई सुविधाजनक चारदिवारी से बाहर निकल कर चीजों को सूक्ष्मता से सीखना-समझना बहुत जरूरी है, उस जादू को महसूस करने के लिए। जीवन का हर आम दिन हमें तैयार करता है उस रोमांचक अनुभव के लिए। हमें एक खोजकर्ता की तरह हर दिन की शुरुआत करना चाहिए। नई जगहों पर जाने पर अगर हमारा ऐसा नजरिया रहा तो शायद हम उस यात्रा, लम्हों और दृश्यों को सही अर्थों में अनुभव कर सकें।

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