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दुनिया मेरे आगे: विरह-गीतों के पंछी

एक दिन आॅटोरिक्शा से एक जगह जा रहा था तो उसमें चल रहे लोकगीत ‘सुपुनो जगाई आधी रात में, तनै मैं बताऊं मन की बात, कुरजां ए हारे भंवर (पति) मिलाय दे, संदेशों हारै पीव ने पुगाय दे, पूछे कुरजां हारे गांव की लागे धरम की बाण (बहिन), संदेशों हारे पीव ने पुगाय दे रै।’

Author Updated: January 14, 2021 6:08 AM
Birdsसांकेतिक फोटो।

बृजमोहन आचार्य

इस गीत को सुनते ही कुरजां के महत्त्व को याद करने लगा। सोचने लगा कि कुछ देशों में स्थायी निवास करने वाली इस कुरजां का महत्त्व शायद ही उसके देशों में हो।

लेकिन हमारे देश के लोकगीतों में कुरजां को विरह के दौरान याद किया जाता है। कुरजां दरअसल एक ऐसा पक्षी है जो नायिका की विरह वेदना को समझती है। इसीलिए उससे कोई महिला अपने पति या प्रेमी को संदेश पहुंचाने का आग्रह करती है। न केवल कुरजां, बल्कि अन्य कई ऐसे पक्षी हैं जिन्हें विरह के गीतों में पात्र बना कर गाया जाता है… जिससे संदेश पहुंचाने का आग्रह किया जाता है।

सात समंदर पार से आने वाली कुरजां यानी डेमोसाइल क्रेन को विरह के लोकगीतों में पक्षियों के माध्यम से ही अपने प्रिय को याद किया जाता है। वैसे तो कुरजां साइबेरिया, चीन, अफगानिस्तान, कजाकिस्तान सहित कई देशों में अपने घोंसले बनाती है और वहीं इनका स्थायी रहवास होता है।

लेकिन सर्दी के मौसम में इन देशों में जबर्दस्त बर्फबारी होने के कारण शांत और लंबी गर्दन वाले ये पक्षी अपने वतन से पंख फैला कर मैदानी इलाकों वाले स्थानों पर कलरव करने पहुंच जाती है। ये जहां पहुंचती हैं, वहां का वातावरण सौम्य हो जाता है। हजारों किलोमीटर दूर से उड़ कर आने वाले कुरजां को अपने देश में मेहमान की तरह रखा जाता है। यहां पर ये झुंड में पानी वाले स्थान और घास वाले मैदानी इलाकों में कलरव करती हैं।

एक अनुमान के मुताबिक छब्बीस हजार फुट ऊंची उड़ान भर कर कुरजां अपने देश में पहुंचती हैं। इनका अधिकतर प्रवास पश्चिमी राजस्थान के इलाकों में ही रहता है। करीब छह माह तक ये विदेशी पक्षी अपने देश की शोभा बढ़ाते हैं और वापस अपने वतन की ओर उड़ान भर लेते हैं।

सितंबर में इन पक्षियों के झुंड आकाश में नजर आने लगते हैं और वे मार्च में वापस अपने वतन की ओर पंख फैलाए चले जाते हैं। शायद विदेशी पक्षी होने के कारण ही इन्हें लोकगीतों में स्थान दिया गया है, क्योंकि पति कमाने के लिए अपना देश छोड़ कर विदेश चला जाता है, तब पत्नी विदेश से आए कुरजां के माध्यम से ही अपने पति के हालचाल पूछती है।

शीतकाल के दौरान कुरजां के अपने देश में बर्फ गिरने के कारण उनके लिए भारत, विशेष तौर पर पश्चिमी राजस्थान का वातावरण इनके लिए अनुकूल रहता है। इनका वजन करीब ढाई से तीन किलोग्राम तक होता है और उनकी गर्दन भी लंबी होती है। इनकी विशेषता है कि ये झुंड में ही प्रवास करती हैं और झुंड में ही उड़ान भरती हैं।

कुरजां की अठखेलियां और पानी में भोजन के लिए डुबकी मारने के वक्त सैलानी उन्हें अपने कैमरों में कैद भी करते हैं। कुरजां के अलावा सात समंदर पार से गिद्ध भी बड़ी संख्या में अपने देश को छोड़ कर भारत की जमीन पर आते हैं। ये पक्षी कुरजां की तरह छह माह तक यहां प्रवास कर वापस अपने वतन की ओर चले जाते हैं।

कुरजां के अलावा अन्य पक्षियों को भी लोकगीतों में महत्त्व दिया गया है। हालांकि कौवे को आमतौर पर श्राद्ध पक्ष में ही पूछा जाता है और उन्हें भोजन करवा कर लोग संतोष करते हैं कि उन्होंने अपने पूर्वजों ने भोजन कर लिया। लेकिन विरह के गीतों में अपने पति या प्रेमी को संदेश देने के लिए पत्नी इसके महत्त्व को भी दर्शाती है।

विरह के लोकगीतों में कौवे के लिए सोने की चोंच बनाने, पैरों में घुंघरू बांधने और खीर का भोजन करने का आग्रह किया गया है। एक लोकगीत में बोल हैं- ‘उड़-उड़ रै हारा काला रै कागला, जद हारा पीवजी घर आवै, खीर खांड का जीमण जिमाऊ, सोने की चौंच मंढाऊ कागा, जद हारा पीवजी घर आवै।’

यानी कौवे जैसे पक्षी को भी लोकगीत के माध्यम से महत्त्व दिया गया है। इसके अलावा राष्ट्रीय पक्षी मोर के महत्त्व को भी कम नहीं आंका गया है। राजस्थान में गाए जाने वाले लोकगीतों में ‘मोरिया आच्छो बौल्यो रै ढलती रात मा, हारा पीवजी बसै हैं परदेस मोरिया, पीव-पीव री वाणी छोड़ दे।’

जाहिर है, एक प्रकार से पक्षियों के महत्त्व को दर्शाने के लिए लोकगीतों में उनका उल्लेख किया गया है। लेकिन आज अगर देखा जाए तो अक्सर बर्ड फ्लू की मार के अलावा पक्षियों एवं पशुओं का शिकार भी किया जा रहा है। शिकारी पक्षियों को मार कर बड़े-बड़े होटलों में महंगे दामों पर बेचते हैं। इस वजह से पक्षियों की संख्या में भी गिरावट होने लगी है।

अगर पक्षियों तथा वन्य जीवों के शिकार पर अंकुश लगाना होगा तो कड़ा कानून बनाना होगा। हालांकि शिकार की रोकथाम के लिए कानून बना हुआ है, लेकिन इसमें ढिलाई होने के कारण शिकारी बच निकलते हैं। साथ ही स्कूली शिक्षा में भी पक्षियों के महत्त्व को पढ़ाया जाना चाहिए।

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