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दुनिया मेरे आगे: सपनों का बाजार

हर हाथ को काम देने वाले मसीहाओं ने ऐसे मुद्रा कर्जे बांटे कि जिनका प्रचार तो बहुत हुआ, लेकिन वे अपने बांटने की कुल राशि तक भी पहुंच न पाए। हां, विस्फारित नेत्रों वाले बेकार युवकों को यह संदेश अवश्य दे गए कि काम चाहते हो तो अपनी डिग्रियों का मातम मनाओ।

दुनिया मेरे आगेउम्मीदें लेकर दुनिया में आग बढ़ रहे हैं लोग, उम्मीदें सपनों में खो रही हैं।

जब ऊंचे मंचों से बड़े-बड़े नेता अपनी कथित सच्चाइयां अपनाने का संदेश देते हैं, तो उन्हें लगता है कि बालों से खाली सिर वाले लोगों के शहर में हमारे लिए नाखून प्राप्त होने की दुआ कर रहे हैं। अगर तिहत्तर बरस की आजादी के बाद भी आम आदमी को रोटी, कपड़ा और मकान मयस्सर नहीं हो सका, चिंता से उसकी खोपड़ी के सब बाल गिर गए, तो कम से कम ऊंची अटारियों में रहने वाले समाज के मसीहाओं के ओज भरे जुमले सुनने के बाद अपना सिर पीटने के स्थान पर अपने सिर को नाखूनों के साथ वह छील तो सके!
पिछले सात दशक से ज्यादा के इन तमाम सालों में अपनी तरक्की की कहानियां सुनते-सुनते वह अपने गिर्द फैले अंधेरे को रोशनी की तलाश में टटोलता है, तो उसे लगता है इन सब बरसों में उसके लिए जमाना उल्टी चाल चल गया।

अपनी पिछड़ी हुई बस्तियों में हम लोग रोशनी के कंदील जलाने चले थे, लेकिन उनका अंधेरा और गहरा हो गया। डार्विन महोदय ने विकास के सिद्धांत में बताया था कि आदमी पहले बंदर था, विकास करते हुए आदमी बन गया। लेकिन यहां तो ‘उल्टे बांस बरेली को’ चले गए। अच्छे-भले सभ्य सुसंस्कृत देश में, वेदों की परंपरा से सज्जित देश में वे आर्य पुरुषों की भद्रता के साथ जन्मे थे, राजनीतिकों ने अपने वंशवाद और भाई-भतीजावाद के ऐसे बिगुल बजाए कि आज उनके लिए परियोजनाओं की नींव का पत्थर रखते हुए उन पर अपना नाम न पाने पर एक-दूसरे पर जूतों की बारिश करने लगते हैं।

बीच-बचाव करवाते लोग उन्हें शर्मिंदा करने के स्थान पर दिलासा दे जाते हैं कि अभी यह जूतम-पैजार स्थगित कर दो। चुनाव जीत गए तो सदन में एक-दूसरे पर जूते बरसा लेना, जनता को भी शुबहा बना रहेगा कि आह, नेता हमारी कितनी चिंता कर रहे हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र किस खूबी के साथ चला कि आज आज एक अजूबा तंत्र बन गया!

इस बीच फिर देश के कुछ इलाके में वोट डालने के दिन आने वाले हैं। देखते ही देखते पांच बरस बीत गए। इन पांच बरसों में बड़बोले नेताओं को मखमली सपने दिखाने के कारण जनता ने सत्ता की मीनारों पर भेजा था, इस उम्मीद के साथ कि वे वहां से उनके लिए क्रांति की डफली बजाएंगे, सारा देश उसकी ताल पर नाचेगा, क्रांति पथ पर स्वर गूंजेंगे और पूरा देश नाचता हुआ अपनी मंजिलों की ओर बढ़ जाएगा। हर हाथ को काम की मंजिल, हर नंगे बदन को कपड़ा और हर बे-आसरे को छत। वे पांच बरस बीत गए। ‘क्रांति’ औंधे मुंह गिरी पड़ी है!

हर हाथ को काम देने वाले मसीहाओं ने ऐसे मुद्रा कर्जे बांटे कि जिनका प्रचार तो बहुत हुआ, लेकिन वे अपने बांटने की कुल राशि तक भी पहुंच न पाए। हां, विस्फारित नेत्रों वाले बेकार युवकों को यह संदेश अवश्य दे गए कि काम चाहते हो तो अपनी डिग्रियों का मातम मनाओ। पहले ऐसे वक्त के लिए संदेश मिलता था- ‘दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’। अब दाल-रोटी के लिए सस्ती दालें और अनाज तो इनके लिए निर्दिष्ट दुकानों पर मिलता नहीं, कहीं नौकरशाही की लेट-लतीफी की समस्या है और कहीं इन्हें खरीदने के लिए सरकार का खजाना खाली है।

जनता उम्मीद के साथ हवाई मीनार पर बैठे लोगों की ओर देखती है, तो वे बता देते हैं, पिछली सरकार खजाना खाली कर गई थी, अब अगली बार हमें चुनोगे, तो हम खजाना भर कर आपको रोटी भेंट करेंगे। तब तक साझा रसोइयों से सस्ती रोटी लेकर अपना पेट भर लो। ये रसोइयां भी खूब हैं साब, दानवीरों की दानवीरता पर चलती हैं। अगर कहीं उनका मिजाज बिगड़ जाए, तो कतार में लगे लोगों को उपवास रखना पड़ता है।

अपने लिए कपड़े और मकान की बात अभी भूल जाइए। आप जन्म से फटे-पुराने और थिगलियों लगे कपड़े पहनते हैं। अब तो बड़े अमीरों के साहबजादे भी उन्हें पहनने लगे। सुनते हैं, इन्हें पहनने का फैशन हो गया है। कैसा समाजवाद आया? अमीर और गरीब एक से कपड़े पहन कर फैशन शो के रैंप पर चल रहे हैं।

अब मीनार से उतर कर चुनाव की वजह से गलियों में आए लोग फिर अपनी डफलियां उठा सपनों के बाजार सजा रहे हैं। डफलियां बजती हैं। बंदर बनना उनकी नियति है। हर पांच बरस के बाद चुनाव मेले सजते हैं। चुनाव प्रचार के दिनों में फिर सपनों के बाजार सजेंगे। चुनाव मंचों से डफलियां बजती हैं, दुश्मन के छक्के छुड़ाने हैं तो हमें वोट दो! सरहदों पर कुर्बान अपने देश के रणबांकुरों को सलाम करना है, तो हमें वोट दो! वोट दो ताकि देश में आतंकवाद के भस्मासुरों का नाचना बंद हो जाए!

डफली बजती रहती है। लोगों को उसका स्वर माकूल लगता है। डफलियों के ओजपूर्ण स्वर उनके अंदर तक उतर जाते हैं। वे नाचते हुए अपने वोट के हक का इस्तेमाल करने जाते हैं, वतन के प्रति भावुकता से ओत-प्रोत होकर।
अभी रोटी रोजगार के वादे पूरे नहीं हुए तो क्या हुआ! आपकी सरहदों की रक्षा हो गई, अब अगला कदम आपको रोटी, रोजगार देना ही है!

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