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दुनिया मेरे आगेः ज्ञान और पढ़ाई

मनुष्य होने का एक सबसे प्रतीकात्मक लक्षण चिंतनशील होना है। बाकी तो जीवन, भूख, आत्मा, काम और कर्म पशुओं में भी होते हैं। चिंतनशील होना कर्म की गुणवत्ता और उसकी दिशा पर आत्मविश्लेषण करने का एक रास्ता है।

Author May 7, 2016 2:03 AM
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

मनुष्य होने का एक सबसे प्रतीकात्मक लक्षण चिंतनशील होना है। बाकी तो जीवन, भूख, आत्मा, काम और कर्म पशुओं में भी होते हैं। चिंतनशील होना कर्म की गुणवत्ता और उसकी दिशा पर आत्मविश्लेषण करने का एक रास्ता है। चिंतन की प्रगति अंधेरे कमरों के बीच रोशनदान खोलने का एक साधन है। और इस प्रक्रिया में वैचारिकी का निर्माण और उसके संप्रेषण और संवाद का एक सबसे सुगम जरिया हैं किताबें। हर किताब कुछ कहती है- नया-पुराना, परंपरा-परिवर्तन, राग-विराग, प्रत्यय-उपसर्ग और यह चलता रहता है। आप क्या पढ़ते हैं और क्या पढ़ना पसंद करते हैं, उसके माध्यम से आपके बारे में बहुत कुछ पता लगाया जा सकता है। आप साहित्य में रूमानियत ढूंढ़ते हैं या यथार्थ की यातनाएं या फिर यथार्थ को रूमानियत की चाशनी में परोसे जाने के पक्षधर हैं। फिक्शन या सत्य के मध्य संवाद चाहते हैं या दोनों को नकार कर किसी और ही जज्बे की चाह रखते हैं, यह सब किताबों को पढ़ने की असीम संभावनाओं की देन है।

हम पढ़ते हैं, क्योंकि हमें अपनी मौलिकता गढ़नी होती है। हमें यह कहते हुए एक आत्मसम्मान और गर्व की अनुभूति होती है कि किसी भी मुद्दे पर हमारे विचार क्या हैं। जो विचार में अपनी मौलिकता का दावा पेश नहीं कर पाते, वे इसे दूसरों से उधार ले लेते हैं, कभी स्रोत बता कर और कभी बिना बताए। लेकिन जिसे हम अपनी विश्व-दृष्टि कहते नहीं थकते, क्या वह बस किताबों से निर्मित होती है? क्या उसमें समाज और संस्कृति का एक बड़ा योगदान नहीं है?

इस पर सबके अपने ‘मौलिक’ विचार हो सकते हैं। मेरा मानना है कि विचार इतिहास में निर्मित होता है और इसका निर्माण एक प्रक्रिया है, जो निरंतर चलती रहती है। जिन विचारों के लिए यह प्रक्रिया रुक जाती है, हम उनकी बातें कम करते हैं। फिर से हमारी समकालीन राजनीति किन विचारों से संचालित होती हैं, इससे भी उनकी केंद्रीयता का अनुमान लगाया जा सकता है। उत्तर-औपनिवेशिक भारत में नेहरूवादी विचार के वर्चस्व के मध्य आज संघ का विचार फिर से केंद्र में है, क्योंकि आज की राजनीति अब वहां स्थापित है।

अगर एक बड़ी पेचीदा प्रक्रिया को संक्षेप में सरल करें, तो हम जिन किताबों के माध्यम से अपने मौलिक विचार गढ़ते हैं, वे हमारे हैं ही नहीं। हमारे सामने होते हैं कुछ चार-पांच वर्चस्व-विचार, जिनका निर्माण इतिहास के विभिन्न चरणों में हुआ है और हम उनके एक अभिन्न अंग हैं। हमें बस इतनी स्वतंत्रता है कि हम एक विचार के वर्चस्व को स्वीकार करें और दूसरे से अलग होने का दावा करें। हमें बस एक विचार से सहमत या असहमत होने की छूट है, उनसे बाहर जाकर विचरण करने की नहीं। और इस सहमति या असहमति का इतिहास हमारे लिए एक आत्मकथा है। हमारा समाजीकरण, संस्कृति की संरचनाएं और वर्ग-जाति की पृष्ठभूमि इस विचार की आत्मकथा का निर्माण करती है।
हम प्रयत्न करते हैं कि ‘हेजेमनी’ या नायकत्व को तोड़ बहार हो जाएं।

लेकिन क्या एक ‘हेजेमनी’ का टूटना दूसरे के निर्माण का आरंभ नहीं है? हमने पढ़ा है कि कैसे हमारे ‘ग्रेट मैन इतिहास दृष्टि’ में नेतृत्व अलग-अलग लेखकों को पढ़ कर नए समाज की रचना कर पाने को प्रेरित हुए। फ्रांसीसी क्रांति में रूसो, मोंतेस्क्यु और वाल्टेयर का नाम लेना हम नहीं भूलते। लेकिन क्या ‘अंसिएं रेजीम’ से बाहर आधुनिक समाज में उतनी ही खुशहाली का दावा कर पाना न्यायोचित लगता है? क्या पाश्चात्य की आधुनिकता ने एक स्वावलंबी और शांत-समृद्ध समाज का निर्माण किया है? तो क्या विचारों के बीच संवाद बस इन्हीं मायनों में सफल है कि वे एक मताधिकार के लिए हमें आमंत्रित करते हैं? जो आज बेस्ट-सेलर है, कल रहे न रहे! जिसे जो चुनना हो, चुन लें।

किताबें हमारे अज्ञान तभी दूर कर सकती हैं, जब यह मताधिकार की प्रक्रिया बस एक का दूसरे के ऊपर चुनाव से अधिक कुछ और बन जाए। एक ऐसी धरा, जहां रामायण के साथ फूको की बात करना हास्यास्पद न हो। जहां मार्क्स के साथ हिंदू मत को भी एक संवाद में समझा जा सके। विचारों का एकाकीपन संसार में रहते हुए संत होने के लिए ठीक है, संसारी होने के लिए नहीं। अब टेक्स्ट, कॉन्टेक्स्ट और अंतर-टेक्स्ट प्रक्रिया से ही होकर किसी भी उद्धार का कारण बन सकती है। किसी भी विचार को उसकी कुछ इकाइयों के लिए नकार देना सड़क की राजनीति हो सकती है, ज्ञान के लिए श्रमदान नहीं। इसलिए विचारों की मौलिकता तभी बनेगी जब किसी एक विचार के वर्चस्व को तोड़, उसमें और धाराओं को आमंत्रित कर उसे और विस्तृत बनाया जाए।

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