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दुनिया मेरे आगेः कनेर का फूल

कनेर भी भव्य सड़कों के डिवाइडरों पर अपनी सुंदरता से चार चांद लगाता है, लेकिन उसमें वह अल्हड़पन नहीं, जो बेगमबेलिया में है।

कनेर की तरह ही गांव, नगर, महानगर सर्वत्र अपना विदेशी उद्गम अपने देशज नाम बेगमबेलिया के पीछे छिपाए बूगनवेलिया भी दिखती है।

किसी महानगर के अत्याधुनिक हवाईअड्डे तक पहुंचाने वाली सड़क के बीचोंबीच डिवाइडर पर अपने सौम्य सौंदर्य का जादू बिखेरते कनेर के चटक पीले, नारंगी और नीलवर्णी आभा लिए श्वेत फूलों को देखता हूं तो मन फूलों से सजी हुई एक दुनिया में खो जाता है। सबसे पहले याद आते हैं अपनी बगिया की चारदिवारी से बाहर झांकते गुड़हल और चंपा, जिनके फूल चुन कर अपनी पूजा की मंजूषा में भरते हुए मेरे पड़ोस में रहने वाली बुजुर्ग महिला की नजरें मेरी नजरों से जब कभी टकरा जाती हैं तो वे असहज हो जाती हैं। मैं उन्हें बरजता नहीं हूं, फिर भी वे सफाई देने लगती हैं कि फूल पूजा के लिए ले रही हैं। मेरा असंतोष उनसे नहीं, बल्कि अपनी बगिया के एक कोने में खड़े हरसिंगार से है। काश, हरसिंगार के वे सहस्रों फूल जो रोज सुबह गिर कर नीचे धरती पर श्वेत-नारंगी रंगों की अद्भुत कालीन बुन देते हैं, अपने निष्प्रयोजन आत्मोसर्ग पर इतना घमंड न करते। काश, वे डालियों पर कुछ घंटों के लिए ही और टिके रहते। सैकड़ों की तादाद में खिलने वाले उन फूलों में से वे वृद्ध महिला कुछ पूजा के लिए चुन भी लेतीं तो उन्हें गुडहल के गिने-चुने फूलों में से कुछ को तोड़ लेने जैसा अपराधबोध न होता।

कनेर की तरह ही गांव, नगर, महानगर सर्वत्र अपना विदेशी उद्गम अपने देशज नाम बेगमबेलिया के पीछे छिपाए बूगनवेलिया भी दिखती है। शुभ्र चांदनी जैसी लगती सीमेंट की शानदार सड़कें हों या कोलतार के रंग में रंगे श्यामवर्णा सड़कें, सभी के किनारों और बीच के डिवाइडरों को सजाने के लिए कनेर की तरह बेगमबेलिया भी तत्पर रहती है। उसका व्यक्तित्व उल्लासमय है, कड़ी धूप में भी खिलखिलाने वाला। लेकिन उसकी चपलता कनेर की गंभीर सौम्यता के आगे हल्की लगती है। जैसे चम्पा अपने रूप, रंग और सुवास के बावजूद भौंरे को नहीं आकृष्ट कर पाती, वैसे ही बेगमबेलिया का उल्लासमय वजूद देवी-देवताओं को नहीं रिझाता। मातृभूमि पर शीश चढ़ाने के लिए जाते वीरों के पथ में बिछ जाने की कामना जिस फूल ने की थी, वह भी बेगमबेलिया के गोत्र का नहीं प्रतीत होता। विदेशी उद्गम के अपने नुकसान हैं। जहां हमारी संस्कृति से पूरी तरह जुड़ने में बेगमबेलिया असफल रहती है, वहीं शांत, सौम्य कनेर चुपके से बाजी मार ले जाता है।

कनेर भी भव्य सड़कों के डिवाइडरों पर अपनी सुंदरता से चार चांद लगाता है, लेकिन उसमें वह अल्हड़पन नहीं, जो बेगमबेलिया में है। कद-काठी में पेड़ और पौधे के बीच ठहरा हुआ वह किसी किशोर की तरह संकोची लगता है। गांव-कस्बे की किसी बगिया में वह जितनी विनम्रता से खड़ा रहता है, महानगरों के भव्य राजपथों के बीच भी उतनी ही निस्पृहता से स्थितप्रज्ञ मुद्रा में दिखता है। उसकी सुंदरता में सरलता है, लेकिन न तो वैजयंती की जगह उसकी माला धारण करने की किसी देवता ने सोची, न उसकी किस्मत कमल जैसी थी कि किसी देवता के नयनों में उसकी छवि देखी जा सके। किसी को कमलनयन कहिए, प्रसन्न हो जाएगा। मछली के आकार वाली आंखें जिसकी हों, उसे मीनाक्षी नाम सुहाएगा, लेकिन किसी की आंखों में इसका घंटी जैसा सुंदर आकार दिखे तो उसे ‘कनेरनयन’ नाम कोई खुशी दे सकेगा?

फिर भी जिसके कोई और नाथ न हों, उसके लिए भोलानाथ हैं। विष आत्मसात कर जाने वाले नीलकंठ महादेव को विषाक्त धतूरे का फूल प्रिय है तो कनेर भी उनके स्नेह का भाजन है। कारण छिपा हुआ है उसकी टहनियों और फूल की डंडी से निकलने वाले दूध जैसे श्वेत रस में जो विषाक्त होता है। शायद उसकी विषाक्तता ही उसे नीलकंठ का स्नेहभाजन बनाती है, भले इस विषाक्तता का उद्देश्य कुछ और रहा हो। हर कहीं अपने फूलों की छटा बिखेरने को प्रस्तुत कनेर ढोर-डंगरों की पहुंच में भी रहता है। उनसे सुरक्षित रहने के लिए न तो इसके पास कांटे हैं, न ही ऊंचा कद। है तो बस यही विषाक्त दूध।

उसके चटक पीले फूल वासंती छटा बिखेरते हैं तो नारंगी फूलों के भगवा परिधान में वह संन्यासी लगता है। बहुत श्वेत वर्ण दिखने में शायद उसे संकोच लगता है, तभी अपनी शुभ्रता को नीली आभा में छिपा कर वह श्याम हरित द्युति हो जाता है। समर्पण उसके स्वभाव में है। किसी पूजा अनुष्ठान के लिए चुने जाने की प्रतीक्षा करते-करते वह थक जाता है तो धराशायी हो जाता है। पर तब भी उसकी आंखें उन डालियों पर टिकी रहती हैं, जिन पर बहुत से फूल चौकोर फलों का आकार ले लेंगे। संपन्नता के अभाव में भी मनोरंजन के साधन ढूंढ़ निकालने में माहिर निर्धन ग्रामीण बच्चे उन फूलों की गुठलियों को धूल-मिट्टी में सुखा कर उनसे तरह-तरह के खेल खेलेंगे। अपनी अस्थियों को साधनहीन बच्चों द्वारा कभी कौड़ियों की तरह द्यूतक्रीड़ा में आजमाए जाते देख कर तो कभी कंचों की जगह निशानेबाजी के खेल में इस्तेमाल होते देख कर कनेर फूला नहीं समाएगा कि उसके मूल्यांकन में देर हो, अंधेर नहीं है, भले अंधेर और कनेर में ध्वनिसाम्य हो!

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