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शिकायत की भाषा

दिल्ली वाले यों तो हर काम में अन्य शहर वालों से दो कदम आगे चलते हैं, लेकिन एक चीज में दिल्ली अंग्रेजों के जमाने से नहीं बदली। यह बात दिल्ली के पुलिसकर्मियों की है..

Author नई दिल्ली | November 4, 2015 9:43 PM

दिल्ली वाले यों तो हर काम में अन्य शहर वालों से दो कदम आगे चलते हैं, लेकिन एक चीज में दिल्ली अंग्रेजों के जमाने से नहीं बदली। यह बात दिल्ली के पुलिसकर्मियों की है। मैं यहां बात पुलिस के जनता के साथ व्यवहार की नहीं कर रहा। बल्कि यहां समस्या दूसरी ही है। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले दिल्ली में आइपीसी यानी इंडियन पीनल कोड (भारतीय दंड संहिता) लागू हुआ था, जिसके तहत कोई भी अपनी शिकायत थाने में दर्ज करा सकता था। उस समय भारत में ब्रिटिश राज था और तब आइपीसी को लागू करना भारत के लिए अपने आप में गौरव की बात थी। उस समय बहुत सारे लोग उर्दू या फारसी का प्रयोग करते थे या कम से कम समझ सकते थे। इसलिए सभी कागजी काम भी इन्हीं भाषाओं में किए जाते थे। इकतीस जनवरी 1861 को दिल्ली के सदर बाजार थाने में इतिहास की पहली लिखित शिकायत दर्ज की गई थी। वह मुकदमा कुछ इस तरह लिखा गया था, जिसमें उर्दू और फारसी शब्दों की भरमार थी।

तब से डेढ़ सदी से भी अधिक समय बीत गया, लेकिन आज भी राजधानी के लगभग सभी पुलिस स्टेशनों में उसी भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। आज के साधारण लोगों की तो दूर, नई भर्ती वाले पुलिसकर्मियों को भी इसके कारण परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि शुरुआत में इसके कारण थोड़ी दिक्कत हमें भी हुई थी, लेकिन काम करते-करते इसकी आदत पड़ गई। आज उर्दू भाषा में रिपोर्ट लिख तो ली जाती है, लेकिन कई अधिकारियों को अधिकतर शब्दों का मतलब नहीं पता है।

दूसरी ओर, नई भर्ती वाले पुलिसकर्मियों की मानें तो दिल्ली पुलिस की ट्रेनिंग के दौरान मुश्किल शब्दों का अर्थ और व्यवहार नहीं बताया जाता। इनके मुताबिक, वरिष्ठ अधिकारी या पुलिसकर्मी समझाते हैं कि जैसे वे लिख रहे हैं, वैसे ही तुम भी सीख जाओगे। नतीजा यह होता है कि न तो उन्हें ये रिपोर्ट समझ आती है और न शिकायत दर्ज कराने आए लोगों को! हाल ही में दिल्ली हाइकोर्ट में जूनियर पुलिसकर्मियों की ओर से एक मामला दाखिल किया गया है, जिसमें उन्होंने खालिस और जटिल उर्दू भाषा में एफआइआर लिखने की व्यवस्था में बदलाव की मांग की है।

इसके दूसरे पहलू पर नजर डालें तो वरिष्ठ अधिकारी इसे जारी रखना चाहते हैं। उनका मानना है कि फारसी और उर्दू शब्दों को बरकरार रखना चाहिए क्योंकि इन भाषाओं का एक शब्द पूरे वाक्य को समझा देता है। वे नए शामिल हुए रंगरूटों को सलाह देते हैं कि इस परंपरा का विरोध न करें, बल्कि इसे अपनाएं। दिल्ली पुलिस की एफआइआर में इमरोज मन, तहरीर, पुलंदा, हजा, बगर्ज जैसे शब्दों का काफी प्रयोग किया जाता है जो किसी नए आदमी के लिए समझना नामुमकिन-सा लगता है। लेकिन लंबे वक्त तक इन शब्दों का इस्तेमाल करने और सहज रहने की वजह से पुलिस महकमा भी इसको बदलने के खिलाफ है। लेकिन मेरा मानना है कि समय के साथ चलना अच्छा होता है। अगर प्राथमिकी में आसान भाषा का प्रयोग हो तो न सिर्फ नए पुलिसकर्मियों को इस मसले पर राहत मिलेगी, बल्कि साधारण लोगों को भी अपनी एफआइआर को समझने में आसानी होगी।

पिछले दिनों दिल्ली के एक थाने में दर्ज एक एफआइआर देखने का मौका मिला। उसमें एक पंक्ति यह थी कि ‘डीओ साहब, मजरुब गंगेश (बदला हुआ नाम) जेरे इलाज मिला, जिससे पूछताछ अमल में लाई, जिसने अपना बयान तहरीर कराया जो बयान बाला-हालात से मुलाहजा एमएलसी से सरेदस्त सूरत जुर्म दफा 307 का सरजद होना पाया जाता है। लिहाजा तहरीर हजा बगर्ज कायमी मुकदमा दर्ज करके इत्तिला दी जावे।’ यह उर्दू न जानने-समझने वाले किसी भी आदमी की समझ से परे है। वास्तव में यही एफआइआर कुछ इस अंदाज में लिखी जानी चाहिए थी- ‘डीओ साहब, गंगेश नामक व्यक्ति ने अपनी कंपलेंट दर्ज कराई, जिसमें उसने एमएलसी के खिलाफ धारा 307 के तहत मुकदमा दर्ज कराया। शिकायत की पूरी जानकारी मैं आपको डाक द्वारा भेज रहा हूं।’

इस तरह से लिखी शिकायत को कोई भी समझ सकता है। गैर-उर्दूभाषी साधारण लोगों लिए क्लिष्ट उर्दू समझना बहुत मुश्किल है। अब इस मसले पर दायर याचिका पर अदालत क्या फैसला देती है यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन कोई फैसला लेते वक्त साधारण लोगों और निचले पदों पर काम करने वाले पुलिसकर्मियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। क्योंकि न्याय की उम्मीद तभी तक सार्थक है, जब इसकी भाषा आम लोगों को भी समझ में आए। (मोहित जैन)

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