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उनके पास वक्त न हुआ

किरण बेदी समय पर ही बाहर आर्इं। इतनी तेजी से घर से निकलीं कि दुआ-सलाम का भी ठीक से वक्त नहीं मिला। हम उनके साथ-साथ, बल्कि पीछे-पीछे भागते चले गए। यों इस उम्र में भी उनकी फुर्ती देख कर अच्छा लगा। मेरा पहला सवाल यही था कि क्या आप राजनीति में खुद को फिट महसूस […]

Author January 30, 2015 3:17 PM
Delhi Election: पूर्व पुलिस अधिकारी ने कहा कि अन्ना आंदोलन के दौरान भी उन्हें उनकी नकारात्मकता महसूस होती थी।(तस्वीर-पीटीआई)

किरण बेदी समय पर ही बाहर आर्इं। इतनी तेजी से घर से निकलीं कि दुआ-सलाम का भी ठीक से वक्त नहीं मिला। हम उनके साथ-साथ, बल्कि पीछे-पीछे भागते चले गए। यों इस उम्र में भी उनकी फुर्ती देख कर अच्छा लगा। मेरा पहला सवाल यही था कि क्या आप राजनीति में खुद को फिट महसूस करने लगी हैं? जवाब में किरण बेदी ने खुद को राजनीति विज्ञान का विद्यार्थी बताया।

मुझे हैरानी हुई कि राजनीति विज्ञान का विद्यार्थी और शिक्षक होने से ही क्या कोई व्यक्ति राजनेता बनने की गुणवत्ता रखता है या फिर इतनी जल्दी राजनीति में फिट हो जाता है। खैर, किरण बेदी इस जवाब के बहाने अपने अतीत में चली गर्इं। उन्हें लग रहा था कि अतीत में जाने से कोई उन पर सवाल नहीं कर सकता। उनका अतीत जरूर अच्छा रहा होगा, लेकिन राजनीति तो आज के सवालों पर नेता का नजरिया मांगती है।

इंटरव्यू के लिए मैंने बीस मिनट मांगे थे, लेकिन दस मिनट ही मिले। मुश्किल से बारह मिनट हुए। खैर, इस भरोसे शुरू कर दिया कि नेता एक बार कहते हैं, फिर इंटरव्यू जब होने लगता है तो पांच-दस मिनट और हो ही जाता है। मगर समय की पाबंद किरण बेदी बीच-बीच में घड़ी भी देखती रहीं और इंटरव्यू के बीच में मैं यह सोचने लगा कि प्राइम टाइम अब किसी और विषय पर करना होगा। सिर्फ किरण बेदी का इंटरव्यू चलाने का प्लान फेल हो चुका था। यह सब सोचते हुए मेरा ध्यान सवालों पर भी था। मेरे सवाल भी किरण बेदी के दिए वक्त की तरह फिसलते जा रहे थे। रात ढाई बजे तक जाग कर की गई सारी तैयारी अब उस कागज में दुबकने लगी, जिसे मैं कई बार मोड़ कर गोल कर चुका था।

हम दोनों भाग रहे थे। वे अपने वक्त और मैं अपने सवालों के कारण। सब पूछना था और सब जानना था। ऐसा कभी नहीं होता। आप पंद्रह मिनट में किसी नेता को नहीं जान सकते। किरण बेदी का पुलिसिया अंदाज देख कर हैरान था। इसलिए मैं बीच-बीच में ‘एक्सेलेंट’ बोल रहा था। मुलेठी का भी जिक्र किया। गला खराब होने पर मुलेठी खाई जाती है। देखने के लिए कि इस टोका-टाकी के बीच बेदी एक राजनेता की तरह बाहर आती हैं या अफसर की तरह। मुझे किरण बेदी में आज से बेहतर राजनेता का इंतजार रहेगा।

‘आपने इंदिरा गांधी की कार उठाई थी?’ उनका पीछा करते-करते यह सवाल क्यों निकल आया, पता नहीं। लेकिन किरण बेदी क्यों ठिठक गर्इं, यह भी पता नहीं। ‘नहीं, मैंने नहीं उठाई थी!’ बिजली की गति से मैं यह सोचने लगा कि तो फिर हमें बचपन से किसने बताया कि इंदिरा गांधी की कार किरण बेदी ने उठा ली थी! पब्लिक स्पेस में धारणा और तथ्य बहुरूपिये की तरह मौजूद होते हैं। अलग-अलग समय में इनके अलग-अलग रूप होते हैं। किरण बेदी ने कहा कि मैंने कार नहीं उठाई थी। निर्मल सिंह ने उठाई थी जो एसीपी होकर रिटायर हुए। तो फिर निर्मल सिंह हीरो क्यों नहीं बने? दुनिया निर्मल सिंह की तारीफ क्यों नहीं करती है? कोई राजनीतिक पार्टी निर्मल सिंह को टिकट क्यों नहीं देती है?

इंटरव्यू की कामयाबी यही रही कि एक पुराना तथ्य उन्हीं की जुबानी सार्वजनिक हो गया। किरण बेदी ने कहा कि कार निर्मल सिंह ने उठाई, मगर मैंने निर्मल सिंह पर कोई कार्रवाई नहीं की। मैंने कोई दबाव स्वीकार नहीं किया। पर सवाल उठता है कि पीएमओ की कार का चालान होने के लिए कोई किरण बेदी या निर्मल सिंह पर दबाव क्यों डालेगा! किरण बेदी ने खुद कहा कि वह कार इंदिरा गांधी यानी प्रधानमंत्री की नहीं थी। जिस वक्त निर्मल सिंह ने कार का चालान किया, उसमें इंदिरा गांधी नहीं थीं। जब मैंने किरण बेदी से पूछा कि क्या वह कार प्रधानमंत्री के काफिले में चलने वाली कार थी, तो जवाब मिला कि नहीं। फिर उन्होंने कहा कि कार पीएमओ की थी। कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि प्रधानमंत्री के दफ्तर में कितनी कारें होती होंगी।

बहुत दिनों से चला आ रहा एक मिथक टूट गया। अब हम इस सवाल के बाद फिर से भागने लगे। आखिरी सवाल था सूचना के अधिकार से जुड़ा, जिसकी चैंपियन किरण बेदी भी रही हैं। अरुणा राय, शेखर सिंह, अरविंद केजरीवाल, जयप्रकाश नारायण इस बात को लेकर लड़ते रहे हैं कि राजनीतिक दलों को बताना चाहिए कि उन्हें चंदा कौन देता है और कितने पैसे मिलते हैं। यह सवाल हम प्राइम टाइम में पूछा करते थे। ये सभी नाम, जिनमें किरण बेदी भी शामिल हैं, भाजपा और कांग्रेस पर खूब हमला करते थे। लेकिन भाजपा में आकर किरण बेदी ने तुरंत सर्टिफिकेट दे दिया कि पार्टी में फंडिंग की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी है।

मुझे यह भी पूछना चाहिए था कि क्या भाजपा अपने नेताओं को फंडिंग की प्रक्रिया की कोई फाइल दिखाती है? क्या किरण बेदी को ऐसी कोई फाइल दिखाई गई? पर खैर। जवाब यही मिला कि सूचना के अधिकार के तहत राजनीतिक दलों से चंदे और खर्चे का हिसाब मांगने के सवाल पर किरण बेदी पलट चुकी हैं।

 

रवीश कुमार

 

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