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दुनिया मेरे आगेः जमाने के लिए

सन् 2005 में इस्राइल के हिब्रू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में दयालुता और एक जीन में संबंध पाया। यह जीन डोपामाइन नामक ‘फील गुड न्यूरोट्रांसमीटर’ का मस्तिष्क में उत्सर्जन करता है।

दयालुता इंसान का एक बेहद महत्त्वपूर्ण गुण है।

शिखर चंद जैन

एक पुरानी फिल्म का गाना है- ‘अपने लिए जिए तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए।’ यह गाना आज के स्वार्थ प्रधान युग में वाकई जिंदगी को खुशगवार बनाने के लिए एक सार्थक संदेश देता है। संबंधों पर परामर्श के विशेषज्ञ, मनोचिकित्सक और समाजशास्त्री भी मानते हैं कि जरा-सी नरमदिली, दूसरों के प्रति सहानुभूति और दयालुता का भाव आपको जीवन में बहुत कुछ दे सकता है। इससे आपको खुशी, सफलता और समाज में इज्जत मिलती है। अपने नर्म, सहयोगी और दयालु स्वभाव के इजहार के लिए आपको बहुत बड़े-बड़े काम नहीं करने पड़ते। छोटी-छोटी आदतों या गतिविधियों से भी आप लोगों का दिल जीत सकते हैं। जैसे भीड़ भरी बस में किसी बुजुर्ग, महिला या स्कूल से लौटती बच्ची को अपनी सीट देकर, बिल जमा देने वाली लाइन में किसी परेशान व्यक्ति की मदद करके, रास्ते में जल्दी में दिख रहे किसी कार या बाइक सवार को आगे निकलने का रास्ता देकर, हाथ में भारी थैला लेकर व्यस्त सड़क को पार करने की कोशिश कर रहे किसी बुजुर्ग की सहायता करके आप अपनी नरमदिली का परिचय दे सकते हैं। इससे आपको भी दिल में सुकून और खुशी महसूस होगी।

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सोंजा ल्यूबोमिस्क्री ने एक अध्ययन के दौरान प्रतिभागियों से लगातार दस हफ्तों तक दयालुता और नरमदिली दर्शाने वाले काम करने को कहा। ये बहुत छोटे-छोटे काम थे। मसलन, किसी अजनबी के लिए दरवाजे को खोल कर पकड़े रखना, कमरे में अपने साथी के कपड़े समेट कर रख देना, थाली पर बैठे किसी व्यक्ति के लिए किचेन से रोटी लाकर दे देना आदि। प्रोफेसर सोंजा ने पाया कि अध्ययन के एक महीने बाद ऐसे काम करने वालों की खुशी का स्तर काफी ऊंचा था। वे कहती हैं- ‘दयालुता का एक छोटा-सा काम भी आपको अच्छी अनुभूति देता है। आप खुद को एक अच्छा आदमी समझते हैं। इससे लोगों के साथ अच्छे संबंध बनते हैं और आपका सामाजिक सम्मान बढ़ता है। साथ ही, किसी के आड़े वक्त में काम आकर आप उसका दिल जीत लेते हैं तो पता नहीं वह व्यक्ति आपकी कब, कहां और कैसे मदद कर दे। इससे आपका कोई बिगड़ता हुआ काम बन सकता है।’ महान दार्शनिक और लेखक एल्डस लियोनार्ड हक्सले ने अपनी मृत्यु शैय्या पर जीवन भर के अनुभवों के चंद शब्दों में समेटते हुए कहा था- ‘हम सबको एक दूसरे के प्रति दयालु होना चाहिए।’

दरअसल, दयालु होना सेहत के लिए भी अच्छा होता है। दो हजार से ज्यादा लोगों पर किए गए एक अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि जो लोग नियमित रूप से दूसरों की भलाई के लिए कुछ करते हैं, उनमें अवसाद जैसे मानसिक रोगों की संभावना कम रहती है और उनका मानसिक स्वास्थ्य दूसरों की तुलना में बेहतर होता है। कुछ अन्य अध्ययनों में पाया गया है कि दूसरों की मदद करने वाले लोगों का ‘इम्यून सिस्टम’ यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर होती है और उनके जटिल रोगों से बीमार पड़ने की संभावना कम होती है। स्टीफन पोस्ट कहते हैं- ‘स्वस्थ रहने, खुश रहने और नरमदिल होने में गहरा संबंध है। दयालुता भावनाओं को संचालित करती है, जिसका हमारी सेहत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। नरमदिल और दयालु लोग अक्सर शांत स्वभाव के होते हैं, जिससे वे तनाव के शिकार नहीं होते। जबकि तनाव के शिकार लोग हृदय रोग की चपेट में आ जाते और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बुरी तरह प्रभावित होती है।’

सन् 2005 में इस्राइल के हिब्रू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में दयालुता और एक जीन में संबंध पाया। यह जीन डोपामाइन नामक ‘फील गुड न्यूरोट्रांसमीटर’ का मस्तिष्क में उत्सर्जन करता है। कुछ शोध के निष्कर्ष यह बताते हैं कि मददगार स्वभाव के लोगों ने खुद में ऊर्जा, गर्मजोशी, उच्च आत्ममूल्य और प्रतिष्ठा महसूस की। हालांकि अगर अपने भीतर भी हम इस तरह की बातें महसूस कर सकते हैं।
दयालुता के लिए हम आमतौर पर ‘इंसानियत’ या ‘मानवता’ शब्द का भी प्रयोग करते हैं। यानी यह इंसान का एक बेहद महत्त्वपूर्ण गुण है।

निर्दयी या क्रूर लोगों के लिए अक्सर हम कह देते हैं कि इसकी मानवता मर गई या इसमे इंसानियत नाम की चीज नहीं। दयालुता के माध्यम से हम सिर्फ दूसरों की जिंदगी में ही नहीं, खुद की जिंदगी में भी कई छोटे-बड़े सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। ‘सर्वाइवल औफ दी नाइसेस्ट’ यानी ‘अच्छे लोगों का अस्तित्व बना रहता है’। इस सिद्धांत के अनुसार ही मानवजाति आज तक बची हुई है और निरंतर तरक्की पर है, तो अपनी दयालुता के कारण ही है। अमेरिका की सांता फे इंस्टीट्यूट के शोधकर्ता प्रोफेसर सौम बोवेलस ने प्राचीन संस्कृतियों का विश्लेषण करने पर पाया कि उनके अस्तित्व में दयालुता एक महत्त्वपूर्ण कारण थी। जिस समाज में दयालुता हो और अन्य सदस्यों के प्रति सहयोग का भाव हो, वह समाज लंबे समय तक अस्तित्व में रहता है। इनका कहना है कि हम इंसानों में अपने नजदीकी लोगों की मदद करने की कुदरती आदत और क्षमता होती है। इसका उपयोग करके हम अपने समाज को दीर्घ काल तक अस्तित्व में रख सकते हैं।

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