भाषा का बहता नीर

कोरोना काल में बंदी के कारण बहुत से लोग यहां से वहां हो गए।

लॉकडाउन के दौरान पैदल घर जाने को मजबूर लोग। फाइल फोटो।

हेमंत कुमार पारीक

कोरोना काल में बंदी के कारण बहुत से लोग यहां से वहां हो गए। कुछ अपने गांव चले गए तो लौटे ही नहीं। बंदी के उस दौर में सबसे ज्यादा प्रभावित हुए तो दिहाड़ी मजदूर और घरों में काम करने वाली बाइयां। कइयों के तो खाने के लाले पड़ गए। बहुत सारे लोग रोजगार के लिए गांवों से शहर आते हैं। झुग्गियों में रह कर अपने बाल-बच्चों का पालन-पोषण करते और बच्चों को शिक्षा-दीक्षा दिलवाते हैं। वे महामारी के दौरान पलायन कर गए। उस समय घर के सारे कामकाज स्वत: परिवार के सदस्यों को करने पड़े। बंदी के पहले सुबह-सुबह झुंड के झुंड दिखाई पड़ते थे। बंदी खुलने के बाद आजकल बहुत से नए चेहरे देखने को मिल रहे हैं। उन्हीं में से एक कामवाली बाई मेरे घर आती है। सागर से है। अपनी बोली बोलती है। एक दिन बातों-बातों में उसने ‘टेर’ शब्द का प्रयोग किया। पत्नी को यह शब्द समझ नहीं आया। मैंने हंसते हुए बताया कि टेर का मतलब आवाज देकर बुलाना होता है। टेरना यानी पुकारना। चूंकि मैं जिस इलाके में पला-बढ़ा, वहां भी क्षेत्रीय भाषा बोली जाती है। वहां टेर शब्द का प्रयोग ग्रामीण भी करते हैं। कुछ अलग है, मगर बोली मधुर है।

हमारे देश में हर सौ कोस पर क्षेत्रीय भाषा में थोड़ा-बहुत अंतर तो आता ही है। कोस कोस पर बदले पानी, चार कोस पर बानी- कहावत भी तो है। इस प्रकार हमारे शहर में कई क्षेत्रीय भाषाएं बोली जाती हैं। हिंदी में शब्दों के अपभ्रंश हो जाते हैं। और यहां तो शहर में अलग-अलग जगहों से आकर लोग रह रहे हैं। कुछ निमाड़ी हैं, कुछ मालवी और कुछ बुंदेलखंडी। सबके अपने-अपने समूह हैं। इस प्रकार विभिन्न बोलियां सुनने को मिलती हैं। लेकिन इन सबके केंद्र में हिंदी भाषा तो है ही। ऐसे जैसे हिंदी के वट वृक्ष की अलग-अलग शाखाएं हैं। इससे अनेकता में एकता प्रदर्शित होती है।

मुझे याद आता है, पहले हिंदी कक्षा एक से पढ़ाई जाती थी। केजी वन, केजी टू वाली संस्कृति नहीं थी। नगरपालिका के सौजन्य से गांव में एक बालमंदिर जरूर था। वहां अधिकतर पढ़े-लिखे, नौकरी-पेशा और धनाढ्य वर्ग के बच्चे ही पढ़ते थे। असल पढ़ाई तो पांच वर्ष की उम्र के बाद शुरू होती थी। मगर हिंदी भाषा की पढ़ाई कक्षा पहली से प्रारंभ हो जाती थी। शुरुआत बारहखड़ी से होती थी। स्लेट-पट््टी और खड़िया से पढ़ाई होती थी। मुझे आश्चर्य होता है कि उस उम्र में अध्यापकों के पढ़ाए हिंदी के पाठ आज भी आंशिक रूप से मुझे याद हैं। पहली या दूसरी कक्षा में पढ़ाया गया पाठ ‘भारत माता’ का एक अंश इस प्रकार है- लोट रहा सागर चरणों में सिर पर मुकुट हिमालय, जन्मभूमि हम सबको प्यारी, बोलो भारत माता की जय….।

हिंदी विषय पहली कक्षा से शुरू होकर हाईस्कूल तक पढ़ाया जाता था। वहीं अंग्रेजी छठवीं कक्षा से शुरू होती थी। मगर अब सब उल्टा-पुल्टा हो गया है। अब अंग्रेजी केजी वन से शुरू हो जाती है और विषय के रूप में हिंदी छठवीं से पढ़ाई जाती है। उस वक्त व्याकरण और वर्तनी पर विशेष ध्यान दिया जाता था। मगर मोबाइल के इस दौर में रोमन में शार्टकट हिंदी लिखी जा रही है। कुछ दिन पहले एक दफ्तर के सामने ‘सुखी परिवार’ की जगह ‘सूखी परिवार’ लिखा पढ़ कर दुख हुआ। आज हिंदी के प्रति उदासीनता के चलते क्षेत्रीय बोलियां भी विलुप्ति के कगार पर हैं। कारण कि अंग्रेजी की हिंदी भाषा में घुसपैठ ने हिंदी को हाशिए पर ला पटका है। वर्तमान दौर के इलेक्ट्रॉनिक युग में सामान्य बोलचाल में अंग्रेजी के शब्दों का चलन तेजी से बढ़ा है। और ये शब्द हिंदी में इस तरह घुल-मिल गए हैं कि अब इन्हें हिंदी भाषा से अलग करना नामुमकिन है।

कुछ वर्ष पूर्व मेरी बेटी ने कॉलेज में प्रवेश लिया था। किसी विषय पर बात करते-करते मैंने ‘छत्तीस’ कहा तो उसने तुरंत पूछा, पापा, यह छत्तीस क्या होता है? मुझे झटका लगा। बेटी को क्या कहता? बदलाव का दौर है। कंप्यूटर युग है। इसमें सभी कुछ अंग्रेजी है। मैकाले ने भी नहीं सोचा होगा कि जो कार्य उसने किया, उसे उसकी आने वाली पीढ़ी ने इतना आगे बढ़ा दिया है कि अब पीछे लौटने का सवाल ही नहीं उठता। कुछ उसने किया, कुछ हमने अपने हाथों कर डाला। फिर भी मैंने अपनी बेटी को बता दिया कि छत्तीस का मतलब अंग्रेजी में थर्टी सिक्स होता है। लेकिन बारहखड़ी के बारे में क्या कहता? आज अंग्रेजी हिंदी के उस वट वृक्ष की जड़ों तक खाद-पानी के रूप में पहुंच चुकी है। ट्रोल, ट्विटर, इंस्टाग्राम, फेसबुक जैसे शब्द सामान्य वार्तालाप में घुसपैठ कर चुके हैं कि अब हिंदी को हिंग्लिश कहने में कोई संकोच नहीं होता।

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