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दुनिया मेरे आगे: बदलाव की परतें

अब तक के सफर में हमारा समाज जिस सीमा में आधुनिक हो सका है, उसे वहां तक तक पहुंचाने में सभी वर्गों की कड़ी मेहनत रही। बदलते समाज के साथ हमारी आदतें, व्यवहार और जीवन शैली भी बदली।

Author July 14, 2018 04:37 am
पुरुषों को महिलाओं के प्रति अपनी जड़ और विकृत मानसिकता में बदलाव लाना होगा।

वंदना यादव

अब तक के सफर में हमारा समाज जिस सीमा में आधुनिक हो सका है, उसे वहां तक तक पहुंचाने में सभी वर्गों की कड़ी मेहनत रही। बदलते समाज के साथ हमारी आदतें, व्यवहार और जीवन शैली भी बदली। परंपरागत भारतीय मकानों के आकार, भाषा, हमारा खान-पान और पहनावा भी वक्त की जरूरत के साथ बदला और अब भी लगातार बदल रहा है। इन तमाम बदलावों को थोड़ी झिझक और कुछ विलंब के बाद सभी ने अपना लिया। ये सभी वे बदलाव थे जो व्यक्तिगत जीवन से शुरू होकर पारिवारिक स्तर और फिर सामाजिक स्वरूप तक पहुंचे। धीरे-धीरे इन बदलावों को व्यापक स्तर पर भी मान्यता मिली। ज्यादातर बदलाव हमारी प्रगतिशील विचारधारा के परिणाम रहे, जिन्हें सभ्य समाज ने प्रगति के पथ पर आगे बढ़ते हुए अपना ही लिया।

एक और महत्त्वपूर्ण बदलाव हुआ, जिसका कुछ हद तक समाजीकरण तो हुआ, लेकिन कई स्तरों पर उसके सामने पुरुष वर्चस्व वाली विचारधारा ने बाधाएं खड़ी कीं। तमाम उन्नति और प्रगतिशीलता के दावों के बीच महिलाओं को अपने प्रतिदिन के व्यवहार में छोटे-छोटे फेरबदल के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। अपनी शारीरिक जरूरत के अनुसार खाने-पीने की आवश्यकता पूरी करने से लेकर आरामदायक पहनावा चुनने के अधिकार के लिए महिलाओं ने पीढ़ियों तक का संघर्ष किया। प्रांतीय पोशाकों को छोड़ कर भारतीय महिलाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक पहचान बन चुकी साड़ी को अपना सामान्य लिबास चुना, मगर उनके लिए यहां तक पहुंचने की राह भी आसान नहीं थी। आज की तारीख में भी महिलाओं को पहनावे में स्वतंत्रता उस सीमा तक ही हासिल है, जहां तक परिवार के पुरुषों की रजामंदी है। कभी महिलाओं के पहनावे को पुरुषों ने उनकी सुरक्षा के मुद्दे से जोड़ा तो कभी सभ्यता की सीमाओं में कैद कर दिया।

लेकिन पुरुष सदियों पुरानी धोती-कुर्ते की सांस्कृतिक पोशाक को अब धता बता कर पैंट-कमीज, जींस और टी-शर्ट में आरामदायक जीवन जी रहा है। वह गरमी की भयावहता से बचने के लिए ‘बरमूडा’ या ‘शॉर्ट्स’ में सहज जीवन जीने को अधिकार मानता है और उसका उपयोग करता है। पुरुष के लगातार बदलते पहनावे पर अंगुली उठाने का अधिकार किसी को नहीं है। मगर वही पुरुष संस्कृति बचाने का जिम्मा लबादे में लिपटी रहने वाली औरत पर डाल देता है। इससे उपजी असुविधाओं या मजबूरियों पर सवाल उठाने का हक महिलाओं को नहीं मिलता। कभी संस्कृति बचाने के नाम पर तो कभी सुरक्षा की चिंता के नाम पर महिलाएं यह सब सहती हैं। नई पीढ़ी की जो महिलाएं आधुनिक लिबास पहनती भी हैं, उन्हें सीधे महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है।

सवाल है कि संस्कृति बचाने के नाम पर इस तरह का दोहरापन क्यों है। पहनावा ही अगर भारतीयता की पहचान हैं तो इसकी जिम्मेदारी एक पक्ष के कंधों पर ही क्यों हो? स्त्री और पुरुष दोनों भारतीय हैं तो यह जिम्मेदारी भी दोनों वर्गों की सुनिश्चित होनी चाहिए। अगर यह सिर्फ सुरक्षा का मुद्दा है, तब भी सवाल वही है कि सुरक्षा किससे और किसके द्वारा? सिर से पैर तक ढंके पहनावे में सुरक्षा की पैरवी करने वालों से सवाल यह है कि हमारी मासूम बच्चियों के पहनावों में क्या कमी है कि हर दिन देश के अलग-अलग हिस्सों से उनके अपराधियों की हवस का शिकार होने की दिल दहला देने वाली खबरें आ रही हैं! हमारी जो मासूम बच्चियां लगातार दरिंदगी का शिकार हो रही हैं, वे तो आधुनिक और परंपरागत पहनावे का अंतर भी नहीं समझतीं। वे इतनी छोटी हैं कि उन्हें अपने शरीर के अंगों की जानकारी तक नहीं है, फिर भी उनसे बलात्कार हो रहा है, उनकी हत्या की जा रही है।

इस तरह की घटनाएं और उनसे उपजा खौफ महिलाओं को फिर से चारदिवारी में कैद करने का माहौल रच रहा है। लेकिन अब यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि समाज के दुश्मनों के डर से बेटियां न तो घरों में कैद होंगी, न जीवन जीना छोड़ेंगी। अब बदलाव का जो सफर शुरू हो चुका है, उसमें विक्षिप्त मानसिकता वालों को बदलना होगा। पुरुषों को महिलाओं के प्रति अपनी जड़ और विकृत मानसिकता में बदलाव लाना होगा।

यह अब तक नहीं हो सका है, इसलिए फिलहाल हमें अपनी बच्चियों को किसी भी पुरुष की संगति में इस बात के लिए शिक्षित करना होगा कि कैसे सावधानी बरती जाए। उन्हें खिलौनों से खेलने की उम्र में सचेत रहना और मां को छोड़ कर हर रिश्ते पर अविश्वास करना सिखाना होगा! लेकिन इतने भर से महिलाओं और मासूमों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकेगी। अब जरूरत इस बात की है कि हर मां अपने बेटे को पैदा होने के बाद से ही महिलाओं के प्रति इंसान बनना और उनकी कद्र करना सिखाए। समूचा परिवार खेल-कूद की उम्र से बड़ा होने तक घर के लड़कों को सामाजिक जीवन की मर्यादा बताए। हर बच्चे को लड़का बनने तक की उम्र में ही इतना संवेदनशील बनाया जाए कि वह महिलाओं को सिर्फ देह नहीं समझे।

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