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दुनिया मेरे आगेः जन्नत बरास्ते कुट्टू का आटा

कुट्टू की प्रशस्ति में इतना कुछ कहने के बाद अंत में क्यों न अपने मन की बात भी कह डालूं। जब कुल मिला कर नवरात्रि के नौ दिनों में ही कुट्टू खाने का इरादा हो तो वजन घटाने और बुरे कोलेस्ट्राल की चिंता कैसी!

नवरात्रि में अचानक इतना लोकप्रिय हो जाने वाला कुट्टू वास्तव में एक पौधे पर लगने वाला फल है।

अरुणेंद्र नाथ वर्मा

परंपरा के मुताबिक हर साल कलाई पर राखी बांधे जाने के साथ ही शुरू हो जाती है उत्सवों की एक लंबी शृंखला, जिसकी हर कड़ी के साथ पकवानों का स्वाद भी नत्थी रहता है। हमारे रहन-सहन, खान-पान सभी बदल रहे हैं, तभी तो किसी बच्चे के आखिर परीक्षा में पास हो जाने की खुशी में लड्डू नहीं, बल्कि किसी विशिष्ट ब्रांड की चॉकलेट खिलाने की बात की जाती है। हालांकि हमारे घर-परिवारों में धार्मिक अनुष्ठानों को मनाने के लिए विशेष व्यंजन बनाने की पारंपरिक शैलियों में फेरबदल करना किसी को नहीं सुहाता, फिर भी, दिवाली हो या होली, सब उत्सवों के आयोजन में थोड़ी नफासत का समावेश होता जाता है। होली के अवसर पर घर-घर में बनाई जाने वाली गुझिया अब सामान्य मिठाई के रूप में मिठाई की बड़ी दुकानों पर साल भर मिलती है, लेकिन रस में भीगी, मेवा से भरी ऐसी गुझिया घर परिवारों में होली के व्यंजन के रूप में बनी गुझिया से अलग होती है।

आमतौर पर धार्मिक आयोजनों से संबद्ध पकवानों में विशेष फेरबदल नहीं किया जाता है। जन्माष्टमी के अवसर पर दूध-दही मिश्री और मेवे से बना हुआ चरणामृत प्रसाद में देने की जगह महंगा डिब्बाबंद फलों का जूस देने का भोलापन कौन करेगा! चरणामृत के बाद मिलने वाली पंजीरी और पगी हुई नारियल, मखाने, चिरौंजी आदि वाली घरेलू मिठाइयों की जगह रसगुल्ला गुलाब-जामुन कैसे ले सकते हैं! मोदक प्रिय गणेश जी को गणेश चतुर्थी के अवसर पर मोदक की जगह महंगी से महंगी ब्राउनी पुडिंग खिलाने की कल्पना स्वयं खालिस कॉन्वेंटी सांचे में ढले लोग भी नहीं करेंगे।

हर अवसर के लिए पकवान विशिष्ट हों तो उनके साथ जुड़ी पवित्रता का अहसास करने के लिए विशिष्ट किस्म का उपवास और फलाहार की शैली भी विकसित हो जाती है। कुछ इसी भावना के साथ नवरात्रि के दिनों में तन-मन-वचन की शुद्धता बनाए रखने की चाहत में फलाहार के लिए कुट्टू के आटे से बने व्यंजन बनाने की परिपाटी जीवित है। विशिष्ट उत्सवों को विशिष्ट व्यंजनों से जोड़ने की परंपरा सभी धर्मों में है। ईद के अवसर पर सिवई का महत्त्व है तो क्रिसमस डिनर में टर्की पक्षी के मांस और क्रिसमस केक का। लेकिन तन-मन की शुद्धता बनाने के लिए किए गए उपवास को तोड़ने के लिए विशेष खाद्य का जो प्रावधान इस्लामी त्योहारों में खजूर के उपयोग में दिखता है, वही हिंदू धर्मावलंबियों के फलाहार आदि से जुड़े विशेष व्यंजनों में नजर आता है। नवरात्रि के संदर्भ में कुट्टू के आटे की पूरी या पराठे का ध्यान सबको आता है, लेकिन इतने लोकप्रिय आहार के बारे में उसे खाने वालों को बहुत कम जानकारी है। मेरे प्रश्न के जवाब में परिवार की नई पीढ़ी ने अनुमान लगाया कि वह एक प्रकार का फल होता होगा, जिसे खाना फलाहार समझा जाता होगा। लेकिन उसका पेड़ कैसा होता है, यह पूछने पर सबके विकेट उड़ गए। एकाध ने अंग्रेजी ज्ञान का सहारा लेते हुए कहा कि उसे अंग्रेजी में ‘बकवीट’ कहते हैं, इसलिए वह गेहूं की प्रजाति होगी, जिसे हिरण खाते होंगे।

नवरात्रि में अचानक इतना लोकप्रिय हो जाने वाला कुट्टू वास्तव में एक पौधे पर लगने वाला फल है। अंग्रेजी में ‘बकवीट’ कहे जाने के बावजूद वह किसी प्रकार की घास या अनाज नहीं है। तिकोने आकार के फल देने वाला यह पौधा चीन, जापान, युक्रेन, कजाकिस्तान, अमेरिका आदि के अलावा भारत के उप-हिमालयी क्षेत्र यानी जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड में और दक्षिण में नीलगिरी पर्वत के निकट पाया जाता है। कुट्टू के फल को पीस कर उसका आटा बनाया जाता है। शुद्धता बनाए रखने के लिए घर में ही उसके बीज पीस कर आटा बनाने वाले अक्सर उसका स्वाद बढ़ाने के लिए उसमें ताल मखाना मिला देते हैं। मखाना भी अनाज नहीं, फल ही है, इसलिए अनाज खाने की जगह फलाहार का उपक्रम सफल भी रहता है और स्वादिष्ट भी। आयुर्वेद में वर्णित कुट्टू के गुणों का आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी समर्थन करता है। कुट्टू में तीन चौथाई जटिल कार्बोहाइड्रेट और एक चौथाई उच्च गुणवत्ता की प्रोटीन के साथ-साथ अल्फा लाइनोलेनिक एसिड होता है, जो वजन और हानिकारक कोलेस्ट्राल कम करने में सहायक होता है।

कुट्टू की प्रशस्ति में इतना कुछ कहने के बाद अंत में क्यों न अपने मन की बात भी कह डालूं। जब कुल मिला कर नवरात्रि के नौ दिनों में ही कुट्टू खाने का इरादा हो तो वजन घटाने और बुरे कोलेस्ट्राल की चिंता कैसी! क्यों न कुट्टू के आटे में पिसा मखाना मिला कर उसकी स्वादिष्ट पूरी भरपेट खाई जाए, रंग और चोखा करने को साथ की सब्जी में समुद्री नमक की जगह सेंधा नमक डाला जाए और अंत में सिंघाड़े के आटे का शुद्ध घी वाला हलवा जी भर कर खाने के बाद कहा जाए कि इस फलाहार से तन-मन और विचारों की शुद्धता बना कर रखी मैंने। यानी ‘रिंद का रिंद रहा हाथ से जन्नत न गई’!

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