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परतों में पलता भेदभाव

विश्व के छोटे-छोटे देश भी बेटियों या महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के मामले में हमसे बेहतर स्थिति में हैं।

सांकेतिक फोटो।

चेतनादित्य आलोक

पिछले दिनों जब नाबालिग पुत्री से बलात्कार के आरोपी एक पिता की खबर पढ़ी तो कुछ समय पहले सुर्खियों में आई चेन्नई की ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ाई करने वाली एक होनहार लड़की की आत्महत्या की घटना याद आई। उस लड़की के आत्महत्या नोट का विशेष रूप से उल्लेख किया गया था। मैं सोचने लगा था कि हम चाहे तरक्की और उन्नति की लाख डींगें हांक लें, पर हमारे समाज में आज भी लड़कियों के लिए स्थितियों में बहुत परिवर्तन नहीं आया है। हम चांद पर चले गए, मंगल ग्रह पर जीवन की तलाश में लगे हुए हैं, पांच ट्रिलियन वाली अर्थव्यवस्था बनने के सपने देख रहे हैं, पर अपनी बेटियों के लिए आज भी हम अपने ही मन-मस्तिष्क में करुणा, दया एवं सम्मान वाली सोच को स्थान नहीं दे पाए हैं।

दरअसल, हमने संतानें पैदा करना सीख लिया, पर भेदभाव रहित उनके लालन-पालन के प्राकृतिक नियमों और उससे संबद्ध अपने कर्तव्यों को अब तक स्वीकार नहीं किया है। जब हमने संतानों की पहचान बेटों और बेटियों के रूप में करनी शुरू कर दीं, तब हमारा अगला कदम उसके आगे जाकर उनके प्रति मनोभावों के स्तर पर होने वाले वैचारिक भिन्नताओं के लिए तैयार हो चुका था। इसका परिणाम यह हुआ कि बेटा होने पर हमारा मन अक्सर नम होने लगा, जबकि बेटी होने पर हमारा मन उग्र और बेचैन रहने लगा। बेटा के जन्म लेने पर मन में करुणा, दया एवं सम्मान वाली सोच हिलोरें लेने लगीं और हृदय में प्रेम और सद्भाव की भावनाएं पैदा होने लगीं, जबकि बेटी के होने पर इसके ठीक उलट मन तथा हृदय दोनों ही स्तरों पर भेदभाव वाली सोच और दृष्टि हावी रही।

नतीजतन समाज में हर स्तर पर हर तरफ ये स्थितियां उत्पन्न हुर्इं कि आज बेटियों का स्वतंत्र विचरण भी सुरक्षित नहीं है। यह स्थिति सिर्फ रात के अंधेरे में बाहर सड़कों पर या सुनसान स्थानों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बाजारों, गलियों में, सड़कों पर, विद्यालयों समेत तमाम शिक्षण संस्थानोंं, पार्कों, कार्यालयोंं, खेल के मैदानों में और रिश्ते-नातों के बीच भी आज हमारी बेटियां सुरक्षित महसूस नहीं करतीं। यानी बेटियों के लिए खतरे सिर्फ अनजान जगहों या खुले सार्वजनिक स्थानों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि अपने माता-पिता के साथ रहते हुए निजी घरों और तमाम अपनों और परायों के बीच भी वे उतनी ही असुरक्षित महसूस करती हैं।

यही सार है कि ग्यारहवीं की उस लड़की के आत्महत्या नोट में लड़की ने पीड़ा के माध्यम से समाज का सच प्रस्तुत कर हमारे झूठे आदर्शों की पोल खोल दी थी। उसने लिखा था कि ‘न तो शिक्षकों पर भरोसा करो और न रिश्तेदारों पर। लड़कियों के लिए अब सिर्फ मां की कोख और कब्र ही सुरक्षित रह गई है।’ इन पंक्तियों को पढ़ कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। मन में कई प्रश्न उठने लगे थे।

मसलन, कितनी पीड़ा से गुजरती होंगी लड़कियां और किस सीमा तक टूटता होगा उनका मन, जब उनके स्वाभिमान को चूर किया जाता होगा। उनकी गरिमा को चोट पहुंचाई जाती होगी, हममें से ही तमाम जाने-अनजाने चेहरों के द्वारा। चेन्नई के बाहरी क्षेत्र में अपने माता-पिता के साथ रहने वाली उस लड़की जैसी ही मानसिक स्थितियों से गुजरने वाली अनेक लड़कियों में से एक और लड़की की खबर ने फिर मेरे मन को झकझोर दिया, जब पिछले दिनों बहराईच की एक अदालत द्वारा अपनी ही नाबालिग पुत्री से बलात्कार करने के आरोपित एक पिता को सजा सुनाई।

गौरतलब है कि विश्व के छोटे-छोटे देश भी बेटियों या महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के मामले में हमसे बेहतर स्थिति में हैं। 1997-98 में लगभग एक करोड़ की जनसंख्या वाले स्कैंडिनेवियन देश स्वीडन में यह जानकर मुझे बेहद आश्चर्य हुआ था कि वहां हर महीने मात्र एक महिला के साथ किसी न किसी प्रकार की आपराधिक घटना घटती थी, जिसमें आज भी बहुत परिवर्तन नहीं हुआ है। इसी प्रकार स्वीडन के पास ही ओलैंड नामक एक छोटे से द्वीप पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस के न होने के बावजूद वहां सभी प्रकार के अपराधों में नगण्यता चकित करने वाली थी। यूरोप के ही महज 40 हजार की जनसंख्या वाले एक अन्य छोटे से देश लिस्टेंस्टाइन में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की संख्या नगण्य होती है। 2020 में वहां महिलाओं के विरुद्ध एक भी अपराध घटित नहीं हुआ।

दूसरी ओर, हमारे देश में आमतौर पर हर रोज महिलाओं के खिलाफ 80 घटनाएं सिर्फ बलात्कार की होती हैं। सन 2013 में अपनों के द्वारा बेटियों के किए जाने वाले शोषण-दमन पर आधारित एक विशिष्ट आलेख तैयार करने के क्रम में मैंने पाया था कि दर्जनों बेटियों के पिता और निकटतम रिश्तेदार ही उनका यौन शोषण कर रहे थे। दरअसल, हम न सिर्फ अपनी बेटियों को बेटों की तुलना में कमतर आंकने में विश्वास करते हैं और उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हैं, बल्कि हत्या और बलात्कार जैसे निकृष्टतम कुकृत्यों में भी सहभागी बनते हैं।

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