संभावनाओं की भाषा

इंटरनेट पर दुनिया का नया परिदृश्य हिंदी का एक नया संसार दिखा रहा है।

सांकेतिक फोटो।

कृष्ण कुमार रत्तू

इंटरनेट पर दुनिया का नया परिदृश्य हिंदी का एक नया संसार दिखा रहा है। एक नई आभासी दुनिया सामने दिखाई दे रही है। इस समय हिंदी भाषा का जो प्रचार-प्रसार इंटरनेट के द्वारा तकनीक के कारण वैश्विक स्तर पर दिखाई देता है, वह चौंकाने वाला है। अब तक आए सर्वेक्षण ये दिखा रहे हैं कि महामारी के दौर में हिंदी का अद्भुत विकास इंटरनेट के जरिए हुआ है। खासकर आॅनलाइन और ओटीटी मंचों पर। समूचे परिदृश्य को देखें तो पता चलता है कि हिंदी यूरोपीय भाषाओं और अंग्रेजी, चीनी भाषा के साथ-साथ विश्व की दूसरी बड़ी संप्रेषण भाषा के रूप में हमारे सम्मुख बड़ी मजबूती से अपना वैश्विक चेहरा लिए खड़ी है, जिसमें रोजगार संप्रेषण और भारतीयता का हिंदी का एक अपना नया मुहावरा दिखाई दे रहा है। यह भी सुखद अनुभव है कि अब हिंदी के नए शब्द और उनका प्रयोग सूचना तकनीक के संप्रेषण के कारण उस तरह से नए रूप में समाहित और नए शब्दों के द्वारा उच्चरित और पठन-पाठन की दुनिया में सामने आ रहा है।

इन दिनों एक नया परिदृश्य हिंदी के विकास और प्रसार का नई तकनीक से विकसित हुआ है, जिसमें मोबाइल फोन से लेकर नए सूचना प्रसारण तकनीकी यंत्रों से हिंदी उन सब लोगों तक पहुंच रही है जहां तक पहले पहुंचना बेहद मुश्किल था। मुझे याद है जब गांव में हिंदी की पढ़ाई के लिए स्कूलों में उन अध्यापकों पर सारा दारोमदार था, पर अब सूचना की बदलती हुई तकनीक ने इंटरनेट के संजाल से हिंदी का एक विकसित और शुद्धता भरा नया संसार रच दिया है। इन दिनों इंटरनेट की तकनीक से जो भाषा हमारे सामने है, वह एक नई हिंदी है। हालांकि यह भी सच है कि इंटरनेट के संजाल और अलग-अलग विविधा के कारण हिंदी के शब्द जोड़ और भाषाई तकनीक का एक नया कैनवस या आधार पैदा हुआ है, जिसे पिछले समय के आभासी संसार में आॅनलाइन हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार की एक नई तस्वीर के जरिए प्रस्तुत किया है और यह बेहद मकबूल भी हो गया है।

हिंदी को लेकर जिस तरह का मुहावरा हमारे गांव और प्राथमिक स्कूलों में, खासकर भारतीय हिंदी पट्टी के प्रांतों में दिखाई देता है, उससे भी बुरी हालत कभी हिंदी प्रदेशों में हिंदी के बारे में दिखाई देती थी। मगर तकनीकी नई दुनिया ने हिंदी के प्रचार और फैलाव के इतने आधारभूत परिवर्तन कर दिए हैं कि अब यह भाषा ट्विटर से लेकर दूसरे अन्य संप्रेषण माध्यमों की भाषा बन गई है। एक समय था जब ‘हिंदी का क ख ग घ’ अपने पुरातन अर्थ लिए हुए था, पर नई तकनीक ने इनके स्वरूप ‘गूगल’ को बदल दिया है। इंटरनेट की एक आभासी दुनिया में हाथ में मोबाइल और टेबलेट की स्क्रीन पर दुनिया और हिंदी की भाषा को निर्मित किया है, वह हिंदी का एक नया आधार बन गया है। समय के साथ शब्दों के अर्थ बदल गए हैं, नए शब्द हिंदी में समाहित हो गए हैं।

पिछले करीब डेढ़-दो साल में समूचा विश्व आॅनलाइन और सूचना के संप्रेषण से सूचनाओं का आदान प्रदान कर रहा था और यह सिलसिला अब भी जारी है। यह हिंदी का नया दमखम और चेहरा भी है, जिसमें यह समूचे विश्व की अन्य भाषाओं के साथ अपनी एक नई पहचान और भाषा के आधार पर एक नई दुनिया को इस तरह से बना रही है कि अब यह भाषा भी तकनीकी भाषा और सूचना प्रसारण माध्यमों के सभी के सभी माध्यमों द्वारा सोची-समझी एवं पठन-पाठन के साथ-साथ शिक्षा और शिक्षण का एक नया आधार भी बन गई है। इस विकास को हम गांव से महानगरों में आ रही नई भाषा के साथ समाहित करके जब देखते हैं, तब पता चलता है कि आने वाले दिनों का यह बदलाव भाषा का एक नया यथार्थ भरा सामरिक विकास चेहरा है और शायद इस बहाने यह भी तय है कि इस तकनीकी संप्रेषण शक्ति से दुनिया की समस्त भाषाएं, जिनमें हिंदी भी शामिल है, कितने त्वरित माध्यमों से बदलती जा रही है और लोग अब इसे अपनाने भी लगे हैं।

अब इस माध्यम और आभासी दुनिया से शहर और गांव की दूरी सिमट गई है। कहीं न कहीं यह कहना भी ठीक है कि अब दादा-नानी और मां की भाषा हर आदमी की भाषा का सलीका लिए एक नई दुनिया की ओर अग्रसर हो रही है और यही बदलाव भाषा को नए बदलाव से गुजरते हुए एक नई दुनिया और नई आशाओं के साथ कदमताल का सुर ताल बना रहा है। अब नई हिंदी गांव की हिंदी नहीं रही है और वह शहर की हिंदी और वैश्विक स्तर की हिंदी हो गई है। हालांकि गांव में अब भी इन भाषाओं का एक ऐसा रूप हमारे सामने है, जहां दादी-नानी की भाषा अभी भी जिंदा है। अब समय है हिंदी के इस परिवर्तन के दौर को स्वीकार करने की और यह मानकर चलने की कि अगली पीढ़ी की नई हिंदी ही होगी, जिसमें यह स्वीकार करना होगा कि यह भाषा उस बहते दरिया की तरह है जो समंदर में खत्म हो जाता है। भाषा का, विशेषकर हिंदी का यह दरिया देश को जोड़ने और गांव की विरासत और उसके रिश्ते को नए नजरिए से देखने का भी प्रयोजनमूलक स्वरूप है।

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