ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे: प्रचार का मानस

आज सूचनाओं के तेजी से प्रसार के इस युग में किसी भी जरिए खूब प्रचारित कोई जानकारी हमारे विचारों को आकार देने में बड़ी भूमिका निभाती है और उसी आधार पर कई बार हम निर्णय भी लेते हैं। वर्तमान समय में यह बड़े स्तर पर हो रहा है क्योंकि हम टीवी मीडिया के किसी न किसी रूप से खुद को हर वक्त घिरा हुआ पाते हैं। मीडिया खासकर सोशल मीडिया अब हमारे सपनों को भी प्रभावित करने लगा है।

Author November 9, 2018 3:44 AM
टीवी चैनलों पर खबरों को आक्रामक तरीके से परोसे जाने की वजह से घटनाओं की गंभीरता कम हो रही है और अक्सर तात्कालिक तौर पर गलत धारणाएं भी फैल जाती हैं। (प्रतीकात्मक फोटो)

आज सूचनाओं के तेजी से प्रसार के इस युग में किसी भी जरिए खूब प्रचारित कोई जानकारी हमारे विचारों को आकार देने में बड़ी भूमिका निभाती है और उसी आधार पर कई बार हम निर्णय भी लेते हैं। वर्तमान समय में यह बड़े स्तर पर हो रहा है क्योंकि हम टीवी मीडिया के किसी न किसी रूप से खुद को हर वक्त घिरा हुआ पाते हैं। मीडिया खासकर सोशल मीडिया अब हमारे सपनों को भी प्रभावित करने लगा है। खासतौर पर टीवी चैनलों पर खबरों को आक्रामक तरीके से परोसे जाने की वजह से घटनाओं की गंभीरता कम हो रही है और अक्सर तात्कालिक तौर पर गलत धारणाएं भी फैल जाती हैं। आए दिन इसके उदाहरण देखने को मिलते हैं। लगभग चार साल पहले की बात है। मैंने दिल्ली के एक इलाके से जेएनयू जाने के लिए ऑटो वाले को रोका। वह तैयार हो गया। कुछ देर की इस यात्रा में उसने बहुत सारी बातें बतार्इं, लेकिन उसकी एक बात ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगी। उसने कहा- ‘शायद ही कोई आॅटो वाला जेएनयू जाने के लिए मना करे। यहां पढ़ना भी किस्मत की बात हैं। सबको मौका नहीं मिल पाता है!’ फिर उसने इस विश्वविद्यालय की काफी प्रशंसा की। मुझे भी यह खास लगा कि एक आॅटो चालक इस संस्थान के बारे में कितना कुछ जनता है!

उसके कुछ महीने बाद जब जेएनयू की नकारात्मक चर्चा मीडिया में खूब होने लगी थी और उसे ‘देशद्रोही’ पैदा करने वाला जैसा खिताब भी खासतौर पर टीवी मीडिया द्वारा दिया जाने लगा, तब स्थिति तेजी से बदली। उस दौरान भी कुछ काम से मेरा जेएनयू जाना हुआ। इस बार रास्ते में जब ऑटो वाले से बात होने लगी तो उसने जेएनयू के बारे में प्रचारित बातों को विश्वास करने लायक नहीं माना। उसने कहा कि मेरा मन और दिमाग यह मानने को तैयार नहीं है। यह किसी की साजिश भी हो सकती है, ताकि इस संस्थान की छवि खराब हो।

मैं यह तो नहीं बता सकता कि जिन दोनों आॅटो वालों की बात मैंने की, वे कितने पढ़े-लिखे हैं। इस संस्थान के बारे में उनकी राय कितनी सही है, मुझे इस पर भी कोई टिप्पणी नहीं करनी है। मैं प्रचार और सूचनाओं के प्रसार से उपजे आम मानस पर बात करना चाहता हूं। दूसरा वाकया इसी साल का है। बनारस के एक प्रतिष्ठित निजी स्कूल में बारहवीं कक्षा में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाली एक शिक्षक ने बच्चों को जेएनयू में आगे की पढ़ाई के लिए फॉर्म न भरने की सलाह दी। इसके पीछे की वजह शायद मीडिया में इस संस्थान के बारे में सुर्खियों में रही खबरें हों। इसी स्कूल की एक छात्रा ने बताया कि कई माता-पिता भी अपने बच्चों का नामांकन इस विश्वविद्यालय में नहीं कराना चाहते थे। शायद उन माता-पिता को भी यह लग रहा होगा कि टीवी पर इस संस्थान के बारे में जिस तरह की बातें कही जा रही थीं, वे सही होंगी। बच्चों के अभिभावकों को शायद यह डर भी सता रहा होगा कि कहीं हमारे बच्चे भी वहां होने वाली गतिविधियों में शामिल न हो जाएं। इसी भय से इस स्कूल के कई बच्चों ने इस विश्वविद्यालय का फॉर्म ही नहीं भरा था।

दरअसल, कुछ सालों से ज्यादातर टीवी चैनलों पर कुछ इस तरह की चीजें परोसी जा रही हैं, जिनके चलते लोगों के दिमाग में कुछ खास संस्थानों के बारे में नकारात्मक छवि बन रही है। हालांकि दूसरा पहलू यह है कि अखबार या पत्रिकाओं में अनेक संतुलित खबरें लोगों के सामने रखी गर्इं। लेकिन आज के दौर में दृश्य मीडिया के प्रभाव का विस्तार और प्रभाव जिस कदर बढ़ा है, उसमें कई बार हकीकत वक्त पर लोगों के पास नहीं पहुंच पाती। यही वजह है कि किसी भी मसले पर टीवी चैनल लोगों की राय निर्धारित करने का काम करने लगे हैं। मैंने जिस संदर्भ में बात की, उसमें अब कई लोग यह भी कहने लगे हैं कि जेएनयू पहले जैसा नहीं रहा… अब वह बेकार हो गया है। लेकिन एक बात सोचने वाली है कि इस संस्थान के बारे में यहां पढ़ने और पढ़ाने वालों की राय टीवी पर परोसी जा रही राय से बिल्कुल अलग है।

किसी भी संस्थान के सही और गलत होने की बात उससे सीधे तौर पर जुड़े लोगों द्वारा कही गई बातों पर ज्यादा टिकी होती है। क्या यह सोचने का विषय नहीं है कि इतनी ज्यादा संख्या में माता-पिता अपने बच्चों को वहां पढ़ा रहे हैं, जहां के बारे में कई तरह के नकारात्मक प्रचार किए गए? इस विश्वविद्यालय के बारे में आॅटो चलाने वाले उन दो लोगों की जानकारी सही है या किसी कथित ‘पढ़े-लिखे’ व्यक्ति की जो बच्चों को जेएनयू जैसे संस्थान में नहीं जाने की सलाह दे रहा है? यह लोगों को तय करना है और सोचना है कि हम अपने जीवन में तार्किकता को कितनी जगह देते हैं और अपने सामने पेश की गई बातों की व्याख्या कैसे करते हैं।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App