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अंधेरे दिनों के शहसवार

ज्यों-ज्यों महामारी भयावह होती गई, इसके खबरची और भी चाकचौबंद नजर आने लगे।

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सांकेतिक फोटो।

सुरेश सेठ

ज्यों-ज्यों महामारी भयावह होती गई, इसके खबरची और भी चाकचौबंद नजर आने लगे। हर नए दिन में आपके लिए नई खबर लेकर आते हैं। इन खबरों में मंत्री से संतरी तक सब उनके करीब रहते हैं। अभी एक और सिलसिला चल निकला। आज कौन है, जो महामारी से डर कर घरबंदी में मोबाइल, फेसबुक या ट्विटर से नहीं चिपका हुआ? यारों ने इनके खाते हैक कर लिए। इसी नाम से नए प्रशंसकों की जमात खड़ी कर ली। अब आपके पास से ऐसे-ऐसे संदेश जारी कर रहे हैं कि जिन्हें पढ़कर आपको लगता है, अरे ऐसा था मैं। ऐसा लफंगा, अश्लील या डरा हुआ आदमी।

अभी इसका स्वाद देश के एक महासामंत ने भी चख लिया। इन्होंने समाज सेवा से प्रतिबद्ध हो करोड़ों रुपए की थाती और अपना होटल महमारी से लड़ने के लिए दान दे दिया। अब इन्हीं के नाम और तस्वीर से इस संघर्ष में यारों ने उनके लिए बेचारगी भरे संदेश डाल दिए, और उन्हें प्रेरक कह रहे हैं। वे लाख कहते रहें, भई यह संदेश मेरा नहीं है, लेकिन पढ़ने वाले तो पढ़ गए। अब साबित कीजिए कि कौन-सा पढ़ा गया संदेश असली है, और कौन-सा नकली?

बरसों की खुंदक नकली फेसबुक खातों में निकाली जा रही है। आप सविनय प्रार्थना करते रहिए, ‘भई यह खाता मेरा नहीं है। मेरे खाते में तो मेरे बुढ़ापे की तस्वीर लगी है। ये लोग न जाने कहां से मेरी जवानी की तस्वीर इस खाते में मार लाए। इसमें तो मैं इतना बौड़म लगता हूं कि अपने गुजरे जमाने पर शर्मिंदा होने को जी चाहता है।’

आपको संदेश मिला कि भई बंदी के दिन हैं, विषाणुओं से डर कर घर में कुछ सृजनात्मक काम कीजिए। मगर लीजिए, यह दूसरों की इज्जत कचरा करने का सृजनात्मक काम होने लगा। अच्छे भले आदमी के मरने की खबर इस विश्वास से दे दी जाती है कि जैसे अभी यार उसकी शवयात्रा में शरीक होकर चले आ रहे हैं।

बाद में अगर कहीं वह मृत घोषित आदमी आपकी खैर-खबर पूछ ले, तो भौचक्क होकर जिंदा भूत देख लेने की कल्पना न कर लीजिएगा। उम्र भर जिनकी कभी किसी ने परवाह नहीं की, आज वही अतिरिक्त महत्त्व लेने के लिए खबरों का तंत्र-जाल रचते हैं। ‘फेक न्यूज’ का रचयिता कहे जाने पर वे आपको ही ‘फेक’ बता देते हैं। कौन है सच्चा, कौन है झूठा, इसकी पड़ताल कौन करेगा? हां, कहीं इनके भ्रम में आकर घरबंदी खुलने की खबर सच्ची मान ली, तो बाजार में जाकर बलमा सिपहिया से पीठ पर बेंत खानी पड़ सकती है।

लोगों को चेहरा बदलते इन्हीं दिनों में देखा जा सकता है। कल तक हद दर्जे के बमचख किस्म के इन्सान भी इन दिनों समाज सेवकों की श्रेणी में आ गए। वे मुफ्त लंगर बांटने से लेकर सूखा राशन और कपड़ा भी बांट रहे हैं। जो सच्ची समाज सेवा की भावना से आगे आए हैं, उनके प्रति हम असीम श्रद्धा रखते हैं, लेकिन इनमें से ही अगर किसी महानुभाव के बारे में यह खबर छप जाए कि वह अपनी लंगर सभा के नाम पर मात्र ग्यारह हजार रुपए लेकर कर्फ्यू पास बेच रहा था, तो ऐसे महानुभाव को आप समाज सेवा के किस दर्जे में रखेंगे? तो शायद ऐसे शातिर लोग हैं जो मौत से भी आंखें लड़ा कर अपने बदले रूप से उसे गच्चा देने में लगे हैं।

लीजिए, ऐसी खबरें भी यदा-कदा आने लगीं कि गरीबों में लंगर बांटने की चौधर को लेकर स्वनाम-धन्य नेताओं ने एक-दूसरे के बाल नोंच लिए या समाज सेवा करते हुए अपना चित्र न छपने पर इस नामाकूल काम में शिरकत न करने की घोषणा कर दी। अब तो कोई सही ढंग से दया-धर्म करने के लिए आगे आए तो यारों को यह भी फेक न्यूज-सा लगने लगता है।

माना कि इस विपदा से पूरी दुनिया कांप रही है, लेकिन ऐसे में कुछ लोग अगर भविष्यवक्ता बन कर इस आपदा को टालने के उपाय बताने लगें या अपने ज्योतिष के हिसाब से इसके बचाव के उपाय सुझाने लगें, तो समझ लीजिएगा कि इस महामारी की आड़ में यार लोग अपना धंधा जमाने में जुटे हैं। जिनका रहने-खाने का ठिकाना नहीं था, महामारी लंबी हो गई तो वे अपने लिए एकाध फ्लैट की किश्तें चुकाने में समर्थ हो जाएंगे।

बड़े बूढ़े कहते हैं कि बेटा, इसमें अजीब क्या? ऐसे धंधेबाज तो हर आपदा के समय अपने दिन चमकाने के लिए उभर ही आते हैं। अरे अरे, ऐसी असभ्य भाषा का प्रयोग न कीजिए। इससे बेहतर है, आप इन दिनों बहती गंगा में हाथ धो लीजिए। इससे आपके हाथ काले हो जाएंगे न, चिंता नहीं। यह गाली देने और खाने से तो बेहतर है और चेहरे पर कालिख न पुते, इसका भी ध्यान रख लिया गया है। फिर अब चिंता क्यों?

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