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दुनिया मेरे आगे: हंसी की हिलोर

हंसी में हम अपने भीतर के उल्लास को व्यक्त करते हैं। यह इसका सकारात्मक पक्ष है। कई बार आज के इस विषाक्त समय में हंसी हम दूसरों को नीचा दिखाने के लिए, उनकी किसी ‘कमी’ पर हंसते है या फिर उन पर व्यंग्य करने के लिए भी हंसते हैं। यह एक नकारात्मक भाव है जिसको बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। वास्तविक हंसी तो खिली धूप, बरसते बादल बहती नदी की तरह होती है जो सबको भिगो देती है।

चेहरे पर हंसी सामने वाले पर तो सकारात्मक प्रभाव छोड़ती ही है, खुद हंसने वाले को ऊर्जावान बनाती है।

हंसी मात्र होठों का पसरना और गले से आवाज का बाहर आना नहीं है। हंसी हमारे मन, मस्तिष्क दोनों से एक साथ उठती हिलोर है जो आसपास के सारे वातावरण को सकारात्मक भाव से ओतप्रोत कर जाती है। हास्य रस के कवि, चुटकुले और पत्र पत्रिकाओं में हास्य-व्यंग्य कॉलम इसीलिए होते हैं। ये मुक्त हंसी, जो व्यक्ति को खुद को ही नहीं, आसपास को भी नकारात्मक बोध से मुक्त करती है। पर आज के बदलते समय में इस तकनीकी मृग मरीचिका के समय में हंसी के फव्वारे सूख से गए हैं! हंसी के अर्थ और महत्त्व की पहचान खोने-सी लगी है। इसका परिणाम है कि आसपास अब अजीब-सी मनहूसियत है। आपसी संवाद तो होता है, पर वह बिंदास हंसी गायब है।

इस बीच एक हवा चली। योगासनों के साथ हंसी के ठहाकों के महत्त्व को पहचाना गया। पार्क में, खुली जगहों में, योगासन के साथ हाथ ऊपर करके हंसी के ठहाके लगाना भी योगासनों का अभिन्न अंग बन गया। आखिर क्यों? हंसी जहां शरीर में आक्सीजन का संचार करती है, फेफड़ों और भीतरी अंगों को रोगमुक्त करती है, वहीं मन और मस्तिष्क भी इस हंसी से तनाव मुक्त होता है। मुक्त हंसी का दर्शन बहुत प्राचीन है। एक कहानी पढ़ी थी। एक राजा था, जिसके राज्य में संगीत, नृत्य, कलाओं पर पाबंदी थी। कोई उत्सव नहीं मनाया जाता। यहां तक कि बड़ों से लेकर बच्चों तक का हंसना भी मना था। एक संन्यासी एक दिन उधर से निकला उसके कंधे पर उसका वाद्य था। वह गाता हुआ मस्ती में झूमता गाता और हंसता हुआ चला आ रहा था।

राज्य में प्रवेश किया तो राजा के कर्मचारियों ने उसे पकड़ लिया। राजा के सामने पेशी के बाद संन्यासी को पता चला कि रानी लंबे समय से बीमार पड़ी है और कोई भी इलाज उनको ठीक नहीं कर पाया। संन्यासी ने राजा से कुछ उपाय करने की इजाजत मांगी। राजा ने हिचकिचाते हुए इजाजत दे दी। संन्यासी ने अपनी वाद्य-यंत्र के तारों को छेड़ा, सुरीले स्वर में गाना गया और मुक्त हंसी की हिलोर में झूमने लगा। उसके संगीत और गायन तथा हंसी से पेड़ों पर दबे रुके पक्षियों की चहचहाहट शुरू हो गई।

मोर नाचने लगे। तभी सबने चमत्कार देखा। लंबे समये से निढाल पड़ी रानी उठ बैठी। साधु ने उसका नमन किया और कहा आप पूरी तरह स्वस्थ हैं। राजा हैरान था। यह कैसे हुआ? साधु ने कहा कि महाराज, प्रकृति का यही स्वभाव है। मनुष्य मन का भी यही स्वभाव है। मुक्त और मस्त होगा तो स्वस्थ भी होगा। राजा को अपनी भूल का भान हुआ और उस दिन के बाद सब सामान्य हो गया।

हंसी का एक लैंगिक पक्ष भी है। आमतौर पर लड़कियों का जोर से और खिलखिला कर हंसना समाज में अच्छा नहीं समझा जाता। ‘हंसी तो फंसी’ एक सस्ती-सी इस मानसिकता के कारण लड़कियों पर यह कानून आरोपित किया जाता है। बचपन से ही उन्हें सिखाया जाता है कि धीरे बोलों, धीरे हंसो, आवाज बाहर न निकले? अच्छी लड़कियां मुंह फाड़ कर दांत निकाल कर नहीं हंसती। लड़कियों की सौम्यता के लिए जरूरी है कि वह दबंग हंसी के बजाय ‘दबी हुई’ हंसी सीखे!

असल में यह सब हमारी ही संकीर्ण मानसिकता का ही परिणाम है। हंसना खुल कर, खिलखिला कर हंसना हमारे तन-मन और मस्तिष्क को उर्जस्वित करता है। शारीरिक दृष्टि से खिलखिला कर हंसने से फेफड़ों की अंतड़ियों का व्यायाम होता है, जिससे इससे संबंधित रोगों से मुक्ति मिलती है। साथ ही मन और मस्तिष्क की सारी कोशिकाएं भी इससे क्रियान्वित होती हैं, क्योंकि ऑक्सीजन का प्रवाह होता है। इससे बुद्धि तीक्ष्ण होती है। मन शांत और स्थिर होता है।

मानसिक संतुलन बढ़ता है। यह एक तरह की थेरेपी या इलाज का तरीका है, जिसे आज पहचाना भी गया है। इसलिए आज यह हास्य योग योगाभ्यास के दौरान कराया जाता है, ताकि वह हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाए। डॉक्टर भी आजकल इसे पहचानने लगे हैं और इसे मेडिकल थेरेपी कहते हैं। इससे बहुत सी शारीरिक बीमारियों से और मानसिक तनाव से मुक्त हो जाते हैं।

आखिर में एक बात और भी कि हंसी में हम अपने भीतर के उल्लास को व्यक्त करते हैं। यह इसका सकारात्मक पक्ष है। कई बार आज के इस विषाक्त समय में हंसी हम दूसरों को नीचा दिखाने के लिए, उनकी किसी ‘कमी’ पर हंसते है या फिर उन पर व्यंग्य करने के लिए भी हंसते हैं। यह एक नकारात्मक भाव है जिसको बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। यह आपस में एक दूसरे को बांटता है। बड़े-छोटे, ऊंच-नीच का भाव पैदा करता है। वास्तविक हंसी तो खिली धूप, बरसते बादल बहती नदी की तरह होती है जो सबको भिगो देती है। सबको मिला देती है। समाज का एकीकरण करती है।

एक दूसरे को पास लाती है और सद्भाव उत्पन्न करती है। आखिर हंसी के इस दर्शन को समझना और समझाया जाना आज के इस विसंगत समय में बहुत आवश्यक है। इसलिए हंसी को हंसी में नहीं उड़ाया जाना चाहिए। ‘रोते’ हुए तो आदमी पैदा ही होता है। असल में जीने के लिए उसे हंसना सीखना होगा। यही हंसी का और स्वस्थ, सुगम, सुंदर जीवन का मूलमंत्र भी है।

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